सतत उत्पादन के लिए बेहतर कृषि पद्धतियाँ 

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  • अनिल कुमार सिंह , के. सी. शर्मा
  • उपेन्द्र सिंह , दिलीप कुमार वर्मा
  • प्रकाश टी.एल., भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, क्षेत्रीय केन्द्र, इन्दौर

23 अक्टूबर 2022, सतत उत्पादन के लिए बेहतर कृषि पद्धतियाँ – कृषि के बदलते परिवेश में, बढ़ते तापमान, पर्यावरण प्रदूषण, मृदा ह्रास एवं बीमारियों के प्रकोप को कम करने के लिए उन्नत एवं स्वच्छ क्रियाओं को अपनाना आवश्यक है। कृषि उत्पादन के प्रत्येक पहलुओं जैसे खेत की तैयारी, खेत का चुनाव, खरपतवार नियंत्रण, पौध सरंक्षण, फसलोत्तर प्रबंधन, फसल कटाई, कृषि पद्धतियाँ महत्वपूर्ण हैं।

सुथरी कृषि पद्धतियाँ

कृषि उत्पादन तथा उत्पादन के पश्चात की प्रक्रियाओं के सिद्धांतों का एक संग्रह है जिसे हम सामाजिक पर्यावरणीय और आर्थिक, स्थिरता को ध्यान में रखते हुए सुरक्षित एवं स्वच्छ कृषि उत्पाद प्राप्त कर सकते हैं।

सुथरी कृषि प्रणाली के मुख्य उद्देश्य
  • सतत कृषि उत्पादन व उत्पादकता बढ़ाना।
  • प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर, टिकाऊ उपयोग करना।
  • खाद्य श्रृंखला के अंतर्गत उत्पाद की गुणवत्ता एवं सुरक्षा का लाभ उठाना।
  • खाद्य आपूर्ति श्रृंृंखला के बदलाव से नई विपणन सुविधाओं का लाभ उठाना।
  • कृषकों एवं निर्यातकों के लिए नई विपणन सुविधाओं का विकास करना।
  • सामाजिक/आर्थिक मांगों की पूर्ति करना।
  • चयनित कृषि क्रियाओं के लिए सुथरी कृषि पद्धतियाँ
मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन कृषि पद्धतियाँ

मिट्टी के भौतिक एवं रसायनिक गुण, कार्बनिक तथा जैविक गतिविधियां कृषि उत्पादन को सतत बनाये रखने के लिए महत्वपूर्ण है। यह एक साथ मिलकर मृदा की उर्वरकता और उत्पादकता को निर्धारित करते हैं।

  • मृदा की जैविक गतिविधियों को बढ़ाकर पौधों को उपलब्ध पानी एवं उर्वरकों के उपयोग में सुधार करना।
  • मिट्टी के कटाव एवं पोषक तत्वों एवं कृषि रसायनों के निक्षालन से होने वाले नुकसान को कम करना।
  • मिट्टी की नमी में वृद्धि करना।
  • भू-परिष्करण क्रियाओं से बचाव करना।
  • मृदा संरचना में सुधार के लिए कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ाना।
  • फसलचक्र, चारागाह प्रबंधन, समन्वित उर्वरक प्रबंधन यांत्रिक या सरंक्षित।
  • जुताई क्रियाओं को अपनाते हुए मृदा में कार्बनिक पदार्थ को बनाये रखें, उनमें सुधार करें।
  • वायु/जल से मिट्टी के कटाव को कम करें।
  • कार्बनिक एवं अकार्बनिक उर्वरकों, अन्य कृषि रसायनों का उचित मात्रा में उचित समय पर व उपयुक्त विधि से उपयोग करना जिससे मृदा स्वास्थ्य, पर्यावरण एवं मानव स्वास्थ्य को किसी भी प्रकार से नुकसान न हों।
जल प्रबंधन कृषि पद्धतियाँ

गुणात्मक तथा मात्रात्मक दृष्टि से जल संसाधनों के प्रबंधन के लिए कृषि क्षेत्र की अहम जिम्मेदारी है। कार्यकुशल सिंचाई प्रौद्योगिकी एवं प्रबंधन निक्षालन तथा लवणता से होने वाली हानि को कम करना आवश्यक है।

