चना उत्पादन बढ़ाने के लिए कृषि विभाग ने जारी की उन्नत तकनीकी सलाह, किस्म चयन से रोग नियंत्रण तक बताई विधि
28 सितंबर 2026, जयपुर: चना उत्पादन बढ़ाने के लिए कृषि विभाग ने जारी की उन्नत तकनीकी सलाह, किस्म चयन से रोग नियंत्रण तक बताई विधि – राजस्थान कृषि विभाग ने चना उत्पादन की विस्तृत उन्नत तकनीकी विधियों को जारी किया है। कृषि विभाग ने सभी कृषकों से अपील की है कि वो उन्नत किस्मों के चयन से लेकर बीजोपचार, बुवाई, खाद-उर्वरक, सिंचाई, खरपतवार, कीट एवं रोग नियंत्रण तक वैज्ञानिक तकनीक अपनाए। इस संबंध में कृषि संयुक्त निदेशक श्रीमती यशवंती ने शुक्रवार को विस्तृत तकनीकी सलाह जारी की।
किस्मों का चयन
समय पर बुवाई के लिए GNG-2171 (मीरा), GNG-1581 (गणगौर) एवं GNG-1958 (मरुधर) किस्मों का चयन करें। देरी से बुवाई के लिए GNG-2261 (केशव) एवं GNG-2144 (तीज) उपयुक्त हैं। असिंचित/बारानी क्षेत्र के लिए GNG-2461 (मूमल) एवं CSJ-515 तथा काबुली चने के लिए GNG-1969 (त्रिवेणी), GNG-1499 एवं GNG-1292 किस्में बताई गई हैं।
भूमि एवं बीजोपचार
जड़ गलन एवं उखेडा (विल्ट) रोग की रोकथाम के लिए 2.50 किलो ट्राईकोडर्मा हरजेनियम को 50 किलो केंचुआ खाद, सड़ी-गली नमीयुक्त गोबर खाद अथवा सीटी कम्पोस्ट में मिलाकर 15 से 45 दिन तक छाया में रखें। नमी बनाए रखते हुए ढेरी को बोरी या तिरपाल से ढककर रखें और बिजाई से पहले यह मिश्रण एक बीघा खेत में मिला दें। दीमक एवं कटवर्म प्रभावित क्षेत्रों में अंतिम जुताई के समय क्यूनालफोस 1.5 प्रतिशत डस्ट 6 किलो प्रति बीघा की दर से मिट्टी में मिलाने की सलाह दी गई है।
दीमक नियंत्रण के लिए बीज को क्लोरोपाइरिफॉस 20 प्रतिशत 4 मिली, इमिडाक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत 2 मिली अथवा इमिडाक्लोप्रिड 600 एफएस 2.50 मिली प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करें। जड़ गलन एवं उखेडा रोग के नियंत्रण के लिए कार्बेन्डेजिम 50 डब्ल्यूपी 1.5 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार करें। एक हेक्टेयर के बीज को बुवाई से एक घंटे पूर्व राइजोबियम एवं पीएसबी कल्चर पाउडर के तीन पैकेट से उपचारित करने पर नत्रजन एवं फॉस्फोरस उर्वरकों की बचत की जा सकती है।
बुवाई का समय एवं बीज मात्रा
सिंचित क्षेत्र में समय पर बुवाई 20 अक्टूबर से 15 नवम्बर तक करें। 25 अक्टूबर से 5 नवम्बर का समय बुवाई के लिए सबसे उपयुक्त बताया गया है। बारानी क्षेत्रों में अक्टूबर के प्रथम पखवाड़े में बुवाई कर देनी चाहिए। 15 से 25 नवम्बर के बीच देरी से बुवाई करने पर खूड से खूड की दूरी 22.50 सेंटीमीटर रखने से उपज में अधिक कमी नहीं आती। देशी चने के लिए 15 किलो तथा काबुली चने के लिए 25 किलो बीज प्रति बीघा की दर रखें। सामान्य परिस्थितियों में खूड से खूड की दूरी 30 सेंटीमीटर तथा बुवाई की गहराई 7–8 सेंटीमीटर रखें। जिन खेतों में उखेडा/विल्ट का प्रकोप रहता है, वहां गहरी एवं देरी से बुवाई करना लाभदायक बताया गया है।
खाद एवं उर्वरक प्रबंधन
