राज्य कृषि समाचार (State News)

नाबार्ड का आम उत्सव: ओडिशा के स्वाद को वैश्विक पहचान की ओर

11 जून 2025, नई दिल्ली: नाबार्ड का आम उत्सव: ओडिशा के स्वाद को वैश्विक पहचान की ओर – भुवनेश्वर के नयापल्ली में नाबार्ड के क्षेत्रीय कार्यालय में वार्षिक आम उत्सव की धूमधाम से शुरुआत हुई। यह उत्सव ओडिशा के लाजवाब आमों की शानदार झलक पेश करता है और 10 से 12 जून 2025 तक चलेगा।

यह उत्सव नाबार्ड की खास पहल, आदिवासी विकास निधि (TDF) का हिस्सा है, जो 2003-04 से आदिवासी परिवारों को छोटे-छोटे बागानों, यानी ‘वादी’, के जरिए आजीविका देने का काम कर रही है। आम की खेती इस पहल का दिल है, जिसने बंजर पड़ी जमीनों को कमाई का जरिया बना दिया।

वादी पहल ने ओडिशा के 23 जिलों में 83 परियोजनाओं के जरिए 57,000 से ज्यादा आदिवासी परिवारों की जिंदगी बदल दी है। इतना ही नहीं, नाबार्ड ‘एक्सपोर्ट पाठशाला’ नाम की एक खास योजना के जरिए ओडिशा के आमों को विदेशी बाजारों तक पहुंचाने में जुटा है। मई 2025 में ही बोलांगीर के टिटिलागढ़ के दो किसान उत्पादक संगठनों ने यूरोप में 50 क्विंटल आम भेजकर कमाल कर दिखाया।

किसानों को सही दाम और बेहतर बाजार

यह उत्सव सिर्फ आमों का मेला नहीं है, बल्कि किसानों को उनकी मेहनत का सही दाम दिलाने का एक शानदार मंच है। यह किसानों को सीधे शहर के खरीदारों से जोड़ता है, ताकि बिचौलियों का खेल खत्म हो और किसानों को उनकी फसल की सही कीमत मिले, साथ ही उनकी उपज की गुणवत्ता पर फौरन राय भी मिले।

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नाबार्ड के मुख्य महाप्रबंधक संजय कुमार तालुकदार ने कहा, “यह उत्सव सिर्फ आमों को दिखाने का मौका नहीं है, बल्कि उन हजारों आदिवासी परिवारों की मेहनत और बदलाव की कहानी का जश्न है, जिनके लिए आम की खेती ने नई उम्मीदें जगाई हैं। यह हमारा मकसद दर्शाता है—गांवों में कमाई बढ़ाना और मजबूत बाजार से जोड़कर टिकाऊ आजीविका देना।”

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स्थानीय दुकानों से लेकर विदेशी बाजार तक

इस बार के उत्सव में 20 किसान उत्पादक संगठनों और TDF परियोजनाओं से जुड़े 50 से ज्यादा लोग हिस्सा ले रहे हैं। प्राकृतिक तरीके से उगाए गए ये आम अब शहरों के बाजारों से लेकर विदेशी खरीदारों तक पहुंच रहे हैं। नाबार्ड ने इस आयोजन को और शानदार बनाने के लिए पलाडियम को साझेदार बनाया है।

आमों की रंगीन दुनिया और परंपराएं

उत्सव में अमरपाली, दशहरी, लंगड़ा जैसे स्वादिष्ट आमों के साथ-साथ कई स्थानीय किस्में भी नजर आ रही हैं। किसान और उनके समूह पूरे जोश के साथ अपनी उपज और अपनी कहानियां पेश कर रहे हैं—ये कहानियां परंपरा, मेहनत और गर्व से भरी हैं।

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