  • सतही और मृदा जल का उचित प्रबंधन करें।
  • नमी संरक्षण क्रियाएं अपनाएं।
  • मृदा में जल धारण की क्षमता बढ़ाएँ।
  • फसलवार उचित सिंचाई पद्धतियों का चयन व समयबद्ध क्रांतिकअवस्थाओं पर सिंचाई करना।
  • अत्यधिक निकासी या संचय को रोकने के लिए जल स्तर का उचित प्रबंधन करना।
  • मृदा जैविक पदार्थों की स्थाई परत बनाये रखते हुए जल की कार्यशीलता में वृद्धि करना।
  • पानी की बचत के उपायों जैसे खेत तलाई, जल हौद, डिग्गी, फव्वारा, मिनी स्प्रिंकलर, माइक्रो स्प्रिंकलर रेनगन एवं बूंद-बूंद सिंचाई पद्धतियों को अपनाना।
  • पशुओं के लिए पर्याप्त, सुरक्षित व स्वच्छ पानी की व्यवस्था करना।
उत्कर्ष फसल उत्पादन प्रबंधन कृषि पद्धतियाँ

फसल उत्पादन में वार्षिक और बारहमासी फसलों एवं किस्मों का चयन स्थानीय उपभोक्ता एवं बाजार की जरूरतों के अनुसार किया जाना चाहिए।

  • उपयुक्त फसल व फसल किस्म का चयन क्षेत्र की जलवायु एवं स्थानीय परीस्थितियों के अनुसार करें।
  • समय पर बुवाई करें जिससे अधिकतम उत्पादन प्राप्त कर सकें।
  • प्रमाणित उन्नत बीज ही बोयें।
  • बीज जनित रोगों की रोकथाम के लिए बीजोपचार अवश्य करें।
    उचित बीज दर रखें, कतार में बुवाई करें तथा कतार से कतार व पौध की समुचित दूरी रखें।
  • जुताई- बुवाई ढलान के विपरीत करें जिससे की वर्षा का ज्यादा पानी जमीन में अंदर जाए।
  • फसल चक्र अपनाएं इससे कीट-रोग के प्रकोप में कमी आयेगी। फसल चक्र में दलहनी फसलों को महत्व दें।
  • मिलवां फसल बोएं।
  • तिलहनी/दलहनी फसलों में जिप्सम का उपयोग जरूर करें।
  • सिफारिश के अनुसार अगेती, पछेती फसल व किस्म का चयन करें ताकि विषम परिस्थितियों में भी आमदनी बढ़ सके।
  • गर्मी में गहरी जुताई करें तथा खरपतवार, रोग व कीट के प्रकोप में कमी करें।
  • जैविक खेती अपनाएं, रसायनिक उर्वरक से बचें।                     
पौध संरक्षण कृषि पद्धतियाँ

फसल खेती में उत्पादन और गुणवत्ता को बनाये रखने के लिए सफल स्वास्थ्य को बनाये रखना बहुत महत्वपूर्ण है। इसके लिए समन्वित कीट व्याधि प्रबंधन के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए रोग एवं कीट प्रतिरोधी किस्मों का प्रयोग करना, फसल चक्र अपनाना, ट्रेप फसल उगाना तथा कृषि रसायनिक विधि से खरपतवार, कीट एवं व्याधि का नियंत्रण करना आवश्यक है। इनका प्रयोग पर्यावरण एवं मनुष्य पर इनसे होने वाले संभावित नकारात्मक प्रभावों को ध्यान में रखते हुए पूर्ण ज्ञान एवं उपयुक्त विधियों से किया जाये।

