राज्य कृषि समाचार (State News)पशुपालन (Animal Husbandry)

मुर्गियों की सीआरडी बीमारी

लेखक- डॉ. पी.पी. सिंह, डॉ. सुखवीर सिंह, श्रीमती रीना शर्मा, डॉ. स्वाती सिंह तोमर एवं डॉ. जे.सी. गुप्ता, राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय-कृषि विज्ञान केन्द्र, मुरैना (म.प्र.)

21 फरवरी 2026, भोपाल: मुर्गियों की सीआरडी बीमारी – मुर्गियों में सीआरडी सर्दियों में होने वाली प्रमुख एवं आर्थिक क्षति पहुंचाने वाली बीमारी है यह बीमारी मुख्य रूप से मुर्गियों के श्वसन तंत्र को प्रभावित करती है जिसके कारण मुर्गियों में खांसी , नाक से पानी बहना तथा ब्रायलर मुर्गियों में कम वजन बढ़ना तथा लेयर मुर्गी में अंडा उत्पादन कम हो जाता है इस बीमारी के कारण न केवल मुर्गियों का स्वास्थ्य खराब होता है बल्कि इसके कारण एफसीआर खराब होना, कम अंडा उत्पादन तथा मृत्यु होने के कारण मुर्गी पालक किसानों को काफी आर्थिक हानि पहुंचती है

सीआरडी क्या है ?

सीआरडी मुर्गियों में श्वसन तंत्र को धीरे-धीरे प्रभावित करने वाली एक बीमारी होती हैजो कि मुख्य रूप से माइकोप्लाज्मा गेलीसेप्टिकम नामक जीवाणु से होती है इस बीमारी में श्वसन तंत्र प्रभावित होने के कारण खांसना ,छींकना, नाक से पानी बहना, ब्रायलर में वृद्धि दर कम होना तथा लेयर मुर्गियों में अंडा उत्पादन कम होना आदि लक्षण दिखाई देते हैं सीआरडी मुर्गियों में लंबे समय तक रहने वाली बीमारी होती है जो कि मुर्गियों के खराब प्रबंधन तथा तनाव आदि होने पर दिखाई देने लगती है I

सीआरडी बीमारी सीसीआरडी से जुड़ी रहती है जो कि तब होती है जब माइकोप्लाज्मा गेलीसेप्टिकम संक्रमण के साथ ही द्वितीयक संक्रमण के रूप में ई कोलाई बैक्टीरिया का भी संक्रमण हो जाता है इन दोनों का संक्रमण होने पर मुर्गियों में अधिक घातक लक्षण जैसे एयर सेट में सूजन सेप्टीसीमिया और अधिक मृत्यु दर दिखाई देते हैं ब्रायलर मुर्गियां कमजोर एवं कम उत्पादन के कारण किसानों को बहुत अधिक आर्थिक नुकसान होता है इस कारण सीआरडी जब सीसीआरडी में बदल जाती है उस समय बीमारी को नियंत्रित करना और भी अधिक कठिन हो जाता है I

बीमारी का फैलाव

बीमारी का फैलाव हवा के द्वारा, प्रभावित मुर्गी द्वारा उत्पन्न अंडों से उत्पन्न चूजों में, प्रभावित मुर्गी से स्वस्थ मुर्गी में एवं प्रभावित मुर्गी के संपर्क के दाना, पानी, बर्तन, परिवहन वाहन तथा श्रमिक इत्यादि के माध्यम से फैलता है I

बीमारी के लक्षण

इस बीमारी में मुर्गियों की नाक तथा आंख से पानी बहता है एवं आंख के पास सूजन दिखाई देती है प्रभावित मुर्गियों में कम भूख लगना, सुस्त रहना तथा शरीर भार कम हो जाता है लेयर मुर्गियों में अंडा उत्पादन कम हो जाता है इन लक्षणों के साथ ही खांसना, छींकना तथा सांस लेने में कठिनाई होने पर गले में विशेष आवाज सुनाई देना इत्यादि लक्षण दिखाई देते हैं बीमारी के इन लक्षणों की तीव्रता संक्रमण की मात्रा, द्वितीयक संक्रमण एवं वातावरणीय तनाव पर निर्भर करती है I

