फसल की खेती (Crop Cultivation)

भारत में सोयाबीन के लिए अनुशंसित खरपतवारनाशकों की संपूर्ण सूची

07 जुलाई 2026, नई दिल्ली: भारत में सोयाबीन के लिए अनुशंसित खरपतवारनाशकों की संपूर्ण सूची – भारत में सोयाबीन आज केवल एक तिलहनी फसल नहीं रह गई है, बल्कि खाद्य तेल उद्योग, पशु आहार तथा कृषि निर्यात की दृष्टि से भी इसका अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़ तथा अन्य राज्यों में लाखों किसान इसकी खेती करते हैं। बेहतर किस्मों, उन्नत कृषि यंत्रों और वैज्ञानिक पोषक तत्व प्रबंधन के बावजूद खरपतवार आज भी सोयाबीन उत्पादन के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक हैं।

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, बुवाई के बाद शुरुआती 40 से 45 दिन सोयाबीन की वृद्धि के लिए सबसे महत्वपूर्ण अवधि होती है। यदि इस दौरान खेत में खरपतवारों का प्रभावी नियंत्रण नहीं किया जाए, तो वे नमी, पोषक तत्व, सूर्य के प्रकाश और स्थान के लिए फसल से तीव्र प्रतिस्पर्धा करते हैं। परिणामस्वरूप उत्पादन में 30 से 80 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। एक बार यदि प्रारंभिक अवस्था में खरपतवार फसल पर हावी हो जाएं, तो बाद में किए गए नियंत्रण उपाय भी अक्सर उस नुकसान की पूरी भरपाई नहीं कर पाते।

इसी कारण आधुनिक सोयाबीन उत्पादन में खरपतवार नियंत्रण को अब केवल एक बार किए जाने वाले छिड़काव के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि इसे बुवाई पूर्व (PPI), बुवाई के तुरंत बाद (PE) तथा फसल उगने के बाद (PoE) तीन चरणों में विभाजित वैज्ञानिक रणनीति के रूप में अपनाया जा रहा है।

इसी उद्देश्य से आईसीएआर–राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान (NSRI), इंदौर ने केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड (CIB) के 31 मार्च 2026 तक के लेबल दावों के आधार पर सोयाबीन के लिए अनुशंसित खरपतवारनाशकों की नवीनतम सूची जारी की है। यह सूची किसानों को विभिन्न परिस्थितियों, खरपतवारों की प्रकृति तथा फसल की अवस्था के अनुसार उपयुक्त विकल्प उपलब्ध कराती है। 

संस्थान किसानों को यह भी सलाह देता है कि खरपतवारनाशकों के प्रभावी उपयोग के लिए पर्याप्त पानी का प्रयोग किया जाए। नैपसैक स्प्रेयर से प्रति हेक्टेयर 450–500 लीटर तथा पावर स्प्रेयर से लगभग 120 लीटर पानी का उपयोग करना चाहिए। वहीं, खड़ी फसल में छिड़काव के लिए फ्लड जेट या फ्लैट फैन नोजल का उपयोग बेहतर परिणाम देता है। 

तीन चरणों में तैयार होती है प्रभावी खरपतवार नियंत्रण रणनीति

राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान ने खरपतवारनाशकों को तीन प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया है—

  • बुवाई पूर्व मिट्टी में मिलाए जाने वाले (Pre-Plant Incorporation – PPI)
  • बुवाई के तुरंत बाद उपयोग होने वाले (Pre-Emergence – PE)
  • फसल उगने के बाद उपयोग होने वाले (Post-Emergence – PoE)

इन तीनों चरणों का उद्देश्य अलग-अलग है, लेकिन इनका अंतिम लक्ष्य एक ही है—फसल को शुरुआती प्रतिस्पर्धा से मुक्त रखते हुए अधिकतम उत्पादन सुनिश्चित करना।

सोयाबीन में बुवाई पूर्व (PPI) एवं बुवाई के तुरंत बाद (PE) उपयोग हेतु अनुशंसित खरपतवारनाशक

उपयोग का समयरासायनिक नाम/फॉर्मुलेशनमात्रा प्रति हेक्टेयर
बुवाई पूर्व (PPI)डायक्लोसुलम 0.9% + पेन्डीमेथालिन 35% SE (22.5 + 875 ग्राम सक्रिय तत्व/हे.)2.51 लीटर
पेन्डीमेथालिन + इमेजेथापायर2.5–3.0 लीटर
फ्लूक्लोरालिन 45 EC2.22–3.33 लीटर
बुवाई के तुरंत बाद (PE)पाइरोक्सासल्फोन 63.75% + डायक्लोसुलम 13% WG200 ग्राम
मेटोलाक्लोर 35.98% + सल्फेन्ट्राजोन 11.51% EC2.50 लीटर
डायक्लोसुलम 0.9% + पेन्डीमेथालिन 35% SE2.51 लीटर
डायक्लोसुलम 84 WDG26–30 ग्राम
सल्फेन्ट्राजोन 39.6 SC0.75 लीटर
क्लोमाजोन 50 EC1.50–2.00 लीटर
पेन्डीमेथालिन 30 EC2.50–3.30 लीटर
पेन्डीमेथालिन 38.7 CS1.50–1.75 किलोग्राम
फ्लूमिऑक्साजिन 50 SC0.25 लीटर
मेट्रिब्यूजिन 70 WP0.75–1.00 किलोग्राम
सल्फेन्ट्राजोन + क्लोमाजोन1.25 लीटर
पाइरोक्सासल्फोन 85 WG150 ग्राम
मेटोलाक्लोर 50 EC2.00 लीटर