  • प्रतिरोधी किस्मों का चयन तथा चक्र व कृषक क्रियाओं से कीट बीमारियों से बचाव।
  • जैविक विधि से रोग/कीट नियंत्रण करें।
  • हानिकारक एवं लाभकारी कीटों के बीच संतुलन को बनाये रखना।
  • आवश्यकता पर आधारित न्याय संगत तथा सुरक्षित कीटनाशकों का छिडक़ाव।
  • कीटों की संख्या अधिक होने पर ही कीटनाशी रसायनों का प्रयोग करें।
  • किसी भी कीटनाशक का उपयोग दुबारा न करें फसल चक्र की तरह ही कीटनाशी चक्र का उपयोग करें।
  • छिडक़ाव/भुरकाव सही उपकरण व नोजल का उपयोग करें।
  • कीट ग्रसित फसल अवशेष जैसे कपास के टिण्डे, बैंगन, टमाटर,मिर्च आदि के काणे फल, डंठल, टहनियों आदि को जला दें।
  • परभक्षी चिडिय़ा, मैना,गौरेया मोर आदि के बैठने हेतु स्टेंड बनाएं इन्हे खेत में आकर्षित करने के लिए एक-दो दिन चुग्गा डालें।
  • कीट एवं बीमारियों के बारे में पूर्वानुमान लगाना एवं प्रबंधन कार्ययोजना बनाना।
  • कृषि रसायनों का भंडारण एवं उपयोग निर्धारित मापदंडों के अनुसार ही करें।
  • रसायनों के उपयोग का फसलवार सम्पूर्ण रिकॉर्ड रखें।
  • मित्र कीटों का सरंक्षण करें, प्रकाशपाश एवं फेरोमोनपाश का उपयोग करें।
  • समन्वित कीट प्रबंधन, समन्वित व्याधि प्रबंधन, समन्वित खरपतवार प्रबंधन को बढ़ावा दें।
  • फसल की क्रांतिक अवस्थाओं पर सिंचाई अवश्य करें।
  • फसल की आवशयकता के अनुरूप ही संतुलित मात्रा में पोषक तत्वों एवं सिंचाई जल का उपयोग करें।
  • खरपतवार हटाने के लिए समय-समय पर निराई गुड़ाई करें।
  • फसल पद्धति के साथ पशुपालन का समन्वय करें।
  • सुरक्षा नियमों/सुरक्षा मानकों के अनुसार फसल उत्पादन में उपयोग होने वाली मशीनरी की स्थापना व संचालन।
कटाई एवं भंडारण कृषि पद्धतियाँ
  • उत्पाद की गुणवत्ता कटाई एवं भण्डारण के लिए स्वीकार्य प्रोटोकॉल के क्रियान्वन पर निर्भर करता है।
  • उत्पाद की कटाई कीटनाशी रसायनों के छिडक़ाव के बाद प्रतीक्षा अवधि को ध्यान में रखते हुए करें।
  • गोदामों/घर में रखने से पहले अनाज को अच्छी तरह से साफ करें।
  • गोदाम/घर में अनाज को अच्छी तरह सुखाकर (नमी स्तर 8-10 प्रतिशत) व ठण्डा करके रखें।
  • उत्पाद का भंडारण वैज्ञानिक तरीके से उचित स्थान, तापमान व नमी को ध्यान में रख कर ही करें।
  • अनाज की बोरियों को गोदाम/कमरे की दीवारों से दूर रखें।
  • कमरे/गोदाम में लकड़ी के पट्टे/पॉलीथिन सहित पहले बिछाएं, उसके ऊपर अनाज रखें।
  • भंडारण में कीड़ों के प्रकोप की रोकथाम हेतु निरोधक उपाय अपनाएं।
  • रसायनिक उपचार प्रशिक्षित विशेषज्ञ की उपस्थिति में करें।
  • चूहों की रोकथाम के लिए जिंक फास्फाइड या ब्रामोडियोलोन का उपयोग करें।

इस प्रकार कृषक, कृषि उत्पादन में स्वच्छ क्रियाओ को अपनाकर सतत व अधिकतम उत्पादन प्राप्त कर सकता हैं। इन क्रियाओं (कृषि पद्धतियाँ) को अपनाने से कृषि लागत में कमी आने के साथ- साथ पर्यावरण संरक्षण, मृदा स्वास्थ्य व मानव स्वास्थ्य में आशातीत सुधार परिलक्षित हैं।

