अवैध बसाहटों की जिम्मेदार म.प्र. सरकार

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अकर्मण्य प्रशासन, राजनीतिबाज लोगों का गठजोड़ है भू-माफियाओं का संरक्षक

मध्यप्रदेश में राजस्व विभाग की विधि एवं प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार के उद्देश्य से नित नये नवाचार किये जा रहे हैं। इसके बावजूद उत्तरदायित्व विहीन प्रशासनबढ़ते राजनैतिक हस्तक्षेप एवं नियमन-नियंत्रण के अभाव में चौपट होने के कगार पर है।
पिछले वर्ष बड़ी संख्या में राजस्व के वर्षों से लंबित प्रकरणों का निपटारा किया गया लेकिन अंबार क्यों लगा, इसके लिए जिम्मेदार कौन था और ऐेसे लापरवाह अधिकारियों पर अंकुश लगाने के लिए क्या कठोर कार्यवाही की गई, क्या इस प्रश्न पर भी कभी विचार किया गया? राजस्व विभाग में खाली पड़े पदों को भरने का काम समयबद्ध रूप से क्यों नहीं किया गया। हड़बड़ाहट में एक साथ नौ हजार पटवारी और पांच सौ तहसीलदार नियुक्त करने की नौबत क्यों आई?, क्या महिला पटवारी की भी कोई जमीनी स्तर पर नियुक्ति करने पर किसानों को राहत मिली अथवा उनकी परेशानियां बढ़ी, इसका आकलन या समीक्षा की गई? भोपाल जिले में ही प्रशिक्षण के बावजूद अधिकांश पटवारी, जमीनों के सीमांकन के लिए सर्वेक्षण मशीनों का उपयोग करने में अयोग्य हैं। सीमांकन का कार्य निजी क्षेत्र के लोगों द्वारा किया जा रहा है, गिरदावर (रेवेन्यू इंस्पेक्टर) केवल ऐसी रपटों पर हस्ताक्षर कर अपनी कर्तव्य पूर्ति कर रहे हैं। क्या किसी भी प्रशासनिक अधिकारी ने इनकी खबर ली और वह लेता भी कैसे क्योंकि खुद उसको भी इस विषय में न तो कोई ज्ञान है, न अनुभव और न ही प्रशिक्षण। इसके बावजूद प्रदेश सरकार सीमांकन का कार्य निजी क्षेत्र के हवाले कर रही है, ऐसी क्या मजबूरी हैं? यदि शासकीय अधिकारी -कर्मचारी अकार्यकुशल हैं तो केवल उच्च तकनीक पर आधारित मशीनों का सीमांकन के लिये जबरिया प्रयोग का फरमान कितना जायज है। किसानों के मध्य सर्वाधिक विवाद, लड़ाई-झगड़े, सिर फुटव्वल की नौबत सीमांकन विवाद के कारण ही है।

  • कृषि भूमि का बिना लैंड यूज बदले प्लाटों का पंजीयन क्यों?
  • सीमांकन का काम निजी क्षेत्र के हवाले क्यों?
  • हड़बड़ाहट में 9 हजार पटवारी और 500 तहसीलदारों की भर्ती क्यों?

वैसे भी मशीन से टोटल सीमांकन कार्य कराने की वैधानिक मान्यता म.प्र. भू अभिलेख संहिता में नहीं है। बिना इस संहिता में संशोधन किये केवल निजी क्षेत्र में कार्यरत व्यक्तियों को उपकृत करने के लिये विभागीय कर्मचारियों की अकार्यकुशल प्रणाली पर पर्दा डालने की, जिम्मेदारी से मुंह छिपाने की प्रक्रिया मात्र है। जब पटवारी सीमांकन नहीं करेगा, फसलों का बोआई क्षेत्र सेटेलाइट से सर्वे कर तय किया जाएगा, जमीन की खरीदी बिक्री के पंजीयन के साथ ही नामांतरण हो जाएगा। अब तो खसरा-खतौनी, नक्शे की नकल भी कम्प्यूटर से मिल रही है ऐसी परिस्थितियों में पटवारियों की लंबी-चौड़ी फौज क्या करेगी?

गांवों में प्रशासन अतिक्रमण हटा नहीं सकता। स्वयं मुख्यमंत्री कहते हैं वर्ष 2016 तक जो जहां बसा था उसका उसी जगह पर अतिक्रमण को वैधानिक मान्यता प्रदान कर पट्टा दे दिया जाएगा। वन भूमि और राजस्व भूमि पर किये गये अतिक्रमण को मान्यता देकर भूमि स्वामी अधिकार दिये जायेंगे तब किसी भी वैधानिक नियमन-नियंत्रण की अपेक्षा करना ही व्यर्थ है। जिसकी लाठी उसकी भैंस यही शासन की लोक-लुभावन नीति है। सत्ता में बने रहने के यही प्रयास प्रजातांत्रिक व्यवस्था से जुड़े देश का दुर्भाग्य है। जिनके हाथों में शासकीय संपत्ति के संरक्षण का भार है वे ही उसे लूटने की खुली छूट दें, प्रोत्साहन दें व दंडात्मक व्यवस्था कायम करने की बजाए ईमानदार कर्मचारियों को तबादला करने की धौंस दें तो फिर कानून-व्यवस्था की दुहाई देना ही व्यर्थ है।

