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राज्य कृषि समाचार (State News)

सरगुजा संभाग में सोयाबीन में इल्ली-सफेद मक्खी और मूंगफली में पत्ती धब्बा रोग का खतरा, मौसम विभाग ने बताया बचाव

23 सितंबर 2026, अंबिकापुर (छत्तीसगढ़): सरगुजा संभाग में सोयाबीन में इल्ली-सफेद मक्खी और मूंगफली में पत्ती धब्बा रोग का खतरा, मौसम विभाग ने बताया बचाव – छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग में सोयाबीन की फसल में पत्ती खाने वाली इल्लियों, सफेद मक्खी और तना मक्खी का प्रकोप देखा जा रहा है, वहीं मूंगफली में पत्ती धब्बा और रतुआ रोग की आशंका जताई गई है। भारत मौसम विज्ञान विभाग रायपुर की ओर से 18 सितंबर को जारी कृषि मौसम परामर्श बुलेटिन क्रमांक 81/2026 में सरगुजा, बलरामपुर, जशपुर, सूरजपुर और कोरिया जिलों के किसानों के लिए यह सलाह जारी की गई है।

सोयाबीन में इल्ली, सफेद मक्खी और गर्डल बीटल का खतरा

बुलेटिन के मुताबिक सोयाबीन में पत्ती खाने वाली इल्लियों, सफेद मक्खी और तना मक्खी की रोकथाम के लिए बीटासाइफ्लुथ्रिन+इमिडाक्लोप्रिड मिश्रण की 350 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर या थायामेथोक्साम+लैम्ब्डा-साइहैलोथ्रिन मिश्रण की 125 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करने की सलाह दी गई है।

गर्डल बीटल यानी तना छेदक भृंग के प्रकोप वाले खेतों में थायाक्लोप्रिड 21.7 एसएल की 750 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करने को कहा गया है। बुलेटिन में यह भी सलाह दी गई है कि दवा का छिड़काव साफ मौसम में ही करें, ताकि इसका पूरा असर मिल सके और बारिश से नुकसान न हो।

मूंगफली में पत्ती धब्बा-रतुआ रोग के लिए भी सलाह जारी

35-40 दिन की मूंगफली फसल में पत्ती धब्बा और रतुआ रोग की रोकथाम के लिए कार्बेन्डाजिम की 250 ग्राम प्रति हेक्टेयर और मैंकोजेब की 1 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर मात्रा मिलाकर 10-12 दिन के अंतराल पर दो से तीन बार छिड़काव करने की सलाह दी गई है।

इसके साथ ही किसानों को खेतों में निराई-गुड़ाई और मिट्टी चढ़ाने का काम समय पर पूरा करने और खेत में पानी न रुकने देने की सलाह दी गई है, ताकि जड़ सड़न जैसी समस्याएं न हों। बुलेटिन में बताया गया है कि बदलते मौसम और बारिश के बीच बढ़ी नमी से कीट-रोगों का खतरा और बढ़ सकता है, इसलिए किसानों को नियमित रूप से खेतों का निरीक्षण करने की सलाह दी गई है।

सही समय पर छिड़काव क्यों जरूरी

सोयाबीन के पौधे में फली बनने की अवस्था इस समय चल रही है, जो सबसे संवेदनशील मानी जाती है। इस दौरान इल्ली और सफेद मक्खी जैसे कीट अगर नियंत्रित न हों तो सीधे फली और दाने की संख्या घट जाती है, जिससे उपज में बड़ा नुकसान हो सकता है।

बुलेटिन में कहा गया है कि खेत में कीट का घनत्व देखकर ही दवा चुनें और सिफारिश से ज्यादा मात्रा में छिड़काव न करें, क्योंकि इससे न सिर्फ लागत बढ़ती है बल्कि मित्र कीटों को भी नुकसान पहुंच सकता है। मूंगफली किसानों को भी सलाह दी गई है कि रोग के शुरुआती लक्षण दिखते ही पहला छिड़काव कर दें, ताकि रोग आगे न फैले।

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