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भारत में रबी दलहन परिदृश्य

डॉ. ए. के. शिवहरे, संयुक्त निदेशक
दलहन निदेशालय, केन्द्रीय कृषि मंत्रालय, भोपाल

28 अक्टूबर 2021, भोपाल ।  चने की उन्नतशील खेती – भारत विश्व का सबसे बड़ा चना उत्पादक कुल उत्पादन का 75 प्रतिशत देश है। क्षेत्रफल एवं उत्पादन दोनों ही दृष्टि में दलहनी फसलों में चने का मुख्य स्थान है। समस्त उत्तर-मध्य व दक्षिण भारतीय राज्यों में चना रबी फसल के रूप में उगाया जाता है। चना उत्पादन की नई उन्नत तकनीक व उन्नतशील प्रजातियों का उपयोग कर किसान चने का उत्पादन बढ़ा सकते हैं तथा उच्चतम एवं वास्तविक उत्पादकता के अन्तर को कम कर सकते हैं।

उपज अंतर

सामान्यत: यह देखा गया है कि अग्रिम पंक्ति प्रदर्शन की पैदावार व स्थानीय किस्मों की उपज में 25 प्रतिशत का अन्तर है। यह अन्तर कम करने के लिये अनुसंधान संस्थानों व कृषि विज्ञान केन्द्र की अनुशंसा के अनुसार उन्नत कृषि तकनीक को अपनाना चाहिए।

जलवायु

चने के खेती प्राय: बारानी फसल के रूप में रबी मौसम की जाती है। चने खेती के लिए 60-90 से.मी. वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्र उपयुक्त रहते हैं।

भूमि एवं भूमि की तैयारी

हल्की दोमट से मटियार भूमि चने के लिए सर्वोत्तम रहती है किन्तु समुचित जल निकास का प्रबंध होने पर भारी भूमियों में भी इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। काबुली चने के लिये अधिक उपजाऊ भूमि कि आवश्कयता पड़ती है। जड़ ग्रंथियों के उत्तम विकास हेतु मृदा में पर्याप्त वायु-संचार का होना अति आवश्यक है अत: यह ढेलेदार खेत को पसंद करता है। रफ सीडबेड तैयार करने हेतु एक जुताई मिट्टी पलट हल से व एक से दो जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से पर्याप्त रहती है।

बुआई समय

उत्तरी भारत -असिंचित: अक्टूबर के द्वितीय पखवाड़े, सिंचित: नवम्बर के प्रथम पखवाड़े (मध्य एवं दक्षिण भारत-अक्टूबर के प्रथम पखवाड़े,) सिंचित: अक्टूबर के द्वितीय पखवाड़े से नवम्बर के प्रथम पखवाड़ा।

बीज की मात्रा

छोटे दाने वाली प्रजातियों के लिए 50-60 कि.ग्रा./हे. तथा बड़े दानों वाली प्रजातियों के लिए 100 कि.ग्रा. बीज दर व पिछेती बुवाई के लिए 90-100 कि.ग्रा./हे. एवं काबुली किस्मों के लिये 100 से 125 किग्रा./हे. पर्याप्त रहती है।

बुआई विधि

अधिक उपज लेने हेतु बोआई कतारों में ही 30 से.मी. की दूरी पर व देर से 25 से.मी. की दूरी पर सीड ड्रिल द्वारा या हल के पीछे चोंगा बांधकर 8-10 से.मी. की गहराई पर करें।

दूरी

सामयिक बुआई-30 से.मी. &10 से.मी.
पिछेती बुआई – 25 से.मी.&10 से.मी.
सिंचित क्षेत्रों में – 45 से.मी. &10 से.मी.

अन्तरवर्तीय फसल प्रणाली

चने की खेती अंतरवर्तीय के रूप में निम्न फसलों के साथ करने से अधिक उत्पादन के परिणाम प्राप्त हुए हैं।
6 लाईन चना + 4 लाईन गेहंू
6 लाईन चना + 2 लाईन सरसों
4 लाईन चना + 2 लाईन जौ
4 लाईन चना + 2 लाईन अलसी
प्रयोग द्वारा चना + गेहूं फसल प्रणाली सबसे अधिक लाभकारी सिद्ध हुआ है।

बीजोपचार

रोग नियंत्रण हेतु: उकठा एवं जड़ सडऩ रोग से फसल के बचाव हेतु 2 ग्राम थायरम + 1 ग्राम कार्बेंडाजिम के मिश्रण से प्रति किलो बीज या वीटावैक्स (कार्बोक्सिन) 2 ग्राम/किलो से उपचारित करें। कीट नियंत्रण हेतु थायोमेथोक्सम 70 डब्ल्यू. पी. 3 ग्राम/किलो बीज की दर से उपचारित करें।

खाद एवं उर्वरक

मृदा परीक्षण के आधार पर समस्त उर्वरक अंतिम जुताई के समय हल के पीछे चोंगा बांधकर या फर्टीसीड ड्रिल द्वारा कूड़ में बीज की सतह से 2 से.मी. गहराई व 5 से.मी. साइड में देना सर्वोत्तम रहता है। चना के लिए सामान्यत: 15-20 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 50-60 कि.ग्रा. फास्फोरस, 20 कि.ग्रा. पोटाश एवं 20 कि.ग्रा. गंधक की आवश्यकता होती है। जिन क्षेत्रों में जस्ता की कमी हो वहां 15-20 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट प्रयोग करें। नाइट्रोजन एवं फास्फोरस की समस्त भूमियों में आवश्यकता होती है। किन्तु पोटाश एवं जिंक का प्रयोग मृदा परीक्षण उपरांत खेत में कमी होने पर ही करें। नत्रजन एवं फास्फोरस की संयुक्त रूप से पूर्ति हेतु 100-150 किग्रा डाइ अमोनियम फास्फेट का प्रयोग कर सकते है।