बिजाई से पूर्व प्रति बीघा 40 क्विंटल गोबर की खाद खेत में मिलाएं। डीएपी 22 किलो अथवा सुपर खाद 62.5 किलो प्रति बीघा की दर से प्रयोग करें। यदि सुपर खाद का प्रयोग किया गया है तो 10 किलो यूरिया प्रति बीघा दें। पोटाश का प्रयोग मिट्टी परीक्षण के आधार पर तथा जिंक सल्फेट 33 प्रतिशत 3.50 किलो अथवा जिंक सल्फेट 21 प्रतिशत 6 किलो प्रति बीघा की दर से मिट्टी परीक्षण के आधार पर करने की सलाह दी गई है।
गोबर की खाद, पोटाश, जिंक सल्फेट एवं यूरिया की पूरी मात्रा बिजाई से पहले खेत में छिड़ककर मिलाएं, जबकि डीएपी अथवा सुपर खाद को सीड-कम-फर्टिलाइजर ड्रिल से ड्रिल करें। डीएपी/सुपर खाद को छिड़काव के बजाय ड्रिल से देने पर अधिक प्रभावी उपयोग होता है। डीएपी/सुपर खाद के साथ जिंक सल्फेट मिलाकर प्रयोग नहीं करने की सलाह दी गई है। खड़ी फसल में जिंक की कमी के लक्षण दिखाई देने पर जिंक सल्फेट 33 प्रतिशत 1.5 किलो एवं बुझा हुआ चूना 750 ग्राम को 100–125 लीटर पानी में घोलकर प्रति बीघा छिड़काव करें।
खरपतवार एवं निराई-गुड़ाई
बुवाई के तुरंत बाद अथवा बीज के उगने से पहले पेन्डामैथेलिन 38.7 प्रतिशत 485 मिली अथवा पेन्डामैथेलिन 30 प्रतिशत 625 मिली को 150 लीटर पानी में मिलाकर प्रति बीघा की दर से समान रूप से फ्लैट फैन नोजल से छिड़काव करें। खरपतवारनाशी के प्रयोग के बाद भी निराई-गुड़ाई जरूरी है। प्रत्येक सिंचाई के बाद निराई-गुड़ाई करने से भूमि में वायु संचार बेहतर रहता है। बारानी क्षेत्रों में पहली निराई-गुड़ाई बुवाई के 30–35 दिन तथा दूसरी 50–55 दिन बाद करें।
सिंचाई प्रबंधन
पहली सिंचाई बुवाई के 50–55 दिन बाद शाखाएं बनने के समय करें। आवश्यकता होने पर दूसरी सिंचाई बुवाई के करीब 100 दिन बाद करें। यदि केवल एक सिंचाई उपलब्ध हो तो बुवाई के 60–65 दिन बाद सिंचाई करना उचित बताया गया है। फव्वारा विधि से सिंचाई करने पर 60 एवं 110 दिन बाद सिंचाई करें। प्रत्येक सिंचाई करीब 6 सेंटीमीटर गहरी रखें।
फली छेदक एवं अन्य कीटों का नियंत्रण
फसल में फली छेदक/हरी सुंडी का प्रकोप होने पर प्रति बीघा 100 लीटर पानी में निम्न में से किसी एक कीटनाशी का छिड़काव करें—इंडोक्साकार्ब 14.5 एससी 100 मिली, इमामेक्टिन बेंजोएट 5 एसजी 50 ग्राम, स्पाइनोसैड 45 एससी 33 मिली, क्यूनालफॉस 25 ईसी 250 मिली अथवा क्लोरान्ट्रानिलिप्रोल 18.5 एससी 28 मिली।
झुलसा एवं जड़ गलन रोग से बचाव
चने का झुलसा रोग एस्कोकाइटा फंगस के कारण होता है। अधिक आर्द्रता, करीब 20 डिग्री तापमान, बादल छाए रहने एवं रुक-रुक कर वर्षा होने की स्थिति में इसका प्रकोप बढ़ सकता है। शुरुआत में पत्तियों, तनों, शाखाओं एवं फलियों पर हल्के भूरे धब्बे दिखाई देते हैं और प्रकोप बढ़ने पर शाखाएं टूटकर झुक सकती हैं। रोग नियंत्रण के लिए क्लोरोथेलोनिल 75 डब्ल्यूपी 100 ग्राम को 100 लीटर पानी में मिलाकर प्रति बीघा तत्काल छिड़काव करने की सलाह दी गई है। जड़ गलन रोग की रोकथाम के लिए कार्बोक्सिन 37.5 प्रतिशत + थाइरम 37.5 प्रतिशत (75 प्रतिशत डब्ल्यूएस) से 2 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार करें।
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