राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

श्रीलंका का ऑर्गेनिक खेती प्रयोग: रासायनिक उर्वरक पर प्रतिबंध ने कैसे पैदा किया कृषि और आर्थिक संकट

05 मार्च 2026, नई दिल्ली: श्रीलंका का ऑर्गेनिक खेती प्रयोग: रासायनिक उर्वरक पर प्रतिबंध ने कैसे पैदा किया कृषि और आर्थिक संकट – अप्रैल 2021 में श्रीलंका ने आधुनिक कृषि इतिहास के सबसे बड़े नीति प्रयोगों में से एक की शुरुआत की। सरकार ने अचानक रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया और देश को पूरी तरह ऑर्गेनिक खेती की ओर ले जाने की घोषणा की। सरकार का उद्देश्य श्रीलंका को दुनिया का पहला ऐसा देश बनाना था जहां 100 प्रतिशत जैविक खेती की जाए। लेकिन इस निर्णय के बाद कुछ ही महीनों में फसल उत्पादन में गिरावट, किसानों के विरोध, खाद्य संकट और गहरे आर्थिक संकट जैसी स्थितियां पैदा हो गईं, जिसने देश की राजनीति और कृषि नीति दोनों को बदल दिया।

यह घटना आज वैश्विक कृषि नीति में एक उदाहरण के रूप में देखी जाती है कि कृषि प्रणाली में अचानक किए गए बड़े बदलाव खाद्य सुरक्षा, व्यापार और राष्ट्रीय स्थिरता को किस प्रकार प्रभावित कर सकते हैं। श्रीलंका का यह प्रयोग एक पर्यावरणीय पहल के रूप में शुरू हुआ था, लेकिन कुछ ही समय में यह राष्ट्रीय कृषि संकट में बदल गया।

प्रतिबंध से पहले श्रीलंका की कृषि व्यवस्था

रासायनिक उर्वरक पर प्रतिबंध से पहले श्रीलंका की कृषि व्यवस्था विविध फसलों पर आधारित थी। देश में मुख्य रूप से धान की खेती होती है, जबकि चाय, रबर और नारियल प्रमुख व्यावसायिक फसलें हैं। कृषि क्षेत्र देश की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण रोजगार का महत्वपूर्ण आधार है। टाइम मैगजीन की रिपोर्ट के अनुसार, श्रीलंका में दो मिलियन से अधिक किसान सीधे कृषि से जुड़े हुए हैं।

विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार श्रीलंका में लगभग 2.8 से 2.9 मिलियन हेक्टेयर कृषि भूमि है। देश का कुल भौगोलिक क्षेत्र लगभग 6.55 मिलियन हेक्टेयर है, जिसका एक बड़ा हिस्सा खेती के लिए उपयोग किया जाता है। विश्व बैंक के डाटा के अनुसार लगभग 30,000 वर्ग किलोमीटर (करीब 3 मिलियन हेक्टेयर) क्षेत्र कृषि भूमि के रूप में वर्गीकृत है।

इसमें से लगभग 1.37 मिलियन हेक्टेयर भूमि को अरबल लैंड यानी ऐसी भूमि माना जाता है जिस पर नियमित रूप से खेती की जा सकती है। वहीं कुल क्रॉपलैंड लगभग 2.3 मिलियन हेक्टेयर है।

श्रीलंका की कृषि व्यवस्था में खाद्यान्न और बागान दोनों प्रकार की खेती महत्वपूर्ण हैं। देश में धान मुख्य खाद्यान्न फसल है और यह देश की खाद्य सुरक्षा की आधारशिला है। श्रीलंका के कृषि विभाग के अनुसार, धान की खेती महा और याला दोनों मौसमों को मिलाकर सालाना लगभग 1.3 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में होती है। केवल धान के खेतों का स्थायी क्षेत्र लगभग 780,000 हेक्टेयर माना जाता है।

दूसरी ओर, बागान फसलें जैसे चाय, रबर और नारियल मिलाकर लगभग 772,000 हेक्टेयर क्षेत्र में उगाई जाती हैं। इनमें चाय देश की सबसे महत्वपूर्ण निर्यात फसल है और विदेशी मुद्रा कमाने का प्रमुख स्रोत भी है।

श्रीलंका में खेती मुख्य रूप से दो मौसमों में होती है। पहला महा सीजन है, जो सितंबर से मार्च तक चलता है और इसे मुख्य उत्पादन सीजन माना जाता है। दूसरा याला सीजन है, जो मई से अगस्त तक चलता है।

कई दशकों तक श्रीलंका की कृषि उत्पादकता रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर रही। सरकार किसानों को सब्सिडी के साथ उर्वरक उपलब्ध कराती थी ताकि उत्पादन स्थिर बना रहे और देश खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बना रह सके।

ऑर्गेनिक खेती की घोषणा और नीति निर्णय

श्रीलंका में रासायनिक उर्वरकों पर प्रतिबंध का निर्णय राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे के नेतृत्व में लिया गया। 2019 में राष्ट्रपति बनने के दौरान उन्होंने अपने चुनावी अभियान में देश को धीरे-धीरे ऑर्गेनिक खेती की ओर ले जाने की बात कही थी। उस समय यह योजना लगभग दस वर्षों में लागू करने की बात कही गई थी।

लेकिन 2021 में इस योजना को अचानक लागू कर दिया गया।

27 अप्रैल 2021 को श्रीलंका सरकार ने रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और खरपतवारनाशकों के आयात पर पूर्ण प्रतिबंध की घोषणा की। यह निर्णय 6 मई 2021 से लागू कर दिया गया। इसके साथ ही पूरे देश की कृषि व्यवस्था को लगभग तुरंत जैविक खेती की ओर मोड़ दिया गया।

सरकार ने इस निर्णय के पीछे कई कारण बताए। पहला कारण पर्यावरण और मिट्टी की सेहत को बेहतर बनाना था। दूसरा कारण किसानों के स्वास्थ्य की रक्षा बताया गया। सरकार ने यह भी कहा कि रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से किसानों में किडनी रोग बढ़ रहे हैं, हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन और कई वैज्ञानिक अध्ययनों में इस दावे का स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला।

तीसरा और महत्वपूर्ण कारण आर्थिक था। उस समय श्रीलंका गंभीर विदेशी मुद्रा संकट से जूझ रहा था और उर्वरकों का आयात देश के लिए महंगा पड़ रहा था। सरकार का मानना था कि उर्वरक आयात बंद करने से विदेशी मुद्रा की बचत होगी।

सरकार ने ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा देने के लिए कई टास्क फोर्स और योजनाएं भी बनाईं, लेकिन कृषि वैज्ञानिकों और किसान संगठनों ने चेतावनी दी कि बिना तैयारी के अचानक किया गया बदलाव खाद्य उत्पादन को प्रभावित कर सकता है।

उर्वरक की कमी और किसानों की मुश्किलें

नीति लागू होने के कुछ ही महीनों में इसके प्रभाव दिखाई देने लगे।

श्रीलंका में जैविक उर्वरकों का उत्पादन इतनी बड़ी मात्रा में नहीं हो पा रहा था कि वह रासायनिक उर्वरकों की जगह ले सके। कई कृषि अध्ययनों के अनुसार देश के पास इतनी जैविक सामग्री उपलब्ध नहीं थी कि पूरे कृषि क्षेत्र की पोषक तत्वों की आवश्यकता पूरी की जा सके।

किसानों को खेतों के लिए आवश्यक पोषक तत्व नहीं मिल पा रहे थे। अधिकांश किसानों को जैविक खेती की तकनीकों का अनुभव भी नहीं था।

कृषि विशेषज्ञों ने पहले ही अनुमान लगाया था कि उर्वरकों की अचानक कमी से फसल उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है। अमेरिकी कृषि विभाग के एक आकलन के अनुसार, इस स्थिति में धान की उत्पादकता लगभग 33 प्रतिशत और चाय की उत्पादकता लगभग 35 प्रतिशत तक गिर सकती थी।

कुछ ही समय में यह अनुमान सही साबित होने लगे।

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) के हवाले से प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, उर्वरक प्रतिबंध के बाद श्रीलंका में खाद्यान्न उत्पादन 40 से 50 प्रतिशत तक घट गया।

