कृषि से संभावनाओं को तलाशने का वक्त

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अर्थव्यवस्था में रफ्तार के लिये

कृषि पर प्रभावी नीति की प्रतीक्षा

देश की संसद में 75 फीसदी सांसद कृषि से जुड़े होने के बाद भी कृषि पर सार्थक चर्चा एवं प्रभावी नीति पेश करने में नाकाम है। मात्र अर्थहीन संवादों पर हंगामा करने एवं सदन का वहिष्कार करने वाले हमारे कृषक सांसद, देश की राष्ट्रीय आय में 46 फीसदी की हिस्सेदारी रखने वाली कृषि पर चिंतन एवं मंथन करने में हमेशा ही पिछड़ जाते है। विश्व में हो रहे जलवायु परिवर्तन से सर्वाधिक आहत देश का किसान ही हो रहा है। विश्व के विकासशील देशों ने प्रकृति की इस चुनौती को स्वीकारते हुये, इससे निपटने के पुख्ता प्रबंध कर लिये हैं। लेकिन भारत में हो रहे अनुसंधान एवं उनका क्रियान्वयन बहुत ही धीमा है। देश की जीडीपी एवं विदेशी मुद्रा प्राप्ति के लिये कृषि को अहम नहीं माना जा सका है। पर्याप्त उपजाऊ भूमि होने के पश्चात भी हमारा कृषि उत्पादन विश्व के अन्य विकासशील देशों की तुलना में बहुत ही कम है। भारत में कृृषि उत्पादन को दोगुना करने की पर्याप्त संभावनाएं हैं।

देश का मंत्रालय इस समय पूरी तैयारी से देश के आम बजट बनाने में जुटा हुआ है। देश की वित्त मंत्री बजट को जनता के अनुकूल बनाने देश के आम नागरिकों से सुझाव मांग रही हैं। परंपरानुसार विषय विशेषज्ञों, उद्योगपतियों, संगठनों एवं अर्थशास्त्रियों से चर्चा एवं संवादों के माध्यम से बजट को उम्दा बनाने के प्रयास किये जा रहे हैं। आगामी बजट में एक बड़ी चुनौती प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की परिकल्पना वर्ष 2024-25 तक देश की अर्थव्यवस्था को 05 ट्रिलियन डालर बनाने हेतु प्रयासों को शामिल किया जाना भी है। लेकिन इसके पूर्व प्रधानमंत्री का लक्ष्य 2022 तक किसानों की आय दुगना करने से भी जुड़ा हुआ है। देश की दो तिहाई जनसंख्या ग्रामीण आबादी वाली है। देश की सत्तर फीसदी जनता ग्रामीण अर्थव्यवस्था एवं खेती से जुड़ी हुई है। लेकिन विकास की भरपूर सम्भावना वाले कृषि सेक्टर पर बजट में उतना स्थान कभी भी नहीं मिला है, जितने का वह असल हकदार है। कृषि को अभी तक की सरकारें सिर्फ देश की अवाम का पेट भरने तक का ही संसाधन मानती आयी है। कृषि के माध्यम से देश की जीडीपी बढ़ाने पर कभी गहन मंथन नहीं हुआ है। यही कारण है कि देश के बजट में कृषि का स्थान मात्र खाना पूर्ति वाला है। केन्द्र सरकार द्वारा उत्पादक एवं बैंकिंग सेक्टर के लडख़ड़ाने पर इन्हे संबल देने के लिए विशेष आर्थिक पैकेज समय-समय पर जारी किये जाते रहे हैं। लेकिन खेती किसानी को कर्ज से उबारने दीर्घकालीन योजना के बजाये इतनी कम राशि के राहत पैकेज जारी किये जाते है, जो सिर्फ जग हंसाई के कारण बनते हैं। जलवायु परिवर्तन से खेती में हो रहे लगातार नुकसान पर छोटी-मोटी राहत के बजाये अब उन प्रावधानों की आवश्यकता है जिसके बूते पर किसान स्वयं ही इन प्राकृतिक चुनौतियों का सामना कर सकें।

