पशुओं के रोग

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गलघोंटू– यह बीमारी पाश्चुरेल्ला मल्टोसिडा नामक जीवाणुओं के प्रकोप से होती हैं।
लक्षण- इस बीमारी से ग्रसित पशु को तेज बुखार (106 से 108 डिग्री सेल्सियस तक) हो जाता हैं मुंह से बहुतायत में लार बहती हैं, सिर में तथा अगले दोनों पैरों के बीच दुखदायी सूजन, पेटशूल तथा भूख न लगना, साँस लेने में तकलीफ, खून भरे दस्त, आंखों में सूजन, जीभ बड़ी तथा लाल होना, गिटकने में कठिनाई आदि लक्षण दिखाई देते हैं।
बचाव:– बरसात से पूर्व गलघोंटू रोग विरोधी टीका ऑईल अॅडज्युव्हंट- वैक्सीन जिस पशु का शरीर भार 150 कि.ग्रा. तक हैं उन्हें लगवायें। जिन पशुओं का शरीर भार 150 किलो से ज्यादा हैं उन्हें अॅलम प्रेसिपिटेटेड वॅक्सीन 5 से 10 मिली त्वचा के नीचे लगवायें। टीकाकरण करने से पशु के शरीर में एक वर्ष तक इस रोग विरोधी शक्ति बनी रहती हैं। टीकाकरण न करने पर पशु की मृत्यु हो सकती हैं।
जहरी बुखार- इसे अंग्रेजी भाषा में अॅथ्रेक्स कहते हैं तथा ये बॅसिलस अॅथ्रॅसिस नामक जीवाणुओं के प्रकोप से होता हैं।
लक्षण- पशु को तेज बुखार होता है, पेट फूल जाता हैं, सभी प्राकृतिक छिद्रो से यानि नॉक, मुंह, योनी द्वार, गुद्दवार, कान से गहरे काले रंग का खून बहता हैं जो जमता नहीं हैं यह इस बीमारी का प्रमुख लक्षण हैं। बीमारी बढऩे पर पशु की मृत्यु हो जाती हैं।
बचाव- बरसात से पहले इस रोग विरोधी टीका ऑँरी अंथ्रंक्स सीरम और साथ ही ब्रॉड स्पेक्ट्रम प्रति जैविक अंटीसीरम 100 से 350 मि.ली नस में लगवायें।
लंगड़ा रोग- अंग्रेजी में इस रोग को ब्लॅक क्वार्टर नाम से जाना जाता हैं तथा यह क्लोस्ट्रीडियम शोव्हाय नामक जीवाणुओं के प्रकोप से होता हैं.
लक्षण– पशु को तेज बुखार होता हैं, पु_ïों पर विशेषकर पिछले पु_ïे पर तथा शरीर में सूजन पैदा हो जाती है। पु_ïों पर जो सूजन पैदा होती हैं उसे दबाने पर करकर जैसी आवाज आती हैं क्योंकि उसमें जीवाणु गैस (वायु) पैदा करते हैं।
बचाव – बरसात से पूर्व इस रोग विरोधी टीका (अंटीसीरम) 200 से 400 मिली नस में लगवायें।
उपाय- पेनीसिलीन, सिप्रोफ्लोक्सासीन तथा नॉर फ्लोक्सासीन जैसे प्रति जैविक इस रोग को नियंत्रण करने में काफी प्रभावशाली पाये गये हैं। लेकिन पशुओं को इस रोग की बाधा होती ही नहीं चाहिए इसलिये इस रोग विरोधी टीका बरसात से पहले अवश्य लगवा लें.
खुरपका-मुंहपका रोग- इसे अंग्रेजी भाषा मे फूट अंड माउथ डिसीज कहते हैं क्योंकि इस रोग से ग्रसित पशु के पैर तथा मुंह दोनों ज्यादा प्रभावित होते हैं.
लक्षण- इस रोग से ग्रसित पशु को तेज बुखार (104 से 106 डिग्री सेल्सियस तक) हो जाता हैं। पशु के मुंह में छाले हो जाते हैं जो बाद में फूट जाते हैं और वहाँ जख्म बन जाते हैं। इससे पशु के मुंह से लगातार चिपचिपी लार टपकती रहती हैं जो गाढ़ी होती हैं और मुंह से जमीन तक तार के माफिक टपकती रहती हैं। पशु के मुंह में दर्द होने से वह कुछ भी खा नहीं सकता अत: कमजोर हो जाता हैं।
उपाय– बचाव: यह रोग विषाणु जन्य होने के कारण इस रोग का कोई उपाय नहीं हैं। रोग होने पर प्रति जैविक देना चाहिए लेकिन पशुओं को यह रोग होना ही नहीं चाहिए इसलिये बरसात से पूर्व इस रोग-विरोधी टीका क्वाड्री -व्हॅलंट फील्ड,वॅक्सीन चमड़ी के नीचे लगवाना चाहिए।

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