धान उत्पादन में तेज गिरावट आई। कई रिपोर्टों के अनुसार 2021-22 के मुख्य उत्पादन सीजन में धान उत्पादन लगभग 40 प्रतिशत तक कम हो गया। परिणामस्वरूप श्रीलंका को कई वर्षों बाद बड़े पैमाने पर चावल आयात करना पड़ा।

चाय उत्पादन में गिरावट से देश की निर्यात आय भी प्रभावित हुई, क्योंकि चाय श्रीलंका की सबसे महत्वपूर्ण निर्यात फसल है।

जैसे-जैसे फसल उत्पादन घटता गया, देशभर में किसानों का विरोध बढ़ने लगा। कई किसान संगठनों ने कहा कि उर्वरकों की कमी से उनकी आय और आजीविका दोनों खतरे में पड़ गई हैं।

कृषि संकट से राष्ट्रीय आर्थिक संकट तक

कृषि संकट जल्द ही राष्ट्रीय आर्थिक संकट में बदल गया।

फसल उत्पादन में गिरावट के कारण देश को अधिक खाद्यान्न आयात करना पड़ा, जबकि उसी समय श्रीलंका विदेशी मुद्रा की गंभीर कमी से जूझ रहा था। दूसरी ओर चाय उत्पादन घटने से निर्यात आय भी कम हो गई।

खाद्य पदार्थों की कीमतें तेजी से बढ़ने लगीं और आवश्यक वस्तुओं की कमी बढ़ती गई। देश में ईंधन, दवाइयों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की भी कमी होने लगी।

इन परिस्थितियों में जनता का आक्रोश बढ़ता गया और देशभर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। किसानों, छात्रों और विभिन्न संगठनों ने सरकार की नीतियों के खिलाफ आंदोलन किए।

जुलाई 2022 में व्यापक जनआंदोलन के बीच राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे देश छोड़कर चले गए और बाद में उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। यह घटना श्रीलंका के आधुनिक इतिहास के सबसे बड़े राजनीतिक संकटों में से एक मानी जाती है।

नीति में बदलाव और धीरे-धीरे सुधार

जैसे-जैसे कृषि नुकसान बढ़ता गया, सरकार को अपनी नीति बदलनी पड़ी।

नवंबर 2021 में सरकार ने कई प्रमुख फसलों के लिए रासायनिक उर्वरकों के आयात पर प्रतिबंध हटा दिया। इसके बाद धीरे-धीरे उर्वरकों की आपूर्ति फिर से शुरू की गई।

सरकार ने किसानों के लिए बड़ी मात्रा में यूरिया और अन्य उर्वरकों का आयात भी किया ताकि उत्पादन को स्थिर किया जा सके।

हालांकि उत्पादन तुरंत सामान्य नहीं हुआ। कई किसानों को लगातार नुकसान झेलना पड़ा और उन्हें बढ़ती लागत का सामना करना पड़ा।

2025 में प्रकाशित एक रॉयटर्स रिपोर्ट के अनुसार, कई धान किसान अभी भी इस संकट के बाद अपनी खेती को पूरी तरह पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं।

धीरे-धीरे उत्पादन में सुधार शुरू हुआ, लेकिन कृषि क्षेत्र को स्थिर होने में कई साल लग गए।

इस प्रयोग से मिली सीख

श्रीलंका का यह प्रयोग वैश्विक कृषि नीति में एक महत्वपूर्ण अध्ययन के रूप में देखा जाता है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि संकट का कारण ऑर्गेनिक खेती नहीं बल्कि उसे अचानक लागू करना था।

कृषि प्रणाली में बड़े बदलाव के लिए वैज्ञानिक तैयारी, किसानों का प्रशिक्षण और चरणबद्ध नीति लागू करना आवश्यक होता है।

श्रीलंका का अनुभव यह भी दिखाता है कि कृषि, अर्थव्यवस्था और राजनीति एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। कृषि नीति में अचानक बदलाव पूरे देश की आर्थिक और सामाजिक स्थिरता को प्रभावित कर सकते हैं।

आज श्रीलंका अपनी कृषि प्रणाली को फिर से मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है और साथ ही टिकाऊ खेती के तरीकों पर भी चर्चा जारी है।

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