राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

भारत अपनी खाद्य तेल जरूरतों का 60% आयात करता है, वैश्विक तनाव से व्यापार प्रवाह बदला

27 अप्रैल 2026, नई दिल्ली: भारत अपनी खाद्य तेल जरूरतों का 60% आयात करता है, वैश्विक तनाव से व्यापार प्रवाह बदला –  भारत का खाद्य तेल क्षेत्र एक महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है, जहां जलवायु अस्थिरता, भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा बाजारों की हलचल एक साथ असर डाल रही है। इसके चलते खाद्य तेल आयात अब केवल कीमत आधारित खरीद से हटकर उपलब्धता और आपूर्ति आधारित सोर्सिंग की ओर बढ़ रहा है। यह बात इंडियन वेजिटेबल ऑयल प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (आईवीपीए) की उपाध्यक्ष भावना शाह ने कही।

इंडियन वेजिटेबल ऑयल प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन के कार्यक्रम 24th International Conference BLACK SEA GRAIN.KYIV-2026 में बोलते हुए उन्होंने कहा कि वर्ष 2026-27 में तीन प्रमुख कारक बाजार को प्रभावित करेंगे—कमजोर मानसून, ऊंचे कच्चे तेल के दाम और वैश्विक स्तर पर जैव ईंधन की मजबूत मांग। इन कारणों से खाद्य तेल की उपलब्धता पर दबाव बन सकता है। हालांकि, उन्होंने कहा कि मजबूत सप्लाई चेन, समय पर आयात और जरूरत पड़ने पर नीतिगत हस्तक्षेप से भारत की स्थिति स्थिर रह सकती है।

भावना शाह ने कहा कि कमजोर मानसून, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, उर्वरक की कमी, गैस आधारित उत्पादन पर दबाव और जैव ईंधन नीतियों के कारण पाम तेल की वैश्विक आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इससे खाद्य तेल महंगाई में हल्की बढ़ोतरी संभव है। फिर भी भारत की बड़ी खरीद क्षमता बाजार को कुछ राहत दे सकती है।

उन्होंने कहा कि दुनिया के किसी भी हिस्से में यदि खाद्य तेल का अतिरिक्त स्टॉक उपलब्ध होता है, तो भारत एक प्रमुख खरीदार के रूप में सामने आता है। यही कारण है कि भारत को वैश्विक अधिशेष को समाहित करने वाला बड़ा बाजार माना जाता है।

उन्होंने यह भी कहा कि खाद्य तेल बाजार को केवल मांग और आपूर्ति के नजरिए से नहीं देखना चाहिए, बल्कि इसे भोजन, पशु आहार और ईंधन—इन तीनों के संदर्भ में समझना जरूरी है। जैव ईंधन की बढ़ती मांग के कारण अब खाद्य तेल केवल खाद्य वस्तु नहीं रह गया है। ईंधन कीमतों में तेजी आने पर वैश्विक खाद्य तेल कीमतों पर भी सीधा असर पड़ता है।

उनके अनुसार अब नीति निर्माण और बाजार आकलन में खाद्य सुरक्षा, पशु आहार की जरूरत और ईंधन मांग—तीनों को साथ लेकर चलना होगा, क्योंकि इनकी परस्पर निर्भरता ही अब कीमतों और व्यापार प्रवाह को प्रभावित कर रही है।

भारत का खाद्य तेल आयात लंबे समय से 15 से 17 मिलियन टन के दायरे में बना हुआ है। मार्च 2026 में आयात 11 प्रतिