सरकारी पैसा निजी खातों में

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नई दिल्ली। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने केंद्र की महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेवीवाई) के क्रिया्वयन में पैसे का इस्तेमाल कहीं और किए जाने समेत कई अनियमितताएं पकड़ी हैं।
केंद्र की इस योजना का संचालन राज्य सरकारें करती हैं। ये अनियमितताएं वर्ष 2007 से 2013 के बीच की अवधि की हैं। इसमें 750 करोड़ से अधिक राशी अधिकारियों के निजी खातों में पड़ी मिली। पिछले दशक में कृषि क्षेत्र की विकास दर लडख़ड़ाने के बाद 11वीं पंचवर्षीय योजना के तहत केंद्र सरकार ने कृषि गतिविधियों में तेजी लाने के लिये यह योजना शुरू की थी।

देख रेख में कमी
कृषि मंत्रालय ने योजना लागू करने और इस पर निगरानी के लिये नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ रूरल डेवलपमेंट (एनआईआरडी) और 25 अन्य सलाहकारों की सेवाएं ली थीं। लेकिन मंत्रालय ने योजना की वित्तीय जांच के लिये इंटरनल ऑडिट की पुख्ता व्यवस्था नहीं की। निगरानी तंत्र भी प्रभावी नहीं था। इसी के चलते यह स्थिति निर्मित हुई।

इसका उद्देश्य इस क्षेत्र की विकास दर 4 फीसदी सालाना तक पहुंचाने में राज्यों को प्रोत्साहन देना था। कैग ने गत दिनों संसद में अपनी रिपोर्ट पेश की। इसके मुताबिक कई मौकों पर मंजूरी से ज्यादा रकम खर्च की गई।
सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि राज्यों ने राशि के गलत इस्तेमाल पर भी यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट (यूसी) जारी कर दिए। राज्यों ने अनुदान के तहत मिली राशि खर्च नहीं की या आंशिक खर्च की, लेकिन उन्होंने यूटि-लाइजेशन सर्टिफिकेट पूरी प्राप्त राशि के लिये जारी किया। 26 राज्यों ने सितंबर 2013 तक 2,610.07 करोड़ रुपये अधिक राशि के यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट जारी किे। योजना के तहत वर्ष 2007-08 से 2012-13 के बीच 32,460.45 करोड़ रु. आवंटन हुए थे। 28 राज्यों और रात केंद्र शासित प्रदेशों को 30,873.38 करोड़ रु. की राशि जारी हुई।
2007-08 से 2012-13 के बीच कुल 4000 से ज्यादा परियोजनाओं पर काम हुआ, जिनमें से कैग ने 393 की जांच की। आर.के.वी.वाई के तहत उप योजनाएं जैसे 60,000 दलहन गांवों का विकास राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन आदि में भी कैग ने भी भारी अनियमितताएं पाई हंै। कैग के मुताबिक राज्य व जिला स्तर पर फंडों को दूसरे प्रयोजन में लगाने, परियोजनाओं के चयन और क्रियान्वयन को लेकर लचर योजना, केंद्र की ओर से उचित निगरानी न होने की वजह से देश के खजाने को भारी नुकसान पहुंचा है।
उ.प्र. में पाया गया कि 61.43 करोड़ रुपये के बीज की आपूर्ति किसानों को बुआई के बाद की गयी।

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