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राज्य कृषि समाचार (State News)

सौंसर के मोरेश्वर की प्राकृतिक खेती से समृद्धि की कहानी

12 जनवरी 2026, (उमेश खोड़े, कृषक जगत, पांढुर्ना): सौंसर के मोरेश्वर की प्राकृतिक खेती से समृद्धि की कहानी – यह प्रेरणादायी कहानी जिला पांढुर्णा के सौंसर विकास खंड में निवासरत कृषक श्री मोरेश्वर डांडवे की है, जिन्होंने परंपरागत खेती से आगे बढ़कर प्राकृतिक खेती और नवाचारों को अपनाते हुए अपनी आय और आत्मनिर्भरता को नई दिशा दी है । कृषक मोरेश्वर डांडवे के पास कुल 4.5 एकड़ कृषि भूमि है। वर्तमान में वे संतरा, गेहूं, लाकाडोना हल्दी, ब्लैक पोटेटो, कंटोला जैसी विविध फसलों की खेती कर रहे हैं तथा इसके साथ-साथ पशुपालन भी कर रहे हैं।

पूर्व की स्थिति– प्रारंभिक दौर में कृषक द्वारा मुख्य रूप से संतरा फसल उत्पादन किया जाता था। उनके खेत में लगभग 500 संतरा के पौधे थे, जिनसे उन्हें प्रतिवर्ष करीब तीन लाख रुपये की आय प्राप्त होती थी।इसके अतिरिक्त कुछ भूमि पर कपास एवं तुवर की खेती भी की जाती थी, जिससे लगभग एक लाख रुपये की अतिरिक्त आय होती थी। इस पूरी खेती में कुल लागत लगभग एक लाख पचास हजार रुपये आती थी और शुद्ध आय लगभग दो लाख पचास हजार रुपये रहती थी। उस समय उनके पास 10 पशु थे, जो पशुपालन का आधार बने हुए थे।

नई तकनीक एवं नवाचार की ओर कदम – आरंभ में कृषक जैविक खेती कर रहे थे, लेकिन बाद में आत्मा परियोजना एवं कृषि विभाग के अधिकारियों के मार्गदर्शन में उन्होंने प्राकृतिक खेती को अपनाने का निर्णय लिया। उन्हें जीवामृत, बीजामृत, दशपर्णी अर्क और घन जीवामृत बनाने तथा इनके उपयोग की वैज्ञानिक विधियाँ बताई गईं।  इन तकनीकों को अपनाने से खेती की लागत में कमी आई और संतरा उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। विभागीय अधिकारियों की सलाह पर संतरे के बगीचे में अंतरवर्ती फसल लेने का प्रयोग किया गया। पिछले वर्ष संतरे के बीच कपास एवं तुवर की फसल उगाई गई।फसलों में जीवामृत, बीजामृत, दशपर्णी अर्क, घन जीवामृत एवं वर्मी कम्पोस्ट के उपयोग से लागत घटकर लगभग 70–80 हजार रुपये रह गई और शुद्ध आय बढ़कर करीब चार लाख पचास हजार रुपये तक पहुँच गई। वर्तमान में उनके पास 12 पशु हैं, जिनमें साहीवाल (1), गिर (4) एवं अन्य देशी गायें शामिल हैं।

वर्मी कम्पोस्ट यूनिट की सफल शुरुआत- कृषक ने 12 बेड से वर्मी कम्पोस्ट व्यवसाय की शुरुआत की, जिससे उन्हें लगभग एक लाख पचास हजार रुपये की शुद्ध आय प्राप्त हुई। आज वे 32 बेड से वर्मी कम्पोस्ट तैयार कर अन्य किसानों को विक्रय कर रहे हैं, जिससे लगभग तीन लाख चालीस हजार रुपये की शुद्ध आय हो रही है।   इसी क्रम में दिसंबर माह से उन्होंने नीम पाउडर निर्माण का कार्य भी शुरू किया। इसके लिए 40 हजार रुपये की लागत से पाउडर मशीन खरीदी गई। लगभग 10 टन नीम पाउडर का निर्माण कर विक्रय किया गया, जिससे तीन माह में करीब 90 हजार रुपये की शुद्ध आय प्राप्त हुई। प्राकृतिक खेती और नवाचारों को अपनाने से कृषक की लागत में उल्लेखनीय कमी आई और आय में निरंतर वृद्धि हुई। जहाँ पहले उनकी वार्षिक आय लगभग तीन लाख रुपये थी, वहीं अब यह बढ़कर 8–9 लाख रुपये प्रतिवर्ष हो गई है।

वर्तमान स्थिति एवं भविष्य की योजना- वर्तमान में कृषक पूरी तरह प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। संतरे के साथ-साथ ककोरा के 400 पौधे लगाए गए हैं। इसके अलावा कुछ क्षेत्र में लाकाडोना हल्दी, काली हल्दी एवं काला आलू की खेती भी की जा रही है, जिससे उन्हें अच्छा लाभ प्राप्त हो रहा है। साथ ही वे वर्मी कम्पोस्ट एवं नीम पाउडर का निर्माण कर उनका विक्रय कर रहे हैं। आगामी वर्ष में वे वर्मी कम्पोस्ट पिट की संख्या बढ़ाने की योजना बना रहे हैं तथा वर्मी कम्पोस्ट और नीम पाउडर की पैकिंग कर किसानों को विक्रय करने का कार्य भी कर रहे हैं। कृषक श्री मोरेश्वर डांडवे की यह सफलता कहानी इस बात का सशक्त उदाहरण है कि यदि किसान प्राकृतिक खेती, नवाचार और विविध आय स्रोतों को अपनाए, तो वह न केवल अपनी लागत को कम कर सकता है, बल्कि अपनी आय को कई गुना बढ़ाकर आत्मनिर्भर और समृद्ध भी बन सकता है।

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