चूजों का पोषण

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नवजात चूजे का वजन अण्डे के वजन का लगभग 75 प्रतिशत होता है। एक नवजात चूजा लगभग 72 घण्टों तक बिना दाने के जीवित रह सकता है। परंतु प्रारंभिक दाना देने की शुरूआत शीघ्र करने से उसकी विकास दर अच्छी होती है। चूजों को साफ पेय पानी हर समय उपलब्ध होना चाहिए। चूजों के समुचित विकास हेतु पोषण, प्रजनन, स्वास्थ्य, आवास एवं प्रकाश का उचित प्रबंधन अति आवश्यक है।

चूजों की पोषण व्यवस्था-

चूजों के आने पर 8 प्रतिशत गुड़ या शक्कर का घोल देना चाहिए, ताकि तुरंत ऊर्जा की पूर्ति हो सके। गर्मी के दिनो में इलेक्ट्राल या ओआरएस का पावडर पीने के पानी में देना चाहिए। शुरूआत के दो हफ्तों में एक दिन के अंतराल में विटामिन मिश्रण पीने के पानी में देना चाहिए। सान्द्र आहार (दाना सम्मिश्रण) पहले दिन में ही देना शुरू करना चाहिए। सान्द्र आहार में मुख्य रूप ऊर्जा स्त्रोत के रूप में मकई, चॉवल, कनकी, गेहूं, ज्वार, बाजरा तथा प्रोटीन स्त्रोत के रूप में सोयाबीन, मूंगफली, बिनौला खली, दाल चुन्नी एवं मछली के चूरा का उपयोग किया जाता है। खनिज लवण मिश्रण 1.5 भाग प्रति 100 किलोग्राम मिलाया जाना चाहिए। नमक की मात्रा 0.6 भाग प्रति 100 किलोग्राम होनी चाहिए। विटामिन मिश्रण 50-100 ग्राम प्रति 100 किलोग्राम मिलाना चाहिए।

उन्नत जनन द्रव्य का उपयोग-
ग्रामीण परिवेश हेतु देशी एवं संकर नस्ल के चूजे अधिक उपयुक्त होते हैं क्योकि इनकी रोग प्रतिरोधक एवं गर्मी सहने की क्षमता अधिक होती है।

रोग प्रतिबंधात्मक टीकाकरण:
पहले दिन मरेक्स बीमारी, 5 वें दिन लासोटा रानीखेत, 14वें दिन गुम्बोरो, 28 वें दिन रानीखेत एफ-वन एवं 35 वें दिन गुम्बोरो इण्डरमीडियेट टीकारण निर्धारित विधि के अनुसार अनिवार्य रूप से करना चाहिए।

कृमिनाशक दवा पान-
कृमिनाशक दवा हर चार हफ्ते में एक बार दी जानी चाहिए, जिससे समस्त अंत: परजीवी खत्म हो सके। बाह्य परजीवी किल्ली, पेशुंआ, जुआं इत्यादि को खत्म करने हेतु बीएचसी पावडर राख में (1:10) पंखों के बीच में लगाया जाना चाहिए।

आवास व्यवस्था:
सामान्यतया 100 मुर्गियों के लिए 634.533 मीटर (लम्बाई 3 चौड़ाई 3 ऊँचाई) का मुर्गी घर उपयुक्त है। मुर्गीघर का लम्बवत् अछ पूरब से पश्चिम की ओर रखने से सूर्य की गर्मी का प्रकोप कम होता है। मुर्गीघर की छत्त की छज्जा तीन फीट तक की होने से धूप एवं बरसात से मुर्गियों को बचाया जा सकता है। एक चूजे को 0.25 फीट की जगह की आवश्यकता होती है, जिसे क्रमश: बढ़ाकर 1 वर्ग फीट प्रति किलो शारीरिक भार के हिसाब में जगह देना चाहिए।
मुर्गी को फर्श बिछाली पद्धति में रखने से पूर्व मुर्गी घर की चूने से पुताई करनी चाहिए। मुर्गी घर के समस्त उपकरणों जैसे दाने के बरतन, पानी के बरतन, ब्रूडर गार्ड इत्यादि को सोडा से साफ कर धूप में सूखा देवें, जिससे ये पूरी तरह कीटाणुमुक्त हो जावें। मुर्गीघर को विध्रुमीकृत (फ्यूमीगेशन) द्वारा कीटणुमुक्त करना चाहिए। फ्यूमीगेशन पोटाश (60 ग्राम एवं फार्मोलिन) (120 मि.ली.) प्रति 100 क्यूसिक फीट जगह के हिसाब से करना चाहिए। हमेशा पोटाश में ही फार्मोलिन मिलानी चाहिए। मुर्गीघर का फ्यूमीगेशन पूरी साफ-सफाई, चुना पोताई एवं बिछावन बिछाने के बाद ही करना चाहिए। फ्यूमीगेशन करने के पूर्व मुर्गीघर के सभी खिड़कियों एवं दरवाजे बंद कर देने चाहिए।

बिछावन व्यवस्था-
मुर्गीघर में फर्श में बिछाने हेतु पैराकटिया, धान भूसी, मूंगफली के छिलके, लकड़ी का बुरादा उपयुक्त बिछावन है। पहले 4 हफ्ते में बिछावन की मोटाई 2 इंच होनी चाहिए एवं दूसरे हफ्ते हमें 4 इंच कर देना चाहिए। बिछावन में 1 किलो चूना पाऊडर प्रति 15 वर्ग फीट के हिसाब में प्रयोग करना चाहिए।

प्रकाश व्यवस्था-
चूजों को बाहरी गर्मी की आवश्यकता होती है इसे बू्रडिंग कहते हैं। चूजों को शुरू के छ: हफ्तों में 23 घण्टे प्रकाश एवं 1 घण्टे का अंधेरा होना चाहिए। पहले 3 दिनों में तापमान 35 डिग्री सेल्सियस रखना चाहिए एवं इसे प्रति 3 दिनों में 3 डिग्री सेल्सियस में घटाते हुए 6 हफ्ते तक 24 डिग्री सेल्सियस तक घटाना चाहिए। सफल ब्रूडिंग का परीक्षण चूजों के नीचे समान वितरण द्वारा लागया जाता है। चूजों के चारों तरफ 1 फीट ऊँचाई का बू्रडर गार्ड का उपयोग शुरूआत के 10 दिनों के लिए करना चाहिए, जिससे चूजे बल्ब की गर्मी, दाना एवं पानी के बरतनों के पास ही रख सके। इसके अलावा शुरूआत के 7 दिनों के लिए बिछावन के ऊपर अखबार या गत्ता बिछाना चाहिए, जिससे चूजे बिछावन को नहीं खावें। मुर्गीघर मे प्रकाश हेतु 4.0 वॉट का बल्ब प्रति 100 फीट हेतु पर्याप्त होता है। बू्रडर द्वारा अतिरिक्त गर्मी शुरू के 4 हफ्तों आवश्यक है। एक ब्रूडर (434) फीट 250 चूजों हेतु पर्याप्त होता है। चूजों के लिए दाने एवं पीने के बरतन कम गहरे होने चाहिए।

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