बीमारी का उपचार

सीआरडी के उपचार हेतु एंटीबायोटिक जैसे टाइलोसिन, टेटरासाइक्लिन और टिल्मिकोसिन इत्यादि का उपयोग बैक्टीरिया लोड कम कर संक्रमण को नियंत्रित करने हेतु किया जाता है स्वसन तंत्र को राहत देने वाली दवाइयां बीमारी के लक्षण को नियंत्रित करने में सहायता प्रदान करती हैं इन्हें सहायक दवाइयों के रूप में उपयोग किया जाता है एंटीबायोटिक्स एवं श्वसन तंत्र में सहायता प्रदान करने वाली दवाइयों को उपयोग कर किसान सीआरडी का बेहतर प्रबंधन एवं नियंत्रण कर सकता है I

प्राकृतिक उपचार पद्धति

हाल के कुछ वर्षों में प्राकृतिक दवाओं के उपयोग द्वारा मुर्गियों में काफी स्वास्थ्य लाभ देखे गए हैं इनके उपयोग द्वारा न केवल मुर्गियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि देखी गई है बल्कि एंटीबायोटिक्स पर निर्भरता भी कम हुई है सीआरडी के उपचार में यूकेलिप्टस एवं पिपरमिंट के तेल उपयोग करने से काफी लाभ देखा गया है यूकेलिप्टस तेल के उपयोग से सूजन में कमी जीवाणुओं का नाश व रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है जबकि पिपरमेंट का तेल संक्रमण के समय श्वसन मार्ग को साफ करने एवं मुर्गी को सांस लेने में राहत देने का कार्य करता है I

बचाव हेतु प्रभावी रणनीति

सीआरडी से बचाव हेतु बाड़े में मुर्गियों की सतत निगरानी, जल्दी पहचान बीमारी को नियंत्रित करने एवं आर्थिक नुकसान कम करने में सबसे महत्वपूर्ण कारक होते हैं मुर्गियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में संतुलित पोषण व तनाव रहित प्रबंधन सर्वाधिक वांछनीय कारक होते हैं सीआरडी से बचाव हेतु टीकाकरण तथा चूजों की की खरीद माइकोप्लाज्मा संक्रमण से रहित प्रतिष्ठित हेचरी से करना महत्वपूर्ण साबित होते हैं सीआरडी की सतत निगरानी, जैव सुरक्षा उपायों का पूर्ण रूप से पालन एवं बाड़े में मुर्गियों का तनाव रहित प्रबंधन सीआरडी का नया संक्रमण व फैलाव रोकने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं सीआरडी बचाव के उपायों को अपना कर एवं संक्रमण की जल्दी पहचान कर सीआरडी को प्रभावी तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है I

वर्तमान समय में सीआरडी के प्रभावी नियंत्रण हेतु पारंपरिक चिकित्सा पद्धति के साथ-साथ प्राकृतिक दवाओं का उपयोग करने से अधिक बेहतर परिणाम प्राप्त हुए हैं पारंपरिक चिकित्सा पद्धति में एंटीबायोटिक का प्रयोग, संक्रमण की सतत निगरानी, जैव सुरक्षा उपाय अपनाना तथा बेहतर प्रबंध उपाय अपनाकर संक्रमण तथा बीमारी का नियंत्रण किया जाता है प्राकृतिक दवाओं एवं एरोमेटिक तेलों के उपयोग से रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि, सूजन में कमी तथा श्वसन मार्ग की सफाई होती है जिससे की सांस लेने में आसानी होती है और बीमारी के लक्षणों की तीव्रता में कमी आती है पारंपरिक चिकित्सा पद्धति एवं प्राकृतिक दवाओं का एक साथ प्रयोग करने से वह एक दूसरे के पूरक की तरह कार्य करते हैं जिससे बीमारी का नियंत्रण बेहतर तरीके से होता है I

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