स्रोत : आईसीएआर–राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड (CIB) के 31 मार्च 2026 तक के लेबल दावों के अनुसार।

बुवाई पूर्व उपयोग किए जाने वाले खरपतवारनाशकों का उद्देश्य खरपतवारों के अंकुरण से पहले ही उन्हें नियंत्रित करना होता है। इन्हें मिट्टी में अच्छी तरह मिलाया जाता है ताकि सक्रिय तत्व खरपतवारों के अंकुरण क्षेत्र तक पहुंच सके। जिन खेतों में हर वर्ष खरपतवारों का अधिक प्रकोप रहता है या जहां देर से बुवाई की जा रही हो, वहां यह तकनीक विशेष रूप से उपयोगी मानी जाती है।

वहीं, प्री-इमर्जेंस (PE) खरपतवारनाशक बुवाई के तुरंत बाद छिड़के जाते हैं। ये मिट्टी की ऊपरी सतह पर एक रासायनिक परत बना देते हैं, जिससे अंकुरित होने वाले खरपतवार प्रारंभिक अवस्था में ही नष्ट हो जाते हैं। इनकी प्रभावशीलता काफी हद तक मिट्टी में उपलब्ध नमी पर निर्भर करती है। यदि छिड़काव के बाद पर्याप्त वर्षा या सिंचाई उपलब्ध हो जाए, तो इनका परिणाम कहीं अधिक बेहतर मिलता है।

पिछले कुछ वर्षों में प्री-इमर्जेंस खरपतवारनाशकों के विकल्पों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। पहले जहां किसानों के पास मुख्य रूप से पेन्डीमेथालिन या मेट्रिब्यूजिन जैसे सीमित विकल्प थे, वहीं अब पाइरोक्सासल्फोन, सल्फेन्ट्राजोन, डायक्लोसुलम और फ्लूमिऑक्साजिन जैसे नए सक्रिय तत्व उपलब्ध हैं। इनके अलावा कई प्रीमिक्स उत्पाद भी बाजार में उपलब्ध हैं, जो एक साथ घास कुल, चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों और कुछ अन्य कठिन खरपतवारों पर प्रभावी नियंत्रण प्रदान करते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि विभिन्न मोड ऑफ एक्शन वाले खरपतवारनाशकों का उपयोग खरपतवारों में प्रतिरोधक क्षमता (Herbicide Resistance) विकसित होने की संभावना को भी कम करता है। यही कारण है कि आधुनिक खरपतवार प्रबंधन केवल एक ही रसायन पर निर्भर रहने के बजाय विभिन्न सक्रिय तत्वों के वैज्ञानिक उपयोग पर बल देता है।

समेकित खरपतवार प्रबंधन ही स्थायी समाधान

राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान स्पष्ट रूप से यह भी सलाह देता है कि खरपतवारनाशकों को अकेले समाधान नहीं माना जाना चाहिए। समय पर बुवाई, अच्छी भूमि तैयारी, आवश्यकतानुसार कल्टीवेटर का उपयोग, फसल चक्र अपनाना तथा आवश्यकता पड़ने पर यांत्रिक या हाथ से निराई जैसे उपाय भी खरपतवार प्रबंधन का अभिन्न हिस्सा हैं। 

आज भारतीय किसानों के पास खरपतवार नियंत्रण के लिए पहले की तुलना में कहीं अधिक वैज्ञानिक विकल्प उपलब्ध हैं। लेकिन किसी भी खरपतवारनाशक की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसका चयन खेत में मौजूद खरपतवारों की प्रकृति, फसल की अवस्था और अनुशंसित मात्रा के अनुसार किया गया है या नहीं।

आईसीएआर–राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान की नवीनतम अनुशंसाएँ स्पष्ट संकेत देती हैं कि यदि किसान सही समय पर सही खरपतवारनाशक का चयन करें, अनुशंसित मात्रा में उसका उपयोग करें तथा समेकित खरपतवार प्रबंधन की रणनीति अपनाएँ, तो न केवल शुरुआती खरपतवार प्रतिस्पर्धा को प्रभावी ढंग से रोका जा सकता है, बल्कि सोयाबीन की उत्पादकता और लाभप्रदता में भी उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है।

सोयाबीन में फसल उगने के बाद (Post-Emergence – PoE) उपयोग हेतु अनुशंसित खरपतवारनाशक

(A) बुवाई के 10–12 दिन बाद

रासायनिक नाम / फॉर्मुलेशनमात्रा प्रति हेक्टेयर
क्लोरीम्यूरॉन एथाइल 25 WP + सर्फेक्टेंट36 ग्राम
बेंटाजोन 48 SL2.00 लीटर