गेहूँ की सफल खेती के लिए कृषि पद्धतियाँ
  • खेत की तैयारी (जुताई तथा पठार) खरीफ फसल कटते ही करें ।
  • पलेवा नहीं करें, बल्कि सूखे में बुवाई करके तुरन्त सिंचाई करें।
  • क्षेत्र के लिए अनुशंसित प्रजातियों का ही इस्तेमाल करें। प्रजाति का चुनाव अपने संसाधनों यानि उपलब्ध सिंचाई की मात्रा तथा आवश्यकताओं के अनुरूप करें।
  • सूखा रोधी एवं कम सिंचाई चाहने वाली उन्नत किस्मों का अधिकाधिक उपयोग करें।
  • पोषक तत्वों का उपयोग मृदा स्वास्थ्य जाँच के आधार पर करें।
  • नत्रजन: स्फुर: पोटाश संतुलित मात्रा 4:2:1 के अनुपात में डालें।
  • ऊँचे कद की (कम सिंचाई वाली) जातियों में नत्रजन:स्फुर:पोटाश की मात्रा 80:40:20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बुआई से पूर्व ही देें।
  • बौनी शरबती किस्मों को नत्रजन: स्फुर: पोटाश की मात्रा 120:60:30 तथा मालवी किस्मों को 140:70:35 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर देें।
  • नत्रजन की आधी मात्रा और स्फुर एवं पोटाश की पूरी मात्रा बुआई पूर्व देें तथा नत्रजन की शेष आधी मात्रा प्रथम सिंचाई (बुआई के 20 दिन बाद) देें।
  • बुवाई से पहले मिश्रित खाद जैसे 12:32:16 तथा यूरिया का उपयोग करें।
  • खाद तथा बीज अलग-अलग बोयें, खाद गहरा (ढाई से तीन इंच) तथा बीज उथला  बोयें, बुवाई पश्चात पठार/ पाटा न करें।
  • बुवाई के बाद खेत में दोनों ओर से (आड़ी तथा खड़ी)  नालियाँ प्रत्येक 15-20 मीटर (खेत के ढाल के अनुसार) पर  बनायें तथा बुवाई के तुरन्त बाद इन्हीं नालियों द्वारा बारी- बारी से क्यारियों में सिंचाई करें।
  • अद्र्धसिंचित/कम सिंचाई (1-2 सिंचाई) वाली प्रजातियों में एक से दो बार सिंचाई 35-40 दिन के अंतराल पर करें।
  • सिंचाई समय पर, निर्धारित मात्रा में, तथा अनुशंसित अंतराल पर ही करें।
  • खेती में जहरीले रसायनों का उपयोग सीमित करें।
  • चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के लिये 2-4 डी  650 ग्राम सक्रिय तत्व/हे., अथवा मैटसल्फ्युरॉन मिथाइल 4 ग्राम सक्रिय तत्व/हे.,  600 लीटर पानी में मिलाकर 30-35 दिन की फसल होने पर छिडक़ें।
  • संकरी पत्ती वाले खरपतवारों के लिये क्लॉडीनेफॉप प्रोपरजिल – 60 ग्राम सक्रिय तत्व/हे., 600 लीटर पानी में मिलाकर 30-35 दिन की फसल होने पर छिडक़ें।
  • दोनों प्रकार के खरपतवारों के लिये एटलान्टिस 400 मिलीलीटर अथवा वैस्टा 400 ग्राम अथवा सल्फोसल्फ्यूरॉन 25 ग्राम सक्रिय तत्व/हे. अथवा सल्फोसल्फ्यूरॉन 25 ग्राम सक्रिय तत्व/हे., मैटसल्फ्यूरॉन मिथाइल 4 ग्राम सक्रिय तत्व/हे., 600 लीटर पानी में मिलाकर 30-35 दिन की फसल होने पर छिडक़ें।
  • गेरूआ रोग से बचाव तथा कुपोषण निवारण के लिए कम से कम आधे क्षेत्रफल में मालवी गेहूँ की नई किस्मों की खेती अवश्य करें।
    सतत अच्छी उपज के लिए फसल विविधता एवं किस्म विविधता अपनायें।
  • फसल अवशेषों को जलायें नहीं, उनकी खाद बनायें ।
  • परस्पर सहभागिता व सहकारी समूहों के माध्यम से गेहूँ की सामुदायिक खेती, वैज्ञानिक भडारण व यथोचित समय पर बिक्री द्वारा खेती का लाभांश बढ़ायें।

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