अलनीनो की मार से यूँ बचाएं फसलें

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भारत की दो तिहाई आबादी खेतीहर आमदनी पर पूर्ण रूपेण निर्भर है। समस्त प्रयासों के बावजूद आज भी खेती का 40 प्रतिशत क्षेत्र वर्षा आधारित ही है। लाखों किसानों ने अभी से आसमान की ओर देखना शुरू कर दिया है, क्योंकि उनकी अधिकतर ज्वार, कपास, धान, मक्का आदि फसलों की बोनी समय पर करने एवं सफल फसल उत्पादन हेतु वर्षा की मात्रा, निरन्तरता एवं समय अत्यन्त आवश्यक है। भारत के 81 राष्ट्रीय स्तर के जल बंधानों में संचित जल जो सिंचाई, पन बिजली, पेयजल आदि के उपयोग में आता है, पर्याप्त वर्षा की आमद पर ही निर्भर है। अच्छे मानसून से जुड़ा भरपूर उत्पादन ग्रामीण क्षेत्रों ही नहीं शहरी क्षेत्र एवं व्यापार के परचम फहराने में सहायक है। पिछले वर्ष देश में सामान्य से 12 प्रतिशत कम वर्षा हुई जिसने खाद्यान्नों, तिलहनों, कपास आदि के उत्पादन पर 5 से 10 प्रतिशत का विपरीत प्रभाव डाला। वर्ष 2014 के नुकसान के चलते इस रबी मौसम में ओला, पाला, अति वृष्टि ने अधिकांश फसलों के उत्पादन एवं गुणवत्ता पर विपरीत असर डाला है। कई प्रदेशों में मौसम की मार ने अनेकों कृषकों को आत्महत्या करने को बाध्य किया है।
भविष्यवाणी के अनुसार अगर मानसून गड़बड़ाता है तो भारत के मध्य भाग में कपास, सोयाबीन, धान अदि फसलों को व उत्तरी एवं पश्चिम भागों में भी कृषि को नुकसान पहुंचेगा। इन दशाओं में तिलहन आयात इण्डोनेशिया एवं मलेशिया से करने की बाध्यता एवं धान की कम उपज़ के कारण फिलिपिंस आदि अनेक राष्ट्रों को निर्यात न होने के कारण अर्थ व्यवस्था पर बोझ पड़ेगा। सूखा एवं विपरीत मौसम कृषि उपज में कमी के मुख्य कारक होने से बाजार में मूल्य वृद्धि एवं मुद्रा स्फूर्ति को बढ़ाता है। पूरे भारत में चल रही रिकार्ड तोड़ गर्मी, आंधी तूफान से उद्यानिकी में आम आदि फलों के उत्पादन में 30 प्रतिशत से अधिक हो रहे नुकसान, इस त्रासदी के पूर्व लक्षण है। पिछले कुछ सप्ताहों में जापान के मौसम वैज्ञानिकों द्वारा भारत में वर्ष 2009 की तरह अलनीनो गडबड़ाने के कारण 70 प्रतिशत अपर्याप्त मानसून की संभावनाओं के अनुमानों ने खद्यान्नों, दलहनों एवं कृषि उत्पादों के बाजार मूल्यों में सुर्खियाँ ला दी हैं।

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