सिंचाई संसाधन चाहिए

कृषि के स्वभाव को समझकर अनुसंधान एवं सिंचाई के संसाधन विकसित करने की पहली आवश्यकता है। देश की 45 फीसदी खेती सूखी या अपर्याप्त सिंचाई वाली है। जबकि यह हिस्से सामान्य या अतिवर्षा वाले क्षेत्र में आते हैं। जहां सामान्यत: 25 से 45 इंच तक बारिश होती है। लेकिन यहां सिंचाई के साधन नहीं हंै। देश में 86 फीसदी किसान लघु या सीमांत खेती वाले हैं। इनके लिये नदियों नहरों से पानी ले पाना इनकी आर्थिक हैसियत के बाहर है। क्योंकि लम्बी दूरी के लिये पानी ले जाने के लिए पाइप एवं पम्प की व्यवस्था एवं रखरखाव इन की सीमित खेती एवं सीमित आय से बहुत अधिक महंगा है। इनके लिये आवश्यक है कि खेतों में वर्षा जल संचय वाले जल स्त्रोत खेत तालाब विकसित किये जायें। पूर्व में भी केन्द्र एवं राज्य सरकारें खेत तालाब योजनाएं लेकर आई हैं। लेकिन इस योजना में प्रति किसान अनुदान इतना कम था कि वह सतही मिट्टी हटाने के लिये भी पर्याप्त नहीं था। सरकार को अब खानापूर्ति के बजाये, योजनाओं को क्रियान्वयन के धरातल पर लाना होगा। कुएं एवं नलकूपों वाली खेती भी गिरते जलस्तर के कारण अत्याधिक महंगी होने के साथ अपर्याप्त सिंचाई में तब्दील हो रही है। इन संसाधनों को अब वर्षा जल से रिचार्ज करने की पहली आवश्यकता है। इसलिये वर्षा जल के संचयन एवं वर्षा जल से ही खेती, इस नीति को पूरे देश में एक साथ खुले दिल से लागू करने की आवश्यकता है। इस दिशा में केन्द्र सरकार ने अटल भू-जल मिशन की शुरुआत तो की है। लेकिन यह योजना पायलट प्रोजेक्ट के रुप में देश के सीमित जिलों के लिये ही है। इसके अतिरिक्त सरकार को सिंचाई के पानी के अपव्यय रोकने के लिये स्प्रिंकलर एवं ड्रिप इरिगेशन को बढ़ावा देने बजट में प्रावधान करना होगा। चूंकि यह आदान महंगे होने के कारण एवं खेतों में बिजली की सीमित उपब्धता के कारण किसान, खुली सिंचाई यानि खेतों में बहाकर पानी देने वाली पद्धति अपनाता है। जो कि पानी के अपव्यय के साथ पर्याप्त उत्पादन के अनुकूल परिणाम भी नहीं देती है। सिंचाई एवं किसान से जुड़े आदानों की कीमत कम करने के लिये आवश्यक है कि केन्द्र सरकार इन कृषि आदानों से जीएसटी पूर्णता समाप्त करे या 5 फीसदी की दर लागू करे। 18 एवं 12 फीसदी की जीएसटी दरों के कारण किसान गुणवत्ता पूर्ण उत्पाद खरीदने से बचता है लेकिन इसका दुष्परिणाम कम उत्पादन के साथ बिजली जैसी सरकारी संपत्ति की अत्याधिक हानि के रुप में भी दिखाई देता है। जिसे राज्य सरकारें अनुदान मूल्य पर किसानों को उपलब्ध कराती है।

