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राज्य कृषि समाचार (State News)

ज्यादा उत्पादन से दबाव, अब तंबाकू बाजार में सुधार के संकेत

नीलामियों में ‘नो-बिड’ बंडलों की संख्या घटी, खरीदारों के बीच बढ़ी प्रतिस्पर्धा; अगले सीजन उत्पादन सीमा में बड़ी कटौती

08 सितंबर 2026, भोपाल: ज्यादा उत्पादन से दबाव, अब तंबाकू बाजार में सुधार के संकेत –  आंध्र प्रदेश में 2025-26 सीजन के फ्लू-क्योर्ड वर्जीनिया (एफसीवी) तंबाकू की नीलामी में बाजार की स्थिति अब धीरे-धीरे सुधरती दिखाई दे रही है। हाल की नीलामियों में बोली नहीं लगने वाले यानी ‘नो-बिड’ तंबाकू बंडलों की संख्या में कमी आई है, जबकि खरीदारों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। इससे किसानों को आने वाले दिनों में बेहतर कीमत मिलने की उम्मीद बनी है।

कृषि मंत्री किंजरापु अत्चन्नायडू के अनुसार, 4 सितंबर तक राज्य में 132 नीलामी दिवसों में करीब 8.65 करोड़ किलो एफसीवी तंबाकू की बिक्री हो चुकी है। इस सीजन के लिए उत्पादन सीमा 14.2 करोड़ किलो निर्धारित थी, लेकिन वास्तविक उत्पादन करीब 23.6 करोड़ किलो रहने का अनुमान है। यानी निर्धारित सीमा से लगभग 9.4 करोड़ किलो अधिक उत्पादन हुआ है। अतिरिक्त उत्पादन ने बाजार में आपूर्ति बढ़ाकर कीमतों पर दबाव बनाया।

इस सीजन अब तक तंबाकू को औसतन 209.83 रुपये प्रति किलो का भाव मिला है। पिछले साल समान अवधि में 14.027 करोड़ किलो की बिक्री पर औसत अंतिम कीमत 248.86 रुपये प्रति किलो रही थी। हालांकि, मौजूदा बाजार में सुधार का संकेत यह है कि रोजाना औसतन करीब 12 प्रतिशत बंडलों पर बोली नहीं लग रही है, जबकि कुछ नीलामी केंद्रों पर यह दर 1 से 2 प्रतिशत से भी नीचे आ गई है।

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फिलहाल राज्य में हर सप्ताह करीब एक करोड़ किलो तंबाकू बाजार में पहुंच रहा है। क्षेत्रवार देखें तो नॉर्दर्न लाइट सॉयल्स में सबसे ऊंची कीमत 329 रुपये, सदर्न लाइट सॉयल्स में 255 रुपये और सदर्न ब्लैक सॉयल्स में 252 रुपये प्रति किलो दर्ज की गई।

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अगले सीजन उत्पादन आधे से भी कम

अतिरिक्त उत्पादन की स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए 2026-27 सीजन की अनुमत एफसीवी तंबाकू उत्पादन सीमा 14.2 करोड़ किलो से घटाकर 8.1 करोड़ किलो कर दी गई है। सरकार का उद्देश्य उत्पादन को बाजार की वास्तविक मांग के अनुरूप रखना है।

तंबाकू बोर्ड किसानों को जागरूक कर निर्धारित सीमा में ही खेती करने की सलाह दे रहा है। सरकार का मानना है कि उत्पादन और बाजार की मांग के बीच बेहतर संतुलन बनने से कीमतों पर दबाव कम होगा और किसानों को उनकी उपज का अधिक लाभकारी मूल्य मिल सकेगा।

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