कागजी कार्यवाही के नाम पर वसूली अभियान

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3 मई 2022, इन्दौर । कागजी कार्यवाही के नाम पर वसूली अभियान – राजेश पाटीदार सोयाबीन बीज बेचने वाले एक छोटे विक्रेता हैं। पिछले 20 वर्षों से खाद-बीज की दुकान लगा कर अपनी घर-गृहस्थी चला रहे हैं। परन्तु इन दिनों वे दुकान के सेल काउंटर पर कम रहते हैं, कागजों का पेट भरने में जुटे रहते हैं। इसी प्रकार प्रदेश में कृषि आदान विक्रेताओं का यही हाल है। कृषि विभाग के नित नए फरमानों ने अमूमन सभी खाद-बीज विक्रेताओं पर अदृश्य तलवार लटका रखी है।

इन दिनों एक सरकारी आदेश ने बीज उत्पादक कम्पनियों में तहलका मचा रखा है। आदेश के अनुसार बीज कम्पनियों को बीज उत्पादक का नाम, पता सहित बिल, भुगतान आदि सभी जानकारी उपलब्ध करवाना है। इसका मतलब यह है कि व्यापारी अपना व्यापार छोड़ कर ये सारी जानकारी को एकत्रित करता रहे। नि:संदेह गुणवत्ता के लिए कसावट जरूरी है। चर्चा तो यह भी है कि इस कसावट में सरकार चित भी मेरी पट भी मेरी का खेल खेल रही है। यदि बीज कंपनी सभी जानकारी दे देती है तो गुणवत्ता नियंत्रण का टारगेट पूरा, नहीं तो समझौते के दरवाजे तो खुले ही हैं।

जहां केन्द्र सरकार और उसके विभिन्न मंत्रालय आम आदमी, व्यापारी द्वारा दी जाने वाले प्रपत्रों, जानकारियों के प्रारूप का सरलीकरण कर रहे हैं वहीं राज्य के विभिन्न विभाग यथा- कृषि विभाग, परिवहन विभाग, उद्यानिकी विभाग आदि जांच, जुर्माने, जवरिया वसूली के नाम पर खसरा-खतौनी समेत परिवार की जन्म पत्री भी मांग लेते हैं।

इन अनिवार्य एवं आवश्यक जानकारी को समेटते -समेटते कृषि आदान व्यापारी त्रस्त हो गए हैं।

सरकार एक ओर मंच से, कार्यक्रमों में कृषि आदान विक्रेताओं को एग्रीकल्चर एक्सटेंशन की महत्वपूर्ण कड़ी मानती है, वहीं दूसरी ओर लायसेंस सस्पेंशन की तलवार भी लटकाए रखती है। शिवराज सरकार प्रदेश वासियों के जीवनयापन को सुगम और सुदीर्घ बनाने के लिए कटिबद्ध है परन्तु सरकार की मंशा उसकी ही मशीनरी के निचले गियर को नहीं पता है जिससे ब्रेक जाम की स्थिति हो जाती है। कृषि मंत्री जी, इस व्यवस्था को कैसे सुधार पाते हैं, आने वाला समय बताएगा।

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