जशपुर में आदिवासी किसानों ने सेब की खेती से बदली तस्वीर
15 अक्टूबर 2026, जशपुर (छत्तीसगढ़): जशपुर में आदिवासी किसानों ने सेब की खेती से बदली तस्वीर – छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल जशपुर जिले में सेब की खेती किसानों की आय का नया जरिया बनती जा रही है। जिले के मनोरा और बगीचा विकासखंड के शैला, छतौरी, करडना और छिछली जैसे गांवों में करीब 410 आदिवासी किसान लगभग 410 एकड़ जमीन पर सेब के पेड़ लगा चुके हैं। अधिकतर किसानों ने एक-एक एकड़ में ही शुरुआत की थी।
यह पहल 2023 में जिला प्रशासन, ग्रामीण विकास एवं विकास सोसायटी और नाबार्ड के संयुक्त प्रयासों से शुरू हुई थी। किसानों को उस समय पौधे, तकनीकी मार्गदर्शन और प्रशिक्षण मुहैया कराया गया था। तीन साल बाद अब पेड़ों पर फल आने लगे हैं और इस सीजन में फलों का आकार और गुणवत्ता पहले से बेहतर बताई जा रही है।
कश्मीर जैसी गुणवत्ता का दावा
ग्रामीण विकास एवं विकास सोसायटी के अध्यक्ष राजेश गुप्ता के मुताबिक किसानों को पौधे लगाने से पहले से ही तकनीकी मार्गदर्शन दिया गया, जिसमें कलम चढ़ाने की विधि से लेकर सिंचाई और देखभाल तक की जानकारी शामिल थी। किसानों का कहना है कि उनके बगीचों में तैयार सेब का स्वाद और गुणवत्ता कश्मीर व हिमाचल प्रदेश से आने वाले सेब जैसी है। स्थानीय मंडियों के साथ-साथ अब दूसरे जिलों से भी व्यापारी इन सेबों की मांग कर रहे हैं।
जशपुर में समुद्र तल से ऊंचाई और ठंडा मौसम होने के कारण सेब की खेती के लिए जरूरी वातावरण पहले से मौजूद था, लेकिन इससे पहले यहां परंपरागत रूप से धान की ही खेती होती रही है। धान पर निर्भरता कम करने और किसानों की आय के नए स्रोत तैयार करने के मकसद से ही बागवानी को बढ़ावा देने का यह मॉडल अपनाया गया।
फसल विविधीकरण की दिशा में कदम
राज्य सरकार परंपरागत खेती के साथ फल उत्पादन को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है, जिसके तहत जशपुर जैसे आदिवासी बहुल जिलों में बागवानी की नई संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। प्रशासन के मुताबिक आने वाले समय में इस मॉडल को जिले के अन्य विकासखंडों में भी बढ़ाया जा सकता है, बशर्ते मौजूदा किसानों के नतीजे उत्साहजनक बने रहें।
सेब की फसल में निवेश भले ही धान जैसी परंपरागत फसलों से ज्यादा हो, लेकिन फल आने के बाद मिलने वाला दाम इसे किसानों के लिए आकर्षक विकल्प बनाता है। गांवों में अब दूसरे किसान भी पड़ोसियों के बगीचे देखकर सेब की खेती में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। प्रशासन का कहना है कि आने वाले वर्षों में उत्पादन बढ़ने के साथ ही इसकी मार्केटिंग के लिए भी अलग व्यवस्था बनाई जाएगी, जिससे किसानों को बेहतर दाम मिल सकें।
जशपुर पहले भी अपने ठंडे मौसम और पहाड़ी इलाकों के कारण छत्तीसगढ़ में अलग पहचान रखता रहा है, लेकिन सेब की खेती की शुरुआत ने जिले को नई तरह से चर्चा में ला दिया है। शुरुआती दौर में कई किसान इस प्रयोग को लेकर आशंकित थे, क्योंकि राज्य में इससे पहले इस स्तर पर सेब की व्यावसायिक खेती का कोई उदाहरण मौजूद नहीं था। बीते तीन सालों में पौधों की बढ़त और फलन को देखकर अब यह भरोसा मजबूत हुआ है कि जशपुर की जमीन और मौसम सेब के लिए अनुकूल साबित हो सकते हैं।
ग्रामीण विकास एवं विकास सोसायटी की टीम समय-समय पर किसानों के बगीचों का दौरा करती है और कीट-रोग नियंत्रण से लेकर खाद-पानी के प्रबंधन तक की सलाह देती है। किसानों को यह भी बताया गया है कि पेड़ों की सही कटाई-छंटाई और नियमित सिंचाई से आने वाले सालों में उत्पादन और बढ़ाया जा सकता है। जिला प्रशासन का कहना है कि नतीजे उत्साहजनक रहने पर इस मॉडल को आसपास के दूसरे पहाड़ी विकासखंडों में भी ले जाने की योजना पर काम किया जा रहा है, जिससे अधिक से अधिक आदिवासी परिवारों को इसका फायदा मिल सके।
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