फसल की खेती (Crop Cultivation)

अरहर की खेती में छोटा बदलाव, 20 प्रतिशत तक ज्यादा पैदावार संभव: ICRISAT का अध्ययन

नर्सरी से पौध तैयार कर रोपाई करने की तकनीक से बारिश पर निर्भर क्षेत्रों के किसानों को मिलेगा सीधा फायदा

29 जनवरी 2026, हैदराबाद: अरहर की खेती में छोटा बदलाव, 20 प्रतिशत तक ज्यादा पैदावार संभव: ICRISAT का अध्ययन – अरहर (तुअर) की खेती करने वाले किसानों के लिए एक अच्छी खबर है। अंतरराष्ट्रीय अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान (ICRISAT) के नए अध्ययन में सामने आया है कि यदि अरहर की खेती सीधे बुवाई के बजाय पौध रोपाई (Transplanting) से की जाए, तो पैदावार में करीब 20 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हो सकती है।

अध्ययन के अनुसार, इस तकनीक से उत्पादन लगभग 2.5 टन प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 3 टन प्रति हेक्टेयर तक पहुंच सकता है। साथ ही, फसल पर मौसम का जोखिम कम होता है और फसल की अवधि भी कम हो जाती है।

क्या है पौध रोपाई की तकनीक?

इस विधि में किसान पहले अरहर की पौध छोटी नर्सरी में तैयार करते हैं और फिर सही समय पर मजबूत व स्वस्थ पौधों को मुख्य खेत में रोपित करते हैं। इससे फसल की शुरुआत मजबूत होती है और खेत की नमी का बेहतर उपयोग हो पाता है।

ICRISAT के अनुसार, यह तरीका शुरुआती सूखे, अनियमित बारिश और कमजोर अंकुरण जैसी समस्याओं से फसल को बचाने में मदद करता है।

कम पैदावार की बड़ी वजह

भारत में अरहर की खेती अधिकतर बारिश पर निर्भर क्षेत्रों में होती है, जहां औसत पैदावार केवल 0.8 से 0.9 टन प्रति हेक्टेयर रहती है, जबकि इसकी वास्तविक क्षमता 1.8 से 2.5 टन प्रति हेक्टेयर तक है। वैज्ञानिकों का मानना है कि पारंपरिक खेती पद्धतियां इस फसल की पूरी क्षमता का उपयोग नहीं कर पातीं।

वैज्ञानिक क्या कहते हैं

ICRISAT के महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक ने कहा कि पौध रोपाई कोई नई तकनीक नहीं है।
उन्होंने कहा, “धान जैसी सिंचित फसलों में यह पद्धति वर्षों से सफल रही है। हमारे शोध से साबित हुआ है कि यही तकनीक अरहर जैसी वर्षा आधारित फसलों में भी किसानों को बेहतर और स्थिर उत्पादन दे सकती है।”

मजबूत जड़, ज्यादा उत्पादन

ICRISAT के खेत परीक्षणों में यह साफ देखा गया कि रोपाई से की गई अरहर की फसल हर तरह की मौसम परिस्थितियों में सीधे बोई गई फसल से बेहतर रही। रोपाई से उगाई गई फसल की जड़ें अधिक मजबूत होती हैं, जिससे पौधे पानी और पोषक तत्वों को बेहतर तरीके से ग्रहण करते हैं।

ICRISAT के उप महानिदेशक (अनुसंधान एवं नवाचार) डॉ. स्टैनफोर्ड ब्लेड ने बताया कि इस तकनीक से फसल की अवधि 12 से 18 दिन तक कमहो जाती है, जिससे कटाई जल्दी होती है और बाद के मौसम में मिट्टी में नमी की कमी का खतरा भी घटता है।
उन्होंने कहा, “यह तरीका तुरंत अपनाया जा सकता है और इसके लिए ज्यादा लागत या नई मशीनरी की जरूरत नहीं है। कई बार समाधान नई तकनीक में नहीं, बल्कि बुनियादी विज्ञान में लौटने में होता है।”

अब लक्ष्य: किसानों तक तकनीक पहुंचाना

ICRISAT अब इस तकनीक को बड़े स्तर पर किसानों तक पहुंचाने पर काम कर रहा है। इसी दिशा में ओडिशा में एक बहु-हितधारक परामर्श बैठकआयोजित की गई, जिसमें वैज्ञानिक, कृषि विभाग, विस्तार अधिकारी और किसान प्रतिनिधि शामिल हुए।

अरहर पौध रोपाई प्रोटोकॉल जारी

इस बैठक के दौरान अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में टिकाऊ अरहर उत्पादन के लिए पौध रोपाई प्रोटोकॉल जारी किए गए। इन प्रोटोकॉल का उद्देश्य किसानों को सही और एकरूप तरीके से इस तकनीक को अपनाने में मदद करना है।

ओडिशा सरकार के कृषि विभाग की ओर से श्री अरुण कुमार बेहरा ने कहा,
“मैदानी परीक्षणों के नतीजे और किसानों से मिला सकारात्मक फीडबैक इस परियोजना की सफलता को दर्शाता है। यह तकनीक किसानों की आमदनी बढ़ाने में मददगार साबित होगी।”

इस शोध और खेत परीक्षणों का नेतृत्व ICRISAT के वैज्ञानिक डॉ. रमेश सिंह, डॉ. शालंदर कुमार और डॉ. गजानन सावरगांवकर ने किया।

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