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राज्य कृषि समाचार (State News)

आंध्र प्रदेश: किसान सम्मेलन में ICAR के वैज्ञानिकों ने बताए जायफल की खेती के टिप्स, इंटरक्रॉपिंग से बढ़ेगी आमदनी  

08 जुलाई 2025, सलूर: आंध्र प्रदेश: किसान सम्मेलन में ICAR के वैज्ञानिकों ने बताए जायफल की खेती के टिप्स, इंटरक्रॉपिंग से बढ़ेगी आमदनी – मसाला फसलों में किसानों की बढ़ती रुचि और जायफल जैसी उच्च-मूल्य वाली फसलों की संभावनाओं को देखते हुए, भारतीय मसाला अनुसंधान संस्थान (ICAR-IISR), कोझीकोड ने आंध्र प्रदेश के सलूर जिले में किसान सम्मेलन का आयोजन किया। यह कार्यक्रम प्रगतिशील किसान लीला प्रसाद चालसानी के खेत में हुआ, जिसमें लगभग 80 से अधिक किसान शामिल हुए।

वैज्ञानिकों ने बताए जायफल की खेती के आसान टिप्स

इस अवसर पर, भाकृअनुप-IISR की वैज्ञानिक टीम ने किसानों को जायफल की खेती से जुड़ी आधुनिक तकनीकों और वैज्ञानिक तरीकों की जानकारी दी। टीम ने सलूर, राजमुंदरी और एलुरु क्षेत्रों का दौरा कर वहां की जलवायु, भूमि और फसलों की स्थिति का विश्लेषण किया।

तकनीकी सत्र में किसानों को बताया गया:

1. जायफल के लिए मुख्य फसल के साथ रोपण ज्यामिति: जायफल को पाम ऑयल, नारियल और सुपारी जैसी ऊँची फसलों के साथ लगाया जा सकता है। इसके लिए रोशनी की उपलब्धता बनाए रखना जरूरी है।
2. गुणवत्ता वाले पौधे चुनें: रोग-प्रतिरोधी और प्रमाणित नर्सरी से तैयार पौधे ही लगाएं ताकि उपज बेहतर हो।
3. सही रोपण समय: मानसून की शुरुआत में रोपण करना सबसे उपयुक्त माना गया।
4. सिंचाई और उर्वरक की योजना: जैविक खाद, कंपोस्ट और समयबद्ध सिंचाई का अभ्यास करने की सलाह दी गई।
5. फसल सुरक्षा: पत्तों को झुलसाने वाली बीमारियों, कीटों से बचाव के लिए जैविक कीटनाशकों का प्रयोग करें।

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अंतरवर्ती फसल (Intercropping) का सुझाव

सम्मेलन में वैज्ञानिकों ने जोर दिया कि जब तक जायफल का पौधा पूर्ण विकसित नहीं होता (3-4 साल), तब तक किसान उसके साथ हल्दी, अदरक, धनिया या मूंगफली जैसी फसलें लगा सकते हैं। इससे उन्हें शुरुआती वर्षों में भी अच्छी आमदनी हो सकती है।

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80 से अधिक किसानों ने लिया भाग

सम्मेलन में 80 से ज्यादा किसानों ने भाग लिया। उन्होंने वैज्ञानिकों से सीधे सवाल पूछे और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार खेती के सुझाव लिए। चर्चा में यह भी सामने आया कि सलूर जैसे आद्र-जलवायु वाले क्षेत्रों में जायफल की खेती की काफी अच्छी संभावनाएं हैं। इस आयोजन का उद्देश्य न केवल जायफल की वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा देना था, बल्कि किसानों को स्थानीय परिस्थिति के अनुसार खेती की रणनीति अपनाने, अंतरवर्ती फसलों से आमदनी बढ़ाने और लंबे समय में स्थायी लाभ कमाने के लिए प्रोत्साहित करना भी था।

भाकृअनुप-भारतीय मसाला अनुसंधान संस्थान (IISR) की यह पहल उनके “सतत मसाला खेती अभियान” का हिस्सा है। इसका मकसद है कि देशभर के किसान वैज्ञानिक सलाह के साथ मसाला फसलों की ओर बढ़ें और अधिक लाभ कमा सकें। प्रगतिशील किसान लीला प्रसाद चालसानी ने कहा, “इस सम्मेलन से हमें बहुत लाभ हुआ। वैज्ञानिकों ने जो तकनीकी बातें समझाईं, वो ज़मीनी स्तर पर खेती में मदद करेंगी। हम अब वैज्ञानिक पद्धति से जायफल की खेती कर पाएंगे।”

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