फसल अवशेष (पराली ) जलाने से होता है हानिकारक प्रदूषकों का उत्सर्जन – डॉ. मिश्र  

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Jabalpur3

1 मार्च 2022, इंदौर । फसल अवशेष (पराली ) जलाने से होता है हानिकारक प्रदूषकों का उत्सर्जन  – डॉ. मिश्र  – खरपतवार अनुसन्धान निदेशालय ,जबलपुर में वर्ष 2012 से जबलपुर और इसके करीबी जिलों में संरक्षित कृषि आधारित फसल चक्र में खरपतवार प्रबंधन की तकनीकों का प्रदर्शन किया जा रहा है।  निदेशक डॉ जे एस मिश्र ने इस आलेख में फसल अवशेषों की जलाने से होने वाले नुकसान का जिक्र कर संरक्षित कृषि को लाभकारी और पर्यावरण हितैषी बताते हुए इसे अपनाने को समय की मांग बताया है।

दीर्घावधि अवधि अध्ययन के डराते आंकड़े  – प्रायः देखा गया है कि धान की कटाई कम्बाईन मशीन द्वारा की जाती है, जिसमें फसल अवशेष एक कतार में पीछे छूट जाते हैं , जिनका निस्तारण मुश्किल से होता है। कटाई के बाद किसान अगली फसल की जल्दी बुवाई करने के लिए फसल अवशेषों को जला देते हैं। इसी प्रकार धान के बाद गेहूं के अवशेषों को भी मूंग की बुवाई हेतु जला दिया जाता है।

दीर्घावधि अवधि अध्ययन के जो आंकड़े सामने आए हैं वे डरावने हैं।  प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रति हेक्टेयर धान में 7  टन अवशेष जला दिया जाता है।  इसमें करीब 5 टन /हेक्टेयर कार्बन डाई ऑक्साइड ,40.6 किलो मीथेन और 2.03 किलो नाइट्रस ऑक्साइड का उत्सर्जन होता है। इसी प्रकार गेहूं से 5 टन /हेक्टेयर फसल अवशेष मिलता है , जिसे जलाने पर 2.25 टन /हे कार्बन डाई ऑक्साइड, 4.42 किलो मीथेन और 0.92  किलो नाइट्रस ऑक्साइड उत्सर्जित होता है। यदि इन उत्सर्जनों को कार्बन डाई ऑक्साइड के समतुल्य के आधार पर देखें तो कुल ग्रीन गैस 216 किलो / हे की दर से उत्सर्जित होती है। इसके साथ-साथ अन्य प्रदूषक भी हवा में उत्सर्जित होते हैं, उनकी मात्रा लगभग 605.6  किलो / हेक्टेयर होती है। जिसमें प्रमुखता से पार्टी कुलेट मैटर (पी एम )2.5 और10 ,सल्फर डाई ऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड और अन्य भी शामिल हैं। इन हानिकारक प्रदूषकों से कैसे बचा जाए इस विषय पर ध्यान देने की ज़रूरत है। इसके लिए विभिन्न तकनीकों पर कार्य किया जा रहा है।

शून्य भू -परिस्करण यंत्र (हैप्पी सीड ड्रिल ) – इस यंत्र के उपयोग से फसल अवशेषों की उपस्थिति में ही अगली फसल की बुवाई की जा सकती है और फसल अवशेषों को जलाने से वातावरण को प्रदूषित होने से बचाया जा सकता है। इस यंत्र में फलोल लगे होते हैं , जो रोटरी का कार्य करता है तथा खाद-बीज गिरने के पहले ही जो फसल अवशेष इसके सामने आता है उसे काट कर हटा दिया जाता है और मशीन में लगे दांते के द्वारा एक चीरा लगाया जाता है ,जिसके अंदर खाद एवं बीज उचित गहराई पर गिरते हैं , जिसके फलस्वरूप उचित अंकुरण होता है।

संरक्षित कृषि के लाभ – इस प्रकार की खेती से जुताई में लगने वाला 4500 रु /हेक्टेयर का खर्च बचता है। फसल अवशेष मिट्टी के ऊपर होने से खरपतवार के प्रभाव को 20 -25 % कम कर देते हैं ,जिससे निंदाई में होने वाला खर्च कम हो जाता है। फसल अवशेष मृदा के वाष्पीकरण को भी रोकते हैं ,जिससे नमी संचित रहती है। इस कारण सिंचाई की अवधि और संख्या को कम किया जा सकता है। यही नहीं जो फसल अवशेष मिट्टी में रहकर सड़ जाते हैं , जिससे मिट्टी में सूक्ष्म जीवों की संख्या तथा कार्बनिक पदार्थ में वृद्धि होती है। मिट्टी के स्वास्थ्य में भी वृद्धि होती है। इस खेती में मृदा अपरदन नहीं होता और पोषक तत्व फसलों के लिए उपलब्ध होते हैं। फसल चक्र प्रणाली से फसलोत्पादन में वृद्धि होती है। दो फसलों के अंतराल को कम करता है ,इसलिए गेहूं की फसल पर उच्च तापमान का असर कम होता है। मूंग की फसल की जल्दी बुवाई करने से वर्षा आरम्भ होने से पहले ही कटाई /गहाई हो जाती है।

फसल अवशेष जलाने से होने वाले नुकसान – फसल अवशेष जलाने से भूमि की उर्वरा शक्ति घटती है। वातावरण में प्रदूषण का स्तर बढ़ता है।वायु में कार्बन डाई ऑक्साइड , मीथेन ,नाइट्रस ऑक्साइड और अन्य प्रदूषक कणों की मात्रा बढ़ जाती है ,जिससे अस्थमा और श्वास संबंधी बीमारियां होती है।  फसल अवशेष जलाने से मिट्टी में मौजूद मित्र कीटों एवं सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या में भारी कमी हो जाती है।  ज़मीन कठोर हो जाती है।  धुंआ बढ़ने से दृष्टि बाधित होने और दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ जाती है।

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