सशक्त महिला सशक्त समाज

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  • माधव पटेल, दमोह मध्यप्रदेश
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7 मार्च 2022,  सशक्त महिला सशक्त समाज आज आधुनिक युग में भी हमें देखने को मिलता है कि समाज की आधी आबादी अर्थात महिलाओं को जो हक मिलना चाहिए था वह आज भी नहीं मिल पा रहा है इसके कारण जो भी रहे हो लेकिन हमें स्वीकारना ही होगा कि समाज ने महिलाओं को वाजिब हक आज तक नहीं दिया सामान्यतः कहा जाता है कि महिलाएं अपना हक ले क्यों नहीं लेती परंतु हमें सोचना होगा की प्राचीन काल से लेकर आज तक क्या महिलाओं को पुरुषों के बराबर स्वतंत्रता समानता और अधिकार मिले हैं या नहीं यदि नहीं तो अचानक से उनको विकास की मुख्यधारा में ला पाना निश्चित रूप से कुछ कठिन तो होगा ही आज जहां भी देखें वहां पर महिला सशक्तिकरण की बातें होती हैं महिलाओं को अधिकार देने की बात होती है परंतु जब इसकी शुरुआत स्वयं के घर से करने की आती है तो कहीं ना कहीं हम फिर पक्षपाती बन जाते हैं और  महिलाओं को वो अधिकार नहीं दे पाते जिनकी वो लंबे समय से हकदार हैं आज भी समाज में महिलाओं को एक निरीह प्राणी की तरह देखा जाता है जो कहीं ना कहीं हमारी सोच को प्रकट करता है यदि निष्पक्ष होकर हम देखें तो समाज का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जहां पर महिलाओं ने अपनी शक्ति का लोहा न मनवाया हो अपनी काबिलियत के बलबूते उन्होंने प्रत्येक क्षेत्र में अपनी एक पहचान स्थापित की है बस जरूरत इस बात की है कि उनको हर जगह है वह मौका दिया जाए जो मौका उनको आज तक दिया नहीं गया है फिर हम यह कह सकते हैं कि महिलाओं में भी वह क्षमता है जो हम किसी से अपेक्षा करते हैं सशक्त महिला, सशक्त समाज देश के विकास में दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं। देश में महिलाओं का सशक्तिकरण होना आज की महती आवश्यकता है। महिला सशक्तिकरण यानी महिलाओं की आध्यात्मिक, राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक शक्ति में वृद्धि करना। भारत में महिलाएं शिक्षा, राजनीति, मीडिया, कला व संस्कृति, सेवा क्षेत्रों, विज्ञान व प्रौद्योगिकी आदि के क्षेत्र में भागीदारी करती हैं।

हमारा संविधान सभी भारतीय महिलाओं की समानता की गारंटी देता है परंतु महिलाओं की स्थिति देखकर लगता है कि महिलाएं अभी भी बहुत पीछे है सामान्यता हम लोग पढ़ी-लिखी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर महिला को हर तरह से सशक्त और सफल मान लेते हैं। पर क्या महिलाओं के सशक्तिकरण का पक्ष मात्र आर्थिक रूप से सशक्त होना ही है? धन उपार्जन तो महिलाएं प्राचीन काल से ही पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर करती आई हैं परंतु समाज में आज भी वो अपनी क्षमता के अनुरूप मिलने वाले हक से पीछे है कभी-कभी लगता है कि हमारे आस-पास बहुत कुछ बदल तो रहा है पर ये बदलाव सतही ज्यादा हैं। महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए सबसे पहले समाज में उनके अधिकारों और मूल्यों को मारने वाली उन सभी राक्षसी सोच को मारना जरुरी है, जैसे – दहेज प्रथा, अशिक्षा, यौन हिंसा, असमानता, भ्रूण हत्या, महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा,मानव तस्करी और ऐसे ही दूसरे विषय।यदि वास्तव में हम महिलाओं को सशक्त बनाना चाहते हैं तो हमें वैचारिक बदलाव लाने होंगे वैचारिक बदलाव जब तक हमारे व्यवहार का हिस्सा नहीं बनेंगे, तब तक महिला सशक्तिकरण केवल बातों तक सीमित रहेगा धरातल पर उसका वास्तविकता में साकार रूप ले पाना कठिन होगा।

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