बेंगलुरु में बड़वानी के 25 किसानों को मिला प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण, जीवामृत-बीजामृत समेत जैविक आदान बनाना सीखा
28 सितंबर 2026, बेंगलुरु: बेंगलुरु में बड़वानी के 25 किसानों को मिला प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण, जीवामृत-बीजामृत समेत जैविक आदान बनाना सीखा – कम लागत में टिकाऊ और जहरमुक्त खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बड़वानी जिले के किसानों के लिए बेंगलुरु में प्राकृतिक कृषि एवं कृषि की उन्नत पद्धतियों पर आधारित तीन दिवसीय विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। श्री श्री इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी ट्रस्ट, बेंगलुरु द्वारा आयोजित यह प्रशिक्षण कार्यक्रम 22 से 24 सितंबर 2026 तक चला। इसमें बड़वानी जिले के 25 प्रगतिशील किसानों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
प्राकृतिक आदान तैयार करने की मिली जानकारी
प्रशिक्षण के दौरान विशेषज्ञों ने किसानों को रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के विकल्प के रूप में प्राकृतिक खेती में उपयोग होने वाले विभिन्न घटकों की जानकारी दी। किसानों को जीवामृत, बीजामृत, ब्रह्मास्त्र, घनजीवामृत, आग्नेयास्त्र, नीमास्त्र, दशपर्णी अर्क, पंचगव्य और एंजाइम घोल तैयार करने की विधियों का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया। इन प्राकृतिक आदानों को तैयार करने की प्रक्रिया का सजीव प्रदर्शन भी किया गया, ताकि किसान इन्हें अपने स्तर पर तैयार कर खेती में उपयोग कर सकें। प्रशिक्षण में प्राकृतिक खेती के साथ कृषि की उन्नत पद्धतियों से जुड़े विभिन्न पहलुओं की भी जानकारी दी गई।
खेती के साथ स्वास्थ्य पर भी दिया गया जोर
प्रशिक्षण कार्यक्रम को केवल कृषि तकनीकों तक सीमित नहीं रखा गया। किसानों के समग्र विकास को ध्यान में रखते हुए स्वस्थ जीवनशैली और तनावमुक्त जीवन के लिए योगाभ्यास एवं सुदर्शन क्रिया का अभ्यास भी कराया गया। इस दौरान किसानों को खेती के साथ अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देने के महत्व की जानकारी दी गई। प्रशिक्षण में कृषि गतिविधियों के साथ बेहतर जीवनशैली को भी जोड़ा गया।
प्रमाण पत्र देकर प्रशिक्षण का समापन
तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंतिम दिन सभी प्रतिभागी किसानों को प्राकृतिक खेती के प्रशिक्षण के प्रमाण पत्र वितरित किए गए। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद किसान और अधिकारी बड़वानी के लिए रवाना हुए और सुरक्षित अपने गृहग्राम पहुंचे। इस प्रशिक्षण से बड़वानी जिले में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। प्राकृतिक आदानों के उपयोग से खेती में रासायनिक इनपुट पर निर्भरता और लागत को कम करने के साथ मिट्टी की उर्वरता के संरक्षण की दिशा में भी किसानों को मदद मिल सकती है।
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