पराली से प्रदूषण जिम्मेदार कौन ?

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केवल किसान ही दोषी क्यों ?

माननीय उच्चतम न्यायालय पराली जलाने से उत्पन्न धुएं को संज्ञान में लेकर केवल किसानों को दोषी ठहरा रहा है। राज्य सरकारें, किसानों के विरुद्ध वैधानिक कार्यवाही कर जेल में ठूंसने के लिए बेचैन हैं। प्रश्न यह है कि किसान पराली जलाने को क्यों मजबूर है और क्या इसके लिए केवल किसान ही दोषी है ?

कम्बाईन हारवेस्टर द्वारा वर्तमान समय में धान की कटाई बहुत ऊंचे से की जाती है व नमी युक्त धान के पौधे के अवशेष बड़ी मात्रा में खेतों में रह जाते हैं। इस अवशेष को सीमित समय में अगली फसल के लिए खेत की तैयारी हेतु हटाना आवश्यक होता है इसका सर्वाधिक सुगम उपाय पराली जलाना ही है। पराली जलाने के नुकसान किसान स्वयं भी समझता है परन्तु ऐसी परिस्थितियां क्यों उत्पन्न हुई, इस पर भी विचार जरूरी है। परंपरागत रूप से किसान जब धान की फसल हंसिये से काटता था तब फसल के अवशेष मात्र 2-3 इंच ऊंचाई के ही खेत में बचते थे जिसमें भूमि की तैयारी के लिए बखरनी आसानी से हो जाती थी। हारवेस्टर द्वारा कटाई के उपरांत खेत में बचे अवशेष 12-14 इंच या इससे अधिक लम्बे होते हैं जो खेत की तैयारी के समय बार-बार बखरनी की मशीनों में फंस जाते हैं, खेत जिनके निकालने में समय और परिश्रम बहुतायत से लगता है। सच तो यह है कि पहले कृषि कार्य के लिए मजदूर आसानी से मिलते थे और उन्हें मजदूरी भी कम देना पड़ती थी। 

(श्रीकान्त काबरा, मो. : 9406123699)राजधानी दिल्ली और उससे सटे क्षेत्रों में किसानों द्वारा पराली जलाने के कारण आसमान में दमघोंटू धुंध की चादर छाई हुई है। हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश के किसानों के खेतों में हारवेस्टर द्वारा धान की कटाई के उपरांत बचे अवशेषों (पराली) से खेत साफ करने के लिए आग लगाने पर निकले धुएं के कारण भारी मात्रा में प्रदूषण हो रहा है और हवा के साथ धुआं दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों में मानव जीवन के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित हो रहा है।

श्रमिकों का अभाव

राज्य सरकारों द्वारा ढेर सारी जन कल्याणकारी योजनाएं चालू होने के बाद आसानी से सुलभ राज सहायता के चलते मजदूर कठिन परिश्रम से जी चुराते हैं। उन्हें मुफ्तखोरी की लत लग गई है व राजनेताओं को भी वोट के लालच में ऐसी लोक लुभावन योजनाओं के जरिये सत्ता पर विराजमान होने का लोभ जागृत हो गया है। बढ़ते शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के कारण भी मजदूर गांव से पलायन करने को मजबूर हैं। मजदूरों की कमी के कारण यंत्रीकृत कृषि तेजी से बढ़ रही है व इस कारण हारवेस्टर से कटाई के बढ़ते चलन के कारण पराली जलाने की घटनाएं व्यापक रूप ले रही हैं। खेती से अनभिज्ञ न्यायकर्ताओं ने पराली समस्या के समाधान के लिए छोटे और सीमांत किसानों को सौ रूपये प्रति क्विंटल दाम से पराली लेनेे के निर्देश राज्य सरकारों को दिये हैं जबकि छोटे और सीमांत किसान अपने खेतों की कटाई स्वयं करने में सक्षम है। 

मजदूरों के अभाव में बड़े किसानों द्वारा फसल कटाई के लिए हारवेस्टर का उपयोग करना उनकी मजबूरी है। उन्हें राज सहायता देना पराली प्रदूषण की समस्या से जूझने के लिए उचित समाधान है व इससे कृषि मजदूरों को रोजगार भी मिलेगा।

पराली प्रदूषण के समाधान हेतु हारवेस्टर द्वारा कम ऊंचाई से फसल काटना और पराली एकत्रित करने के लिए बेलिंग मशीनों का उपयोग भी समाधानकारी उपाय है।