आज मध्यप्रदेश में आलम यह है कि राजधानी भोपाल के ही शहरी निवेश क्षेत्र के गांवों में दबंग वर्षों से शासकीय भूमियों पर अतिक्रमण कर खेती कर रहे हैं। इन अनाधिकृत कब्जों पर विद्युत वितरण कंपनियों ने सिंचाई पम्पों के लिये स्थाई विद्युत कनेक्शन दे दिये हैं। स्वयं मुख्यमंत्री इनके पैरोकार और संरक्षक बन कर कह रहे हैं कि शासकीय भूमि पर कब्जा कर खेती करने वाले लोग भी प्राकृतिक आपदा की स्थिति में शासकीय सहायता राशि के हकदार हैं, ऐसी अभूतपूर्व स्थितियां न्यायिक एवं प्रशासनिक कार्यप्रणाली और व्यवस्थाओं पर गंभीर प्रश्न चिन्ह है। सच तो यही है कि अकर्मण्य प्रशासन और राजनीतिबाज लोगों का गठजोड़ ही भू-माफियाओं, अतिक्रमणकारियों को संरक्षण देने के लिये ढाल बनकर खड़ा हुआ है। सत्ता हथियाने और उस पर काबिज बने रहने के लिए हमारे नेता जिन पर संवैधानिक जिम्मेदारी है, मर्यादाओं की सभी हदें लांघने के लिये तत्पर हैं।
हाल ही में राज्य सरकार अवैध बसाहटों को वैधानिक स्वरूप देने का निर्णय कर रही है परंतु क्या कभी उसने सोचा है कि इतने ढेर सारे शासकीय कर्मचारियों, विभागों के कार्यरत रहते अवैध बसाहटें क्यों कायम हुई, इसके लिये कौन जिम्मेदार है? हकीकत में इन अवैध बसाहटों, कालोनियों की जिम्मेदार खुद राज्य सरकार की नीतियां हैं।
केवल स्टाम्प ड्यूटी से मतलब
कृषि भूमि पर बिना लेंड यूज बदले छोटे प्लॉटों का पंजीयन क्यों किया जा रहा है, पंजीयन विभाग को केवल स्टांप ड्यूटी से मतलब है, सही गलत का निर्णय तो उसने क्रेता-विक्रेता पर छोड़ कर अपना पल्ला झाड़ लिया है। कृषि भूमि के वर्गफुट में दाम पंजीयन विभाग क्यों तय करता है? क्या 20&30 अथवा 30&50 वर्गफुट का भूखंड कृषि भूमि के दायरे में आता है? और इसे कृषि भूमि मानकर तहसीलदार भी नामांतरण कर भू-अधिकार-अभिलेख पुस्तिका जारी कर देता है। और ऐसा इसलिए होता है कि हर ऐसे अवैध रूप से विक्रित भूखंड पर पंजीयन विभाग को स्टाम्प शुल्क लेने से मतलब है और राजस्व व्यवस्था से जुड़े कर्मचारियों को नामांतरण करने पर भारी रिश्वत मिलती है। एक 20&30 अर्थातं 600 फुट के भूखंड के नामांतरण के लिए राजस्व प्रशासन से जुड़े कर्मचारी 8 से 10 हजार रु. आसानी से कमा लेते हैं। ये वर्तमान में राजधानी में प्रचलित रिश्वत के सामान्य दाम हैं और शासन भी केवल कर के रूप में राजस्व वसूली के लिए ऊटपटांग नियम बनाती है। आप चाहे पांच हजार वर्गफुट कृषि भूमि क्रय करें अथवा 1 एकड़ अथवा 50 एकड़ लेकिन राजधानी से सटे गांवों में हर कृषि भूमि के क्रय-विक्रय पर पहले पांच हजार वर्गफुट पर पंजीयन शुल्क प्रति वर्गफुट के हिसाब से देना ही होगा और कई गांवों में यह पांच हजार वर्गफुट का मूल्य एक एकड़ जमीन के दाम से भी अधिक हो जाता है।
भू-माफिया के शिकंजों में किसान
किसान अपनी विवशता में यदि जमीन का कोई छोटा टुकड़ा भी बेचना चाहे तो पहले पांच हजार वर्गफुट का प्रति वर्गफुट के हिसाब से मूल्यांकन कर इस पर लगने वाले पंजीयन शुल्क की धनराशि हर क्रेता को भारी पड़ती है वह जमीन खरीदने से ही मना कर देता है और आवश्यकता पूर्ति के लिये जमीन न बिक पाने पर किसान या तो आत्महत्या को विवश हो जाता है अथवा पावर ऑफ अटार्नी देकर भू माफियाओं के शिकंजे में फंस जाता है। उच्च पदों पर विराजमान राजस्व व्यवस्था से जुड़े अधिकारी लापरवाही अथवा राजधानी की अति व्यस्त प्रशासनिक कार्यप्रणाली के चलते गांवों तक पहुंच नहीं पाते और पटवारियों की कम समय में बार-बार बदली के कारण पूरी प्रशासनिक व्यवस्था ही उत्तरदायी पूर्ण नहीं बन पाती और इन सबका खामियाजा निरीह विवश किसान उठाता है।
राज्य की भूमियों के संरक्षण, नियमन का जिन पर उत्तरदायित्व है वे राजनेता ही यदि भूमि पर अवैध रूप से अतिक्रमणधारी लोगों के संरक्षक और भाग्य विधाता बन जायें, उनका नियमितीकरण कर वैधानिक स्वरूप प्रदान करने लगें तब प्रशासनिक तंत्र तो विवशता से किंकर्तव्य विमूढ़ तो होगा ही- यही प्रदेश की और प्रदेशवासियों की नियति है।

  • श्रीकान्त काबरा
    मो. : 9406523699
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