राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

कैसा भी हो मौसम, चावल की ये किस्में किसानों के लिए ’किस्मत के सितारे’

11 फ़रवरी 2025, नई दिल्ली: कैसा भी हो मौसम, चावल की ये किस्में किसानों के लिए ’किस्मत के सितारे’ – भोजन की थाली चावल के बगैर शोभा नहीं देती है वहीं यूं देखा जाए तो घरों में हर दिन ही दाल के साथ चावल भी बनाए ही जाते है। दरअसल भारत की यदि बात करें तो चावल का उत्पादन करने वाले किसानों की भी यहां कमी नहीं है वहीं देश में उत्पादित चावल विदेशों तक भी जाते है।

कृषि विशेषज्ञों का यह कहना है कि चावल की कई ऐसी उन्नत किस्में है जो चावल उत्पादक किसानों के लिए किस्मत के सितारे बनी हुई क्योंकि ऐसी किस्मों के उत्पादन में न तो मौसम ही आडे आता है और न रोग। बावजूद इसके किसानों को मुनाफा मिलता है।

यहाँ उन संस्थानों के योगदान की बात होगी, जो किसानों की भलाई के लिए चावल की नई और उपयोगी किस्में विकसित कर रहे हैं, ताकि भारत के किसान न केवल आत्मनिर्भर बनें, बल्कि कृषि में नई ऊंचाइयों को भी छू सकें।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) नई और उन्नत किस्मों के विकास में अहम भूमिका निभाता है। इस संस्था का उद्देश्य चावल की ऐसी किस्में विकसित करना है, जो देश के बदलते कृषि परिदृश्य में किसानों के लिए उपयोगी हों। IARI में चावल की किस्मों के विकास के लिए कई शोध कार्यक्रम चलाए जाते हैं। वैज्ञानिक चावल की नई किस्मों को विकसित करने के लिए संकरण (हाइब्रिडाइजेशन), जैव-प्रौद्योगिकी, और जीन संपादन तकनीकों का उपयोग करते हैं। IARI ने कई प्रमुख चावल की किस्में विकसित की हैं, जैसे कि पूसा बासमती, जो न केवल घरेलू बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी बहुत लोकप्रिय है।

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केंद्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (CRRI), कटक, भारत में चावल अनुसंधान के लिए एक प्रमुख केंद्र है। ये संस्थान विशेष रूप से चावल की नई किस्मों के विकास और उत्पादन से संबंधित समस्याओं के समाधान पर काम करता है। CRRI देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग जलवायु परिस्थितियों के लिए विशेष चावल की किस्में विकसित करता है। उदाहरण के लिए, स्वर्णा सब-1 जैसी किस्म बाढ़-प्रभावित क्षेत्रों के लिए विकसित की गई है। ये किस्म 14-17 दिनों तक पानी में डूबे रहने के बाद भी जीवित रहती है और उत्पादन देती है, जिससे बाढ़ प्रभावित किसान इसे अपनाकर अपनी पैदावार बचा सकते हैं। CRRI ने कई रोग-प्रतिरोधक किस्में भी विकसित की हैं, जिनसे किसान बिना कीटनाशक के भी अपनी फसल को कीड़ों और बीमारियों से बचा सकते हैं। उदाहरण के लिए, IR64 एक ऐसी किस्म है जो रोगों और कीटों से लड़ने में सक्षम है। CRRI द्वारा विकसित नई किस्मों को पहले व्यापक परीक्षणों से गुजारा जाता है।

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भारत के राज्य कृषि विश्वविद्यालय (SAUs) भी चावल की किस्मों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये विश्वविद्यालय क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुसार चावल की किस्में विकसित करते हैं, ताकि हर राज्य में स्थानीय कृषि समस्याओं का समाधान हो सके। हर राज्य में जलवायु, मिट्टी और पानी की उपलब्धता अलग होती है। इसलिए राज्य कृषि विश्वविद्यालय उन किस्मों पर विशेष ध्यान देते हैं जो उनके राज्य की मौजूदा परिस्थितियों में उगाई जा सकें। उदाहरण के लिए, तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय (TNAU) ने सूखा-सहनशील किस्में विकसित की हैं, जो सूखे की स्थिति में भी उत्पादन कर सकती हैं। राज्य कृषि विश्वविद्यालय स्थानीय किसानों के साथ मिलकर उन्नत बीज वितरण, प्रशिक्षण और कार्यशालाएं आयोजित करते हैं। वे किसानों को ये सिखाते हैं कि नई किस्मों को कैसे उगाना है, उनकी देखभाल कैसे करनी है, और उन्हें किस तरह से विपणन करना है।

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