गौण एवं सूक्ष्म पोषक तत्व

गंधक (सल्फर) – काली एवं दोमट मृदाओं में 20 कि.ग्रा. गंधक (154 कि.ग्रा. जिप्सम/फॉस्फो-जिप्सम या 22 कि.ग्रा. बेन्टोनाइट सल्फर) प्रति हेक्टर की दर से बुवाई के समय प्रत्येक फसल के लिये देना पर्याप्त होगा। कमी ज्ञात होने पर लाल बलुई मृदाओं हेतु 40 कि.ग्रा. गंधक (300 कि.ग्रा. जिप्सम/फास्फो-जिप्सम या 44 कि.ग्रा. बेन्टोनाइट सल्फर) प्रति हेक्टर की दर से प्रयोग करें।
जिंक -जिंक की मात्रा का निर्धारण मृदा के प्रकार एवं उसकी उपलब्धता के अनुसार की जाये।

  • काली मृदा-2.0 कि.ग्रा. जिंक (10 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट हेप्टा हाइड्रेट या 6.0 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट मोनो हाइड्रेट) प्रति हेक्टर की दर से आधार उर्वरक के रूप में प्रयोग करें।
  • बलुई दोमट मृदा-2.5 कि.ग्रा. जिंक (12.5 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट हेप्टा हाइड्रेट या 7.5 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट मोनो हाइड्रेट) प्रति हेक्टर की दर से आधार उर्वरक के रूप में प्रयोग करें।
  • लैटेराइटिक,जलोढ़ एवं मध्यम मृृदा- 2.5 कि.ग्रा. जिंक (12.5 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट हेप्टा हाइड्रेट या 7.5 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट मोनो हाइड्रेट) के साथ 200 कि.ग्रा. गोबर की खाद का प्रति हेक्टर की दर से प्रयोग करें।

बोरॉन- काली व दोमट मृदाओं मेंं चने की फसल में बुवाई के पूर्व 1 कि.ग्रा. बोरॉन (10 कि.ग्रा. बोरेक्स या 7 कि.ग्रा. डाइसोडियम टेट्राबोरेट पेन्टाहाइडे्रट) प्रति हेक्टर की दर सेे दें। जबकि बलुई दोमट पहाडी़ क्षेत्र की मृदाओं में जिनमें कार्बनिक पदार्थ की मात्रा कम हो उनमें 1.5 कि.ग्रा. बोरॉन (15 कि.ग्रा. बोरेक्स या 10 कि.ग्रा. डाइसोडियम टेट्राबोरेट पेन्टाहाइडे्रट) प्रति हेक्टर बुवाई के पूर्व मृदा में दें।
मॉलिब्डेनम- 0.5 कि.ग्रा. सोडियम मॉलिब्डेट प्रति हेक्टर की दर से आधार उर्वरक के रूप में या 0.1 प्रतिशत सोडियम मॉलिब्डेट के घोल का दो बार पर्णीय छिडक़ाव करें अथवा मॉलिब्डेनम के घोल में बीज शोषित करें। ध्यान रहे कि अमोनियम मॉलिब्डेनम का प्रयोग तभी किया जाए जब मृदा में मॉलिब्डेनम तत्व की कमी हो।

खरपतवार नियंत्रण

पेन्डामिथालीन 30 ई.सी. दवा 2.5-3 ली. (0.75-1 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व) /हेक्टेयर की दर से 400-500 ली. पानी में घोलकर बुवाई के 48 घंटे के अंदर छिडक़ाव करें। बोआई के 25-30 दिन बाद एक निराई-गुड़ाई करने से खरपतवार नियंत्रण के साथ मृदा में वायुसंचार भी बढ़ता है।

सिंचाई

भारी व चिकनी भूमि को छोडक़र अन्य भूमियों में दो सिंचाई, प्रथम सिंचाई शाखाएँ बनते समय व द्वितीय फलियों में दाना बनते समय करें। किसी भी दशा में सिंचाई बुआई चार सप्ताह तक नहीं करें।

कटाई एवं मड़ाई

जब 70-80 प्रतिशत फलियां पक जाएं, फली से दाना निकालकर दांत से काटा जाए और कट की आवाज आए, तब समझना चाहिए कि चना की फसल कटाई के लिए तैयार है। काटी गयी फसल को एक स्थान पर इक_ा करके खलिहान में 4-5 दिनों तक सुखाकर मड़ाई की जाती है। सुखाने के पश्चात बैलों की दांय चलाकर या थ्रेसर द्वारा भूसा से दाना अलग कर लेते हैं।

उपज

उन्नत विधि अपनाते हुए एवं अच्छी प्रजाति का चुनाव करके प्रति हेक्टेयर 20-25 क्विंटल तक उपज प्राप्त की जा सकती है।

भण्डारण

भण्डारण के समय दानों में नमी का प्रतिशत 10 से अधिक नहीं हो। भण्डार गृह में 2 गोली एल्युमिनियम फास्फाइड/टन रखने से भण्डार कीटों से सुरक्षा मिलती है। भण्डारण के दौरान चने को अधिक नमी से बचायें।

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