हड़िया बेचना छोड़ शुरू किया मुर्गी पालन, झारखंड की सरस्वती कुजूर बनीं आत्मनिर्भर उद्यमी
24 सितंबर 2026, पश्चिमी सिंहभूम, झारखंड: हड़िया बेचना छोड़ शुरू किया मुर्गी पालन, झारखंड की सरस्वती कुजूर बनीं आत्मनिर्भर उद्यमी – झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के बदिया गांव की सरस्वती कुजूर की जिंदगी कुछ साल पहले तक बेहद अनिश्चित थी। परिवार की आमदनी का कोई पक्का जरिया नहीं था, और घर चलाने के लिए उन्हें पारंपरिक हड़िया (चावल से बनी देसी शराब) बेचनी पड़ती थी।
पति की आय भी अनियमित थी, जिससे बच्चों की पढ़ाई और रोजमर्रा के खर्च चलाना मुश्किल हो जाता था। लेकिन आज सरस्वती कुजूर की पहचान एक सफल पोल्ट्री उद्यमी के रूप में बन चुकी है।
स्वयं सहायता समूह से मिली नई राह
बदलाव की शुरुआत तब हुई जब सरस्वती झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी (JSLPS) के तहत बने एक स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं। यहां से उन्हें प्रशिक्षण और वित्तीय मदद दोनों मिली।
समूह की मदद से उन्होंने करीब 35,000 रुपये के निवेश से मुर्गी पालन का काम शुरू किया। शुरुआत 200 चूजों के साथ हुई। धीरे-धीरे उन्होंने इस काम को व्यवस्थित तरीके से बढ़ाया और साथ ही घर पर सूअर पालन (पिगरी) भी शुरू कर दिया, जिससे आय का एक और जरिया बन गया।
पश्चिमी सिंहभूम जैसे आदिवासी बहुल इलाके में महिलाओं के लिए बैंक से सीधे कर्ज लेना आसान नहीं होता, ऐसे में स्वयं सहायता समूह के जरिए मिली छोटी पूंजी ही सरस्वती के लिए बड़ा सहारा बनी। समूह की बाकी महिलाओं से मिली सलाह और आपसी सहयोग ने भी शुरुआती दौर में उनकी मदद की।
रोजाना 500 रुपये तक की कमाई
मेहनत रंग लाई और आज सरस्वती के पोल्ट्री व्यवसाय से उन्हें औसतन करीब 500 रुपये प्रतिदिन की आमदनी हो रही है। महीने के हिसाब से यह रकम करीब 15,000 से 20,000 रुपये तक पहुंच जाती है। दो स्वतंत्र क्षेत्रीय मीडिया रिपोर्टों में यह आंकड़ा एक जैसा दर्ज है।
यह आमदनी पहले की अनिश्चित कमाई की तुलना में न सिर्फ ज्यादा स्थिर है, बल्कि सम्मानजनक भी है। सरस्वती अब परिवार की जरूरतों के साथ-साथ बच्चों की पढ़ाई का खर्च भी बेहतर तरीके से उठा पा रही हैं।
झारखंड के आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में महिलाओं के लिए हड़िया बेचना अक्सर आर्थिक मजबूरी का ही नतीजा होता है। ऐसे में सरस्वती जैसी महिलाओं का पोल्ट्री और पशुपालन जैसे वैकल्पिक व्यवसायों की ओर बढ़ना, सामाजिक और आर्थिक दोनों स्तर पर बड़ा बदलाव माना जा रहा है।
गांव में अब सरस्वती को एक सफल उद्यमी के तौर पर देखा जाता है, न कि सिर्फ एक गृहिणी के तौर पर। उनके परिवार में भी अब आय को लेकर पहले जैसी अनिश्चितता नहीं रही, और बच्चों की पढ़ाई और स्वास्थ्य पर खर्च करने के लिए नियमित पैसा उपलब्ध रहता है। समुदाय में उनकी पहचान अब एक ऐसी महिला की है जिसने विपरीत हालात में भी खुद अपना रास्ता बनाया।
सरस्वती कुजूर की कहानी दिखाती है कि स्वयं सहायता समूह और सरकारी योजनाओं का सही इस्तेमाल कर छोटी पूंजी से भी स्थायी आमदनी खड़ी की जा सकती है। बैकयार्ड पोल्ट्री और छोटे स्तर का पशुपालन कम जोखिम में शुरू किया जा सकने वाला व्यवसाय है, जो खासकर महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता का रास्ता खोलता है।
उनके गांव और आसपास की कई अन्य महिलाएं भी अब सरस्वती से प्रेरित होकर छोटे स्तर पर मुर्गी या बकरी पालन शुरू करने की योजना बना रही हैं। स्थानीय स्वयं सहायता समूह इन महिलाओं को भी प्रशिक्षण और शुरुआती पूंजी दिलाने में मदद कर रहे हैं, ताकि वे भी धीरे-धीरे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकें और परिवार की आमदनी में अपना योगदान दे सकें।
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