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राज्य कृषि समाचार (State News)

चित्रकूट में धान की फसल पर पत्ती लपेटक कीट और झुलसा रोग का हमला, कृषि वैज्ञानिकों ने बताई दवा और मात्रा

24 सितंबर 2026, चित्रकूट: चित्रकूट में धान की फसल पर पत्ती लपेटक कीट और झुलसा रोग का हमला, कृषि वैज्ञानिकों ने बताई दवा और मात्रा – उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले में पिछले कुछ दिनों से लगातार बनी नमी और बादलों के कारण धान की फसल पर पत्ती लपेटक कीट और झुलसा रोग का प्रकोप बढ़ गया है। जिले के पहाड़ी, राजापुर और मानिकपुर ब्लॉक के कई गांवों से नुकसान की सूचना मिलने के बाद कृषि विज्ञान केंद्र, गनीवां ने किसानों के लिए तत्काल एडवाइजरी जारी की है।

केंद्र के प्रमुख डॉ. राजेंद्र सिंह नेगी और वैज्ञानिक अंकुर त्रिपाठी ने बताया कि पहाड़ी ब्लॉक के भानपुर, चकौंध, पनौटी और सगवारा; राजापुर के चिल्लीमल व भदेदू तथा मानिकपुर के भौरी गांव में धान की फसल प्रभावित हुई है। लगातार नमी बने रहने और खेतों में पानी जमा रहने की वजह से कीट और रोग दोनों को फैलने का मौका मिला है।

कैसे पहचानें कीट और रोग का लक्षण

पत्ती लपेटक कीट की इल्ली पत्ती को मोड़कर अंदर से हरा भाग खा जाती है, जिससे पत्तियों पर सफेद धारियां साफ दिखाई देने लगती हैं। दूर से देखने पर खेत झुलसा हुआ-सा नजर आता है, जिससे किसान अक्सर इसे कोई अलग बीमारी समझ बैठते हैं।

दूसरी ओर झुलसा रोग में पौधों की पत्तियों पर छोटे-छोटे लाल-भूरे धब्बे बनने लगते हैं। समय पर पहचान न होने और नियंत्रण न किए जाने पर यह रोग तेजी से पूरे खेत में फैल सकता है और बाली बनने की अवस्था में उपज पर सीधा असर डालता है।

किस दवा की कितनी मात्रा, वैज्ञानिकों ने दी स्पष्ट सलाह

कृषि वैज्ञानिकों ने पत्ती लपेटक कीट के नियंत्रण के लिए क्लोरेंट्रानिलिप्रोल कीटनाशक की 60 मिली मात्रा प्रति एकड़ की दर से 150 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने की सलाह दी है। यह आंकड़ा दोनों रिपोर्टों में एक समान बताया गया है।

विकल्प के तौर पर कुछ रिपोर्टों में फ्लूबेंडियामाइड 20 मिली प्रति एकड़ का सुझाव भी दिया गया है, जबकि एक अन्य रिपोर्ट में इमामेक्टिन बेंजोएट 100 ग्राम प्रति एकड़ की मात्रा बताई गई है। दोनों ही विकल्पों को 150 लीटर पानी में घोलकर एकड़ भर खेत में छिड़कने की सलाह दी गई है। किसान अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से एक बार पुष्टि कर लें, क्योंकि दो अलग स्रोतों में दूसरे विकल्प की दवा के नाम में हल्का फर्क है।

झुलसा रोग की रोकथाम के लिए ट्राइसाइक्लाजोल 120 ग्राम प्रति एकड़ की मात्रा में छिड़काव करने या प्रॉपिकोनाजोल के इस्तेमाल की सलाह दी गई है। वैज्ञानिकों ने यह भी साफ किया कि रोग बढ़ने की एक बड़ी वजह जरूरत से ज्यादा यूरिया का इस्तेमाल भी है, इसलिए फिलहाल यूरिया का प्रयोग तुरंत रोक देना चाहिए।

खेत में पानी का जमाव न होने पाए, इसके लिए जल निकासी की व्यवस्था दुरुस्त रखने की सलाह भी दी गई है। बाली की बेहतर बढ़वार के लिए संतुलित NPK (18:18:18) उर्वरक के इस्तेमाल की भी सिफारिश की गई है।

वैज्ञानिकों ने यह भी सुझाव दिया कि छिड़काव सुबह या शाम के समय करना चाहिए, जब धूप तेज न हो, ताकि दवा का असर बेहतर तरीके से हो सके। साथ ही छिड़काव करते समय दस्ताने और मास्क जैसे सुरक्षा उपाय अपनाने की सलाह भी दी गई है।

बाली बनने की नाजुक अवस्था में पत्ती लपेटक कीट और झुलसा रोग एक साथ हमला करें, तो उपज में बड़ी गिरावट का खतरा रहता है। समय पर सही दवा और सही मात्रा में छिड़काव न होने पर किसान की पूरी मेहनत और लागत बेकार जा सकती है।

चित्रकूट जैसे क्षेत्रों में यह एडवाइजरी आसपास के जिलों के किसानों के लिए भी संकेत है कि लगातार नमी वाले मौसम में सतर्कता जरूरी है। बुंदेलखंड क्षेत्र में धान की खेती सीमित रकबे में ही होती है, इसलिए यहां के किसानों के लिए हर सीजन की उपज बचाना खास तौर पर मायने रखता है।

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