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राज्य कृषि समाचार (State News)

छिंदवाड़ा: बायो रिसोर्स सेंटर से आत्मनिर्भर बने किसान कुशवाहा

28 सितंबर 2026, छिंदवाड़ा: छिंदवाड़ा: बायो रिसोर्स सेंटर से आत्मनिर्भर बने किसान कुशवाहा –  प्राकृतिक खेती किसानों को रासायनिक कृषि आदानों पर निर्भरता कम करने के साथ-साथ खेती की लागत घटाने और अतिरिक्त आय के नए अवसर उपलब्ध करा रही है। छिंदवाड़ा विकासखंड के ग्राम कुहिया निवासी कृषक श्री शिवचरण कुशवाहा इसका प्रेरणादायक उदाहरण हैं। उन्होंने प्राकृतिक खेती को अपनाकर न केवल अपने खेत की लागत कम की, बल्कि बायो रिसोर्स सेंटर (बीआरसी) के माध्यम से स्वयं जैविक उर्वरक एवं जैविक कीटनाशक तैयार कर आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम बढ़ाया है।

रासायनिक खेती से प्राकृतिक खेती की ओर – कृषक श्री शिवचरण कुशवाहा के पास कुल 4 एकड़ कृषि भूमि एवं 2 देशी गाय हैं। कुछ वर्षों पहले तक वे अपने खेत में मुख्य रूप से रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों का उपयोग करते थे। लगातार बढ़ती कृषि लागत तथा मिट्टी की उर्वरता में कमी महसूस होने के बाद उन्होंने खेती की पद्धति में बदलाव करने का निर्णय लिया।  वर्ष 2025 से आत्मा परियोजना के अंतर्गत नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग से जुड़कर उन्होंने प्राकृतिक खेती के विभिन्न घटकों को तैयार करने एवं उनके उपयोग का प्रशिक्षण प्राप्त किया। प्रशिक्षण के दौरान उन्होंने बीजामृत, जीवामृत, नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र सहित विभिन्न प्राकृतिक कृषि आदान तैयार करना सीखा।

बीआरसी यूनिट से बने आत्मनिर्भर- प्राकृतिक खेती के प्रति उनकी सक्रियता एवं रुचि को देखते हुए उन्हें योजना के अंतर्गत बायो रिसोर्स सेंटर (बीआरसी) यूनिट उपलब्ध कराई गई। बीआरसी यूनिट स्थापना के लिए कृषि विभाग की आत्मा परियोजना द्वारा ₹1,00,000 की अनुदान सहायता रही जो दो किस्तों में प्रदान की गई।  इस यूनिट के माध्यम से श्री कुशवाहा अब अपने खेत के लिए आवश्यक जैविक उर्वरक एवं जैविक कीटनाशक स्वयं तैयार कर रहे हैं। इससे उन्हें बाजार से कृषि आदान खरीदने पर होने वाले खर्च में कमी आई है। साथ ही आवश्यकता के अनुसार वे अन्य किसानों को भी प्राकृतिक कृषि आदान उपलब्ध करा रहे हैं।

विविध फसलों से बढ़ी आमदनी– श्री कुशवाहा ने अपने 4 एकड़ क्षेत्र में विभिन्न फसलों का विविधीकरण किया है। लगभग 2 एकड़ में स्वीट कॉर्न, 25 डिसमिल में अदरक, तुअर, तिल्ली एवं बेबी कॉर्न तथा 75-75 डिसमिल क्षेत्र में बैंगन एवं लगभग 4,000 गेंदा पौधों का उत्पादन किया जा रहा है। इसके साथ टमाटर एवं अन्य सब्जियों का भी उत्पादन किया जा रहा है।  इन फसलों से अब तक लगभग ₹3.20 लाख की बिक्री की जा चुकी है, जिससे लगभग ₹2.80 लाख का शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ है। वहीं, स्वयं तैयार किए गए जैविक उर्वरक एवं जैविक कीटनाशकों के उपयोग से ₹60 हजार से अधिक की कृषि लागत में बचत हुई है।

   प्राकृतिक तरीके से उत्पादित स्वीट कॉर्न एवं सब्जियों की स्थानीय स्तर पर अच्छी मांग बनी हुई है। ग्राम कुहिया के शिक्षक, ग्रामीण तथा जैविक उत्पादों के प्रति रुचि रखने वाले उपभोक्ता उनके खेत से सीधे सब्जियां एवं स्वीट कॉर्न खरीदने पहुंचते हैं। खेत से सीधे बिक्री के बाद बची हुई उपज का विक्रय गुरैया मंडी स्थित साप्ताहिक जैविक हाट में किया जाता है। इससे उन्हें अपनी उपज के लिए स्थानीय बाजार उपलब्ध हो रहा है तथा परिवहन और बिचौलियों पर निर्भरता भी कम हुई है।

प्राकृतिक खेती से आत्मनिर्भरता की ओर- कृषक श्री शिवचरण कहते हैं कि प्राकृतिक खेती अपनाने से खेती उनके लिए केवल उत्पादन का माध्यम नहीं रही, बल्कि यह मृदा संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण, स्वस्थ खाद्य उत्पादन और बेहतर आय का माध्यम बन गई है।

  श्री कुशवाहा जैसे जागरूक कृषक प्राकृतिक खेती, स्थानीय स्तर पर तैयार कृषि आदान और स्थानीय बाजार, इन तीनों को एक साथ अपनाकर खेती की लागत कम करने के साथ अपनी आय और आत्मनिर्भरता को बढ़ा रहे हैं।

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