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राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

शक्कर की मिठास पर महंगाई की कड़वाहट

लेखक: मधुकर पवार

22 अगस्त 2026, नई दिल्ली: शक्कर की मिठास पर महंगाई की कड़वाहट – पिछले कुछ दिनों में शक्कर की कीमतों में तेज उछाल ने त्योहारी मौसम में आम उपभोक्ता की चिंता बढ़ा दी है। चाय, मिठाई, बिस्किट और अनेक खाद्य पदार्थों में इस्तेमाल होने वाली शक्कर के दाम बढ़ने से घरेलू बजट पर अतिरिक्त बोझ पड़ना तय है। कुछ शहरों में खुदरा कीमतें 65-67 रुपये किलो तक पहुंचने की खबरें हैं।

कीमतों पर अंकुश और घरेलू उपलब्धता बढ़ाने के लिए सरकार ने 1 अगस्त से 30 नवंबर 2026 तक शक्कर कारोबारियों पर स्टॉक सीमा लागू की है। इसका उद्देश्य जमाखोरी और सट्टेबाजी रोकना तथा बाजार में नियमित आपूर्ति बनाए रखना है। साथ ही, करीब एक दशक बाद सरकार ने 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची शक्कर के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। त्योहारी मौसम में यह अतिरिक्त आपूर्ति कीमतों पर तत्काल दबाव कम कर सकती है।

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लेकिन मौजूदा संकट ने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया है—क्या पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण की E20 नीति ने शक्कर की उपलब्धता को प्रभावित किया है?

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कांग्रेस ने इस मुद्दे पर सरकार की E20 नीति को घेरा है। उनका दावा है कि शक्कर बनाने में इस्तेमाल होने योग्य करीब 25 लाख टन गन्ना एथेनॉल उत्पादन में चला गया, जिससे शक्कर की उपलब्धता प्रभावित हुई और कीमतें बढ़ीं। उन्होंने पिछले तीन महीनों में शक्कर के दाम 48 से बढ़कर 67 रुपये किलो तथा गुड़ के दाम 50 से 65 रुपये किलो होने का हवाला देते हुए चावल, मक्के के आटे और पशु आहार की कीमतों में वृद्धि का भी उल्लेख किया है। कांग्रेस ने E20 नीति की तत्काल समीक्षा और उपभोक्ताओं के लिए बिना एथेनॉल वाला पेट्रोल उपलब्ध कराने की मांग की है।

सरकार का कहना है कि मौजूदा शक्कर महंगाई के लिए केवल एथेनॉल को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है। कम उत्पादन, प्रतिकूल मौसम, त्योहारी मांग, वैश्विक बाजार और जमाखोरी जैसे कई कारण इसके पीछे हैं। सरकार के अनुसार एथेनॉल के लिए इस्तेमाल होने वाले गन्ने का हिस्सा 2022-23 के करीब 12 प्रतिशत से घटकर 2025-26 में लगभग 9 प्रतिशत रह गया है। वहीं एथेनॉल का करीब तीन-चौथाई उत्पादन अब अनाज, विशेषकर मक्का से हो रहा है। यह तर्क बताता है कि मौजूदा महंगाई को केवल गन्ने से एथेनॉल उत्पादन से जोड़ना पूरी तस्वीर नहीं है।

फिर भी सरकार से यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि जब शक्कर की उपलब्धता और उत्पादन में कमी का अंदेशा था, तब प्रभावी कदम पहले क्यों नहीं उठाए गए? समय पर बाजार की निगरानी और आपूर्ति प्रबंधन न होने से जमाखोरी और सट्टेबाजी को बढ़ावा मिलने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

सरकार ने चालू मौसम में शक्कर उत्पादन का अनुमान पहले के करीब 343 लाख मीट्रिक टन से घटाकर लगभग 306 लाख मीट्रिक टन किया है। हालांकि उसका कहना है कि घरेलू खपत के लिए पर्याप्त शक्कर उपलब्ध है और अक्टूबर में नया पेराई सत्र शुरू होने तक बाजार की जरूरत पूरी की जा सकती है। प्रतिकूल मौसम से गन्ने का उत्पादन प्रभावित होना और त्योहारी मौसम में मिठाई, बेकरी तथा खाद्य प्रसंस्करण उद्योग की मांग बढ़ना बाजार पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है।

भारत दुनिया के प्रमुख शक्कर उत्पादक और सबसे बड़े उपभोक्ता देशों में है। सामान्यतः घरेलू उत्पादन जरूरत से अधिक रहता है, लेकिन इस बार उत्पादन और उपलब्ध स्टॉक को लेकर चिंता बढ़ी है। ऐसे में आयात और स्टॉक सीमा तत्काल राहत दे सकते हैं, लेकिन इन्हें स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता।

दरअसल, इस विवाद को केवल सरकार बनाम विपक्ष के आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित करना उचित नहीं होगा। एथेनॉल नीति का एक पक्ष ऊर्जा सुरक्षा, पेट्रोलियम आयात में कमी और किसानों के लिए अतिरिक्त बाजार से जुड़ा है, तो दूसरा पक्ष खाद्य सुरक्षा और उपभोक्ता हित से। अधिक शक्कर उत्पादन वाले वर्षों में एथेनॉल की ओर अतिरिक्त शक्कर मोड़ने से मिलों पर स्टॉक का दबाव घटता है और किसानों के गन्ना भुगतान में मदद मिल सकती है। लेकिन शक्कर की कमी के समय यही संतुलन चुनौती बन सकता है।इसलिए सवाल एथेनॉल बनाम शक्कर का नहीं, बल्कि दोनों के बीच सही संतुलन का है।

सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसानों को उचित गन्ना मूल्य मिले, चीनी मिलें आर्थिक रूप से सक्षम रहें, एथेनॉल कार्यक्रम ऊर्जा सुरक्षा में योगदान देता रहे और उपभोक्ताओं को उचित कीमत पर शक्कर उपलब्ध हो। साथ ही, खाद्य सुरक्षा पर किसी तरह का दबाव न पड़े।

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