महाशिवरात्रि पर ओले-वर्षा का सटीक पूर्वानुमान

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प्राचीन भारतीय ऋतु विज्ञान के संदर्भ में

मध्य प्रदेश के एक बड़े भूभाग में असमय वर्षा ओलावृष्टि से फसलों को भारी क्षति पहुंची है। इस वर्षा से केवल गेहूं की देरी से बोआई वाले खेतों को लाभ पहुंचा है।
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग भी मौसम संबंधी प्रचलित लोकोक्तियों- कहावतों को हमारे पारंपरिक ज्ञान तथा संस्कृत भाषा में उपलब्ध मौसम संबंधी जानकारियों की सहायता लेकर यदि मौसम के पूर्वानुमान जारी करें तो उसमें अधिक सटीकता आ सकती है। सेटेलाइट और महंगे उपकरणों की सहायता से मौसम का वैज्ञानिक पद्धति से तात्कालिक पूर्वानुमान लगाया जा सकता है परन्तु लम्बी अवधि का पूर्वानुमान लगाने में प्रचलित लोकोक्तियां मार्गदर्शी हो सकती हैं। हम पढ़े-लिखे भारतीयों की एक धारणा बन गई है कि विदेशी ज्ञान ही प्रामाणिक ज्ञान है और पारंपरिक ज्ञान अविश्वसनीय, अवैज्ञानिक, अंधविश्वास पर आधारित है। खैर यह विवेचना का विशद विषय है। पारंपरिक कृषि ज्ञान के आधार पर शिवरात्रि का वर्षा से संबंध दर्शाती लोकोक्ति इस प्रकार है-
‘मंगल-सोम होय शिवराती
पछुआ बाय चले दिन राती
घोड़ा, रोड़ा, टिड्डी उड़े
राजा मरै या धरती पड़े।
महाशिवरात्रि यदि सोमवार अथवा मंगलवार की हो पश्चिमी दिशा से आने वाली हवा दिन रात बहे तो बड़े टिड्डे (राम जी का घोड़ा, ग्रासोफर), ओला वृष्टि (रोड़ा) और टिड्डी दल आने की संभावना होती है। इस कारण धरती में अन्न की फसलों पर संकट और ऐसी परिस्थितियां होने पर शासक पर निराकरण के लिए अर्थव्यवस्था जुटाने, सहायता राशि बांटने का भार रहता है। राजा मरै का मतलब राजा का मरना नहीं जानकर उसका ऐसी परिस्थितियों के आसन्न चिंताग्रस्त होना मानना चाहिए।
इस वर्ष महाशिवरात्रि मंगलवार की थी और मौसम का बदलाव स्पष्ट रूप से लोकोक्ति की प्रासंगिकता को दर्शा रहा है।
मौसम के पूर्वानुमान के लिए महंगे और जटिल उपकरणों की मदद लेने में हमारे वैज्ञानिकों को कोई परहेज नहीं है लेकिन विलुप्त होते पारंपरिक ज्ञान को सहेजने और आजमाने में वे असहज हो उठते हैं। हमारे सनातन कृषि ज्ञान को विज्ञान की कसौटी पर परीक्षण करने की बजाए उसे नकार देना भी अवैज्ञानिकता ही है।
कृषि के संदर्भ में हमारे पारंपरिक ज्ञान को यदि हमने संजोये रखा होता तो इस असामयिक वर्षा और ओलावृष्टि का हम सहज ही पूर्वानुमान लगा सकते थे परन्तु हमारे पारंपरिक ज्ञान की उपेक्षा कर हमने अमेरिका से उधार लिये कृषि ज्ञान को ही वरीयता दी। प्रदेश का पहला कृषि विश्वविद्यालय (जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय जबलपुर) अमेरिका की सहायता से इलिनाय विश्वविद्यालय को प्राप्त ज्ञान के आधार पर निर्मित हुआ और आर्थिक दुरावस्था के चलते कभी पारंपरिक ज्ञान को सग्रहित करने की कोई कोशिश ही नहीं की। आज भी भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान नई दिल्ली द्वारा निर्देशित कृषि अनुसंधान योजनाओं पर ही कार्य हो रहा है। स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में अंग्रेजी भाषा ही हावी है और इस पाठ्यक्रम के अंतर्गत वैज्ञानिक लेखन कार्य की विधा में अंग्रेजी भाषा का ही प्रभुत्व है। अपनी स्थापना के 55-56 वर्ष से अधिक बीत जाने के बाद भी प्रदेश में प्रचलित राजभाषा हिन्दी में कोई शोधकार्य नहीं लिखा जा रहा है।

  • श्रीकांत काबरा, मो. : 9406523699
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