किसानों को दोषी ठहराने के लिए न्यायालय, राजनेता और वैज्ञानिक सभी एकजुट हैं परन्तु किसान के समक्ष आ रही कठिनाइयों को जानने- समझने और उसके समाधान के लिए अपनी-अपनी भूमिका और पहल के प्रयास में किसी की रुचि नहीं है।

कृषि इंजीनियरी में शोध आवश्यक

देश में कृषि इंजीनियरी अनुसंधान और विकास के बड़े-बड़े नामी-गिरामी संस्थान हैं परन्तु उनकी शोध किसानों की समस्या-समाधान के लिए है या वैज्ञानिकों की स्वयं की पद प्रतिष्ठा के संरक्षण तक सीमित हैं इसका कोई समाधानकारी निष्पक्ष आकलन नहीं है। इन संस्थानों द्वारा विकसित कृषि यंत्र इन संस्थानों के आस-पास ही किसान प्रयोग कर रहे हैं। उनका व्यावसायिक निर्माण और बाजार मांग है या नहीं, इसका भी आकलन नहीं है। धान की खेती के लिए प्रसिद्ध जापान, ताईवान, फिलीपींस, चीन जैसे देशों में सस्ते और आधुनिक कृषि यंत्र विकसित कर लिये हैं। सस्ती कीमत के इन कृषि यंत्रों को किसानों तक पहुंचाने के इनके प्रदर्शन, प्रशिक्षण तक की भी कोई व्यापक व्यवस्था नहीं है और कड़वी सच्चाई तो यह है कि इन सस्ते बहुउपयोगी कृषि यंत्रों को शासकीय अनुदान सहायता के माध्यम से किसानों के हाथों तक पहुंचने में अनुदान सहायता तो प्रशासनिक तंत्र ही लील जाता है। 

किसानों को ढेरों चक्कर काटने के बाद भी इनका लाभ मिलता है और अशिक्षा डिजिटिलाईजेशन प्रक्रिया और इसकी जटिलता तथा सीमित संख्या में प्रशासकीय अकर्मण्यता के चलते किसानों तक ये कृषि यंत्र सुलभता से भरपूर संख्या में नहीं मिल पाते। हमारा उद्योग जगत भी सस्ते और कार्य सुलभ कृषि यंत्र किसानों को उपलब्ध कराने की बनाए। उन्हें महंगी बनाकर किसानों को दी जाने वाली शासकीय अनुदान सहायता का बड़ा हिस्सा हजम करने और अपने उत्पाद को बेचने के उद्देश्य से प्रशासकीय तंत्र से तालमेल बैठाकर उन्हें उपकृत करने में लगा रहता है।

पराली उद्योग विकसित करें

पराली के औद्योगिक उपयोग की संभावनायें विकसित कर इसे उपयोगी बनाने पर इसका आकर्षक बाजार मूल्य मिल सकता है, इससे भी किसान पराली जलाने की बजाए इसे बेचना पसंद करेगा।

पराली के अवशेष बड़ी मात्रा में खेतों में रहने के कारण खेत की तैयारी में होने वाली परेशानी को सुगम बनाने का एक आसान और यंत्रीकृत उपाय है हैरो प्लाऊ के प्रयोग को प्रोत्साहित कराना। कनाडा जैसे देशों में इस कृषि यंत्र को खेत की तैयारी के लिए उपयोग किया जाता है। वहां कल्टीवेटर का उपयोग बहुत कम होता है। इस यंत्र से कम समय में 3 से 4 इंच तक की गहरी जुताई हो जाती है व फसल अवशेष आसानी से मृदा में मिलाये जा सकते हैं। भारत में अब इनका निर्माण सीमित मात्रा में होने लगा है परन्तु अधिकांश कृषि विशेषज्ञ भी इस यंत्र और इसकी उपयोगिता एवं कार्यप्रणाली के बारे में नहीं जानते। इस यंत्र के प्रयोग के लिए 75 से 90 हा.पा. के ट्रैक्टर आदर्श माने जाते हैं और शासकीय अनुदान सहायता देकर इनके प्रयोग को प्रोत्साहित किया जा सकता है।

देश का अन्नदाता किसान आज अपनी विवशताओं से जूझते हुए फटेहाल होकर भी देश के स्वाभिमान को बचाए रखने के लिए कर्ज के जाल में डूब कर भी अन्न उत्पादन के लिए प्रयत्नशील है फिर भी इसे दोषी ठहराने में कोई भी पीछे नहीं है। यही उसकी दुर्भाग्यपूर्ण नियति है और इस कारण ही युवा पीढ़ी का खेती से मोह भंग हो रहा है।

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