सबसे बड़ी चुनौती है रबी फसल खरीदना

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राज्य बजट

  •  विशेष टिप्पणी
    शशिकांत त्रिवेदी, वरिष्ठ आर्थिक समीक्षक, मो. : 9893355391

8 मार्च, 2021, भोपाल । सबसे बड़ी चुनौती है रबी फसल खरीदना – इस बार राज्य सरकार को 50000 करोड़ रूपये से ज़्यादा वित्तीय घाटे का अनुमान है. सरकार की सन् 2021-22 में कुल आमदनी लगभग 2.15 लाख करोड़ रूपये और खर्चा 2.17 लाख करोड़ रूपये आँका गया है। इतने ज़्यादा घाटे का बजट है फिर भी सरकार को अपनी आमदनी 22 प्रतिशत बढ़ी हुई मिलने की उम्मीद है। लेकिन कर (टैक्स) के इतिहास में कभी नहीं हुआ है। एक बार राज्य की आमदनी 17-18 प्रतिशत तक बढ़ी हुई मिली है। इसका सबसे बड़ा कारण है कोरोना जिसकी थाह पाना अभी मुश्किल है। सर, ठीक तरह से अभी चल ही नहीं रहे हैं। दूसरा एक और कारण यह है कि केंद्र सरकार ने जीएसटी लाते वक्त वादा किया था कि यदि राज्य को 14 प्रतिशत तक बढ़ा हुआ टैक्स नहीं मिला तो वह राज्य को जितना नुकसान होगा उसकी पूर्ति करेंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं क्योंकि केंद्र सरकार जीएसटी लक्ष्य में इसके लागू होने के बाद से ही पिछड़ती रही है।

पिछले साल कोरोना के कारण भी राज्य की आय प्रावधिक अनुमान 1.47 लाख करोड़ से घटकर 1.37 लाख करोड़ रूपये (पुनरीक्षित अनुमान) तक आ गई। बजट में कहा गया है कि राज्य कर सबसे बड़ा खर्च वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान पर है। यदि 55000 करोड़ रुपये या राज्य की कमाई का लगभग आधा वेतन, पेंशन और ब्याज चुकाने में खर्च होगा और कर्ज घटाने और परिशोधन पर लगभग 21000 करोड़ रुपये खर्च है, तब विकास कैसे होगा? राज्य में सरकारी नौकरी में जितना कम नियोजन होगा, निजी क्षेत्र में उतने ही ज़्यादा रोजगार पैदा होंगे।
इस साल नया संकट है किसानों की रबी की फसल खरीदने के लिए पैसे जुटाना। केंद्र सरकार ने देश के बजट में वित्तीय घाटा 9.5 फीसदी बताया है और साल 2021-22 में यह 6.5 फीसदी रहेगा। ऐसी स्थिति में राज्यों को केंद्र करों के माध्यम से प्राप्त पैसे को राज्यों के साथ बाँटने में कठिनाई महसूस करेगा। फिर मध्यप्रदेश जैसे कृषि प्रधान राज्य को ज़्यादा से ज़्यादा कर्ज लेना पड़ेगा, लेकिन मौजूदा हालात सारी दुनिया में अच्छे नहीं है और ज़रूरी नहीं कि राज्य जो भी कर्ज मांगे वो उसे मिल जाए। इस साल फ़ूड कॉर्पोरेशन ने पंजाब राज्य से 130 लाख टन गेंहू खरीदे जाने की खबरें हैं। मध्यप्रदेश ने लगभग 130 लाख टन गेंहू खरीदे जाने की मंशा जताई है। सरकार ने इस वर्ष गेहूं के उपार्जन का समर्थन मूल्य 50 रुपये बढ़ाकर 1975 रूपये प्रति क्विंटल तय किया है मतलब यदि पिछले साल की मात्रा 130 लाख टन गेहूं इस साल भी खरीदा जाता है तो मध्य प्रदेश सरकार को आने वाले एक दो महीनों में 25000 करोड़ रूपये से ज़्यादा धन की ज़रूरत होगी।

प्रश्न है कि क्या इस साल बैंक, मार्कफेड और सिविल सप्लाइज कॉर्पोरेशन को कर्ज देंगे? वो भी 25000 करोड़ रूपये? जब जनता को ये पता है कि सरकार उधार लेकर काम चला रही है तो रिकार्डियन सिद्धांत के मुताबिक जनता आगामी मुश्किलों के लिए बचत करना शुरू कर देती है, लेकिन कोरोना के कारण जनता बेरोजग़ारी से जूझ रही है और सारी बचत भोजन, दवाई और सैनिटाइजर या साबुन खरीदने में खर्च कर चुकी है। जब पहले ही 9.5 प्रतिशत उधार लिया जा चुका है, जैसा कि केंद्रीय बजट में लिखा है, तो रिज़र्व बैंक मनी सप्लाई यानि बैंकों को पैसे कहाँ से देगा?

फिर भी यदि बैंकों ने 25000 करोड़ रुपया गेहूँ खरीदने के लिए दे दिया तो बाकी 25000 करोड़ रुपये के आसपास ही साल भर खर्च चलाने को मिलेगा। सरकार का खर्च लगभग 55000 करोड़ रुपये सैलेरी, पेंशन और ब्याज चुकाने में जायेगा, जाहिर है विकास के दूसरे कामों में धन की कमी महसूस होगी। इस साल राज्य सरकार ने 105 रेल के पुल और लगभग 2500 किमी सड़के बनाने का प्रस्ताव रखा है, 15000 करोड़ रूपये स्वास्थ्य के लिए और 30000 करोड़ रुपये शिक्षा पर भी खर्च करने हैं, 18500 करोड़ रूपये खेती और 25000 करोड़ नगरीय विकास के लिए रखे गए है। बजट आँकड़ों के मुताबिक जब कोरोना काल शुरू भी नहीं हुआ था तब 21000 करोड़ रूपये कम आये तो अब जब कोरोना कहर ढा रहा है तब यह मानना जऱा मुश्किल है कि राज्य को अपने राजस्व में महज 8293 करोड़ रूपये की कमी आएगी और जीएसटी 2021-22 में 35 प्रतिशत से ज़्यादा बढ़ जाएगा। जब केंद्र सरकार ही 6.5 का घाटा अपने बजट में बता चुकी है मतलब 12-14 लाख करोड़ रुपये उसे उधार लेना पड़ेगा तो फिर राज्यों को बचे फंड में जो सकल सकल घरेलू उत्पाद का 2.5 फीसदी होगा उसमे से कितना कर्ज मिलेगा? उम्मीद है आने वाले दो महीने तक सभी किसानों का गेंहूँ वैसे ही खरीद लिया जाए जैसे वे रिकॉर्ड उत्पादन करते आ रहे हैं और विकास के कामों में भी कोई वित्तीय बाधा नहीं आएगी।

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