कपास की खेती को नई दिशा की आवश्यकता

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13 अगस्त 2022, उदयपुर: कपास की खेती को नई दिशा की आवश्यकता – महाराणा प्रताप कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर  में कॉटन रिसर्च एंड डेवलपमेंट एसोसिएशन (सीआरडीए) एवं महाराणा प्रताप कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के संयुक्त तत्वावधान में ‘‘कपास की खेती मे बदलते प्रतिमान‘‘ विषय पर उदयपुर  में 08-10 अगस्त, 2022 के दौरान आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के तीसरे एवं अन्तिम दिन तकनीकी सत्र में कपास वैज्ञानिकों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किये।

अन्तिम एवं बारहवें तकनीकी सत्र में 8 प्रस्तुतीकरण हुए जिसमें कपास की पैदावार बढ़ाने के लिए विभिन्न तकनीकों के प्रयोग से फसल प्रबन्धन पर विचार विमर्श किया गया। इसमें कैनोपी प्रबन्धन और बूंद-बूंद सिचांई द्वारा उर्वरक प्रयोग करने पर शोध कार्य प्रस्तुत किए गए। जिसमें विशेषतः नत्रजन व पोटाश खादों को चार भागों में विभाजित करने पर पैदावार में बढ़ोतरी देखी गयी। साथ ही कपास की प्रमुख शाखाओं को 60 दिन पर निकालकर तथा परिपक्वता अवस्था पर ऊपरी शाखाओं को काटकर भी पैदावार को बढ़ाया जा सकता है। इसी सत्र में डा. कुशलराज ने सूचना प्रसार में इन्टरनेट की उपयोगिता को बताते हुए कहा कि आईसीटी की उपयोग से समय पर किसान तक जानकाी पहुँचाने से फसल में होने वाले नुकसान विशेषतः बिमारियों को कम किया जा सकता है। इस चर्चा के दौरान कपास के पौधे से निकलने वाले रसायन विशेषतः जैविक रसायनों की जानकारी से इनका उपयोग एकीकृत कीट प्रबन्धन में किया जा सकता है। स्ंरक्षित कृषि कीट, कपास आधारित अन्तः फसलीकरण विषय पर कपास की बिना जुताई किये बुआई करने से जमीन में कार्बन स्तर को बढ़ाया जा सकता है। इसके साथ फसल अवशेषों का प्रबन्धन करके भी पैदावार बढ़ाने के साथ-साथ खरपतवार की समस्या को कम कर सकते है। इसके अलावा सत्र में कपास पौधरोपण तकनीक, सूत्रकृर्मि प्रबन्धन एवं जीन प्रमोटर के इस्तेमाल इत्यादि विषयों पर भी चर्चा हुई।

कपास की राष्ट्रीय संघोष्ठी के समापन सत्र के मुख्य अतिथि कुलपति डॉ बलदेव राज कम्बोज, चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार एवं गुरु जम्भेश्वेर विज्ञान एवं तकनिकी विश्वविद्यालय ने अपने उदबोधन में कपास खेती में मशीन पीकिंग, सघन खेती एवं ड्रोन-रोबोटिक एवं डिजिटलाईजेशन के उपयोग पर प्रकाश डाला। उन्होनें इस तरह की संगोष्ठी में कृषकों एवं कपास उत्पादकों को आमंत्रित कर उनकी प्रतिक्रिया लेकर वैज्ञानिकों को कपास के अच्छे एवं गुणवत्तापूर्ण उत्पादन के लिए रणनीति बनाने पर जोर दिया। उन्होनें कपास पर अधिक रसायनिक कीटनाशकों के उपयोग को कम कर जैव-कीटनाशी के उपयोग पर जोर दिया। साथ ही कपास के अधिक उत्पादन एवं विपणन के लिए इससे संबंधित उद्योग समूहों को अनुबंधित करने पर जोर दिया। अतः कपास की खेती को नई दिशा दिये जाने की आवश्यकता है।

डा. एस. के. शर्मा, निदेशक अनुसंधान, अनुसंधान निदेशालय, मप्रकृप्रौविवि, उदयपुर ने अपने स्वागत उद्बोधन में अतिथियों का स्वागत करते हुए बताया कि इस संगोष्ठी में 12 तकनीकी सत्र एवं वैज्ञानिकों के द्वारा 70 से भी अधिक प्रस्तुतीकरण किये गये। डा. शर्मा ने कपास में बीटी किस्मों के अभिग्रहण, शस्य प्रबन्धन, पादप संरक्षण पहलुओं पर प्रकाश डाला। साथ ही उन्होने कपास की खेती में गुलाबी सुण्डी एवं सफेद मक्खी के प्रकोप की चर्चा की।

सत्र में विभिन्न कपास वैज्ञानिकों को उत्कृष्ट मौखिक एवं पोस्टर प्रस्तुतीकरण देने पर अवार्ड से सम्मानित किया गया। डा. जाय दास को युवा वैज्ञानिक मेरिट अकेडमिक अवार्ड एवं रूपये 11,000 का नकद पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सीआरडीए के सचिव डाॅ. एम. एस. चैहान ने बताया कि संगोष्ठी में कुल 175 से भी ज्यादा वैज्ञानिकों, विद्यार्थियों के उद्यमियों ने भाग लिया। अन्त में डा.डी.पी. सैनी ने धन्यवाद पे्रषित किया।

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