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राज्य कृषि समाचार (State News)

दो भैंस और एक बकरी से शुरुआत, आज डेयरी-बकरी पालन से 25 लाख रुपये सालाना कमा रहे पंजाब के गुरदीप सिंह

23 सितंबर 2026, बठिंडा(पंजाब): दो भैंस और एक बकरी से शुरुआत, आज डेयरी-बकरी पालन से 25 लाख रुपये सालाना कमा रहे पंजाब के गुरदीप सिंह – दो भैंसों और एक बकरी से डेयरी-बकरी पालन शुरू करने वाले पंजाब के बठिंडा जिले के भागी बंदर गांव के किसान गुरदीप सिंह आज सालाना करीब 25 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा कमा रहे हैं। 35 वर्षीय गुरदीप ने साल 2014 में सरकारी टाइपिस्ट की नौकरी छोड़कर पूरी तरह खेती-पशुपालन को अपनाया था।

नौकरी छोड़ी, दो जानवरों से शुरुआत की

गुरदीप के पास कुल 11 एकड़ जमीन है, जिसमें आठ एकड़ उनकी अपनी और तीन एकड़ पट्टे पर ली गई है। नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने महज दो भैंस और एक बकरी से डेयरी-बकरी पालन की शुरुआत की थी।

आज उनके पास नीली रावी और मुर्रा नस्ल की 21-22 भैंसें हैं, जिनमें से 10-12 दूध दे रही हैं। इसके अलावा वे करीब 50 बीटल बकरियों का व्यवस्थित प्रजनन भी करते हैं। वे मानते हैं कि छोटे स्तर से गुणवत्ता पर ध्यान देकर शुरुआत करना, मुनाफे को दोबारा फार्म में लगाना और वैज्ञानिक तरीके से नस्ल सुधार करना ही स्थायी सफलता की कुंजी है।

डेयरी और बकरी पालन से सालाना 25 लाख की कमाई

गुरदीप का सालाना कारोबार करीब 36-37 लाख रुपये का है, जिसमें से सभी खर्च निकालने के बाद उन्हें करीब 25 लाख रुपये शुद्ध मुनाफा होता है। इसमें डेयरी से सालाना 18-20 लाख रुपये और बकरी पालन से 6-7 लाख रुपये की आमदनी शामिल है।

वे हर साल दो-तीन भैंसें भी बेचते हैं, जिनकी कीमत करीब डेढ़ लाख रुपये प्रति भैंस तक मिलती है। इस तरह मेहनत और सही योजना के साथ गुरदीप ने अपने परिवार के लिए बिना किसी कर्ज के करीब एक करोड़ रुपये की संपत्ति खड़ी कर ली है।

गुरदीप कहते हैं, “पशुपालन किसानों के लिए सबसे सुरक्षित निवेश है।” उनका मानना है कि दूध से रोजाना की आमदनी मिलती रहती है, जबकि जानवरों की बिक्री से जरूरत के समय एकमुश्त पैसा भी मिल जाता है।

नस्ल सुधार और मुनाफे को दोबारा निवेश करने पर जोर

गुरदीप ने जानबूझकर नीली रावी और मुर्रा नस्ल की भैंसें चुनीं, क्योंकि इन्हें अच्छी दूध उत्पादन क्षमता के लिए जाना जाता है। इसी तरह बीटल नस्ल की बकरियों को उन्होंने प्रजनन के लिए चुना, ताकि बकरी पालन से भी नियमित आमदनी बनी रहे।

उनका तरीका शुरू से ही धीरे-धीरे और सोच-समझकर बढ़ने का रहा है। हर साल होने वाले मुनाफे का बड़ा हिस्सा वे नई भैंस-बकरी खरीदने, बेहतर चारा-पानी और पशु स्वास्थ्य देखभाल में दोबारा लगाते हैं, न कि तुरंत निकाल लेते हैं। यही वजह है कि दस साल में वे दो जानवरों से शुरू करके 70 से ज्यादा पशुओं वाले एक व्यवस्थित फार्म तक पहुंच पाए, वह भी बिना किसी बैंक कर्ज के।

गुरदीप का यह भी मानना है कि सिर्फ जानवरों की संख्या बढ़ाना काफी नहीं है, बल्कि हर भैंस और बकरी की सेहत, चारे की गुणवत्ता और समय पर टीकाकरण का ध्यान रखना उतना ही जरूरी है। वे नियमित रूप से पशु चिकित्सकों की सलाह लेते हैं और दूध उत्पादन के आंकड़ों पर नजर रखते हुए यह तय करते हैं कि किन जानवरों को प्रजनन के लिए रखना है और किन्हें बेचना है। यह अनुशासित तरीका ही उनके फार्म को बाकी छोटे पशुपालकों से अलग बनाता है।


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