हायटेक तकनीक से जोड़ें

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केन्द्र सरकार का संकल्प 2022 तक देश के किसानों की आय दुगनी करने से है। 2020 में प्रवेश के साथ सरकार को संकल्प पूर्ण करने के लिये मात्र दो वर्ष का ही समय शेष है। कृषि के क्षेत्र में वर्तमान वृद्धि दर मात्र 04 फीसदी ही है। नाबार्ड की एक अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2016-17 में देश के किसानों की मासिक आय मात्र 8931 रुपये मात्र रही है। जो कि 2012-13 की वार्षिक आय 6426 रुपये से चार वर्ष के अंतराल में मात्र रुपये 2505 की वृद्धि दर्शाती है। इस गणना से 2022 तक किसान की मासिक आय लगभग 12000 मासिक होगी, जो कि सरकार के संकल्प से बहुत दूर रहेगी। लेकिन खेती को लाभ का धंधा बनाने के लिये सरकार को बढ़ती महंगाई दर पर खेती के खर्चो एवं उसमें लगने वाली मानव मजदूरी से आमदनी की गणना करनी होगी। सरकार के संकल्प एवं प्रधानमंत्री की 2025 तक देश की अर्थव्यवस्था को ट्रिलियन डालर बनाने के लिये कृषि एक बड़ी चुनौती होने के साथ अर्थवयवस्था को मजबूत बनाने की पर्याप्त संभावना भी दर्शाती है। वैसे भी किसी राज व्यवस्था में अन्नदाता के आत्महत्या जैसे कदम देश एवं सरकारों के लिये कलंकित करने वाले होते हैं। इसलिये देश के आगामी आम बजट में खेती एवं किसान को हाइटेक तकनीक से जोड़कर अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने की आवश्यकता है।

कृषि की लागत कम करने एवं सह उत्पादकता के लिये पशु पालन, दुग्ध उत्पादन के साथ फलों की खेती को प्रोत्साहित करने का प्रावधान बजट में लाना होगा। गाय के गोबर से प्राकृतिक खाद एवं खेतों के किनारे से फलदार वृक्ष की खेती में सरकार का प्रोत्साहन किसानों को अतिरिक्त आय उपलब्ध कराने का साधान हो सकता है। जो ग्रमाीण आबादी को गांव में ही रोजगार के साथ ग्रामीणों के शहर की ओर पलायन को भी रोक सकने में कारगर होगा। सहवर्ती खेती के लिये किसानों को सस्ती ब्याज दरों पर बैंक ऋण उपलब्ध कराने की आवश्यकता है। किसानों को अब परंपरागत बीज की जगह ऐसी अनुसंधानित बीज उपलब्ध कराने की आवश्यकता है जो जलवायु परिवर्तन की चुनौती का मुकाबला कर सके। अतिवृष्टि एवं सूखे की मार झेल सकने वाले बीजों को विकासशील देश अपनी जलवायु अनुसार विकसित कर चुके है। लेकिन भारत में हो रहे शोध की रफ्तार पर्याप्त संसाधन उपलब्ध न होने एवं धनाभाव की वजह से बहुत धीमी है। देश में कृषि अनुसंधान को सरकार को देश के अंतरिक्ष अनुसंधान के समान अहम मानकर धन उपलब्ध करना होगा।

  • विनोद के. शाह, मो.: 9425640778

आयात – निर्यात नीति

indian_economyकृषि प्रधान देश में केन्द्र सरकार की आयात-निर्यात नीति भी किसान को उसके उत्पाद मूल्य दिलाने में नुकसानदायक सिद्ध हो रही है। देश में उत्पादन के सटीक आकड़ों के अध्ययन के बिना देश का खाद्य मंत्रालय आयात फैसला कर लेता है। जिस के कारण किसानों की फसल का सरकारी सर्मथन मूल्य भी मंडियों में हासिल नहीं हो पाता है। कृषि से जुड़े उत्पादों के आयात-निर्यात के निर्णयों में खाद्य मंत्रालय के साथ कृषि मंत्रालय को भी बराबर की सहभगिता मिलनी चहिये। बगैर कृषि मंत्रालय की सहमति के बिना कृषि से जुड़े उत्पादों का आयात-निर्यात के सौदे न हो सके ऐसी नीति बनाने की अब सरकार को आवश्यकता है।

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