(B) बुवाई के 15–20 दिन बाद

रासायनिक नाम / फॉर्मुलेशनमात्रा प्रति हेक्टेयर
क्लेथोडिम 13% EC (12% w/v EC)1000 मि.ली.
इमेजेथापायर 10 SL1.00 लीटर
इमेजेथापायर 70 WG + सर्फेक्टेंट100 ग्राम
क्विज़ालोफॉप एथाइल 5 EC0.75–1.00 लीटर
क्विज़ालोफॉप-पी-एथाइल 10 EC375–450 मि.ली.
फेनॉक्सीप्रॉप-पी-एथाइल 9.3 EC1.11 लीटर
क्विज़ालोफॉप-पी-टेफ्यूरिल 4.41 EC0.75–1.00 लीटर
फ्लूएज़ीफॉप-पी-ब्यूटाइल 13.4 EC1.00–2.00 लीटर
हेलॉक्सीफॉप-आर-मेथाइल 10.5 EC1.00–1.25 लीटर
प्रोपाक्विज़ाफॉप 10 EC0.50–0.75 लीटर
क्लेथोडिम 25 EC0.50–0.70 लीटर
फ्लूथियासेट मिथाइल 10.3 EC125 मि.ली.

(C) प्री-मिक्स पोस्ट-इमर्जेंस खरपतवारनाशक

रासायनिक नाम / फॉर्मुलेशनमात्रा प्रति हेक्टेयर
फोमेसाफेन 17.5% + क्लोडिनाफॉप-प्रोपार्जिल 12.5% ME1000 मि.ली.
मेटामीफॉप 8% + इमेजेथापायर 4% + इमेजामॉक्स 3% ME1000 मि.ली. + 750 ग्राम अमोनियम सल्फेट
हेलॉक्सीफॉप-आर-मेथाइल एस्टर 16.5% + क्लोडिनाफॉप-प्रोपार्जिल 8% EC1000 मि.ली.
फ्लूएज़ीफॉप-पी-ब्यूटाइल + फोमेसाफेन1.00 लीटर
इमेजेथापायर + इमेजामॉक्स100 ग्राम
प्रोपाक्विज़ाफॉप + इमेजेथापायर2.00 लीटर
फोमेसाफेन + क्विज़ालोफॉप एथाइल1.50 लीटर
फोमेसाफेन 12.5% + क्विज़ालोफॉप एथाइल 4.68% EC1.00 लीटर
क्विज़ालोफॉप एथाइल + क्लोरीम्यूरॉन एथाइल + सर्फेक्टेंट375 मि.ली. + 36 ग्राम + 0.2%
फोमेसाफेन + फेनॉक्सीप्रॉप-पी-एथाइल + क्लोरीम्यूरॉन एथाइल1.00 लीटर
फ्लूथियासेट मिथाइल + क्विज़ालोफॉप एथाइल (2.5% + 10% EC)0.50 लीटर
क्विज़ालोफॉप एथाइल 7.5% + इमेजेथापायर 15% EC0.50 लीटर
फेनॉक्सीप्रॉप-पी-एथाइल 6% + क्लोरीम्यूरॉन एथाइल 0.9% + इमेजेथापायर 10% SC1.00 लीटर

स्रोत : आईसीएआर–राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान द्वारा केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड (CIB) के 31 मार्च 2026 तक के लेबल दावों के आधार पर जारी अनुशंसाएँ।

फसल उगने के बाद खरपतवार नियंत्रण की भूमिका

यद्यपि बुवाई पूर्व (PPI) और बुवाई के तुरंत बाद (PE) उपयोग किए जाने वाले खरपतवारनाशक शुरुआती खरपतवारों पर प्रभावी नियंत्रण प्रदान करते हैं, फिर भी वर्षा की अनियमितता, देर से अंकुरण या मिश्रित खरपतवारों के कारण कई बार कुछ खरपतवार बच जाते हैं। ऐसे में पोस्ट-इमर्जेंस (PoE) खरपतवारनाशक किसानों को स्थिति के अनुसार हस्तक्षेप करने का अवसर देते हैं।

राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान के अनुसार, इन खरपतवारनाशकों का छिड़काव खरपतवारों की प्रारंभिक अवस्था में करना सबसे अधिक प्रभावी होता है। बड़े हो चुके खरपतवारों पर इनकी क्षमता कम हो सकती है। इसलिए समय पर छिड़काव, अनुशंसित मात्रा का पालन और पर्याप्त पानी के साथ फ्लड जेट या फ्लैट फैन नोजल का उपयोग बेहतर परिणाम सुनिश्चित करता है। 

इसके साथ ही संस्थान किसानों को सलाह देता है कि केवल रासायनिक नियंत्रण पर निर्भर रहने के बजाय फसल चक्र, समय पर बुवाई, यांत्रिक निराई-गुड़ाई तथा विभिन्न मोड ऑफ एक्शन वाले खरपतवारनाशकों का क्रमवार उपयोग अपनाया जाए। इससे खरपतवारों में प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने की संभावना कम होती है और दीर्घकाल तक खरपतवार प्रबंधन प्रभावी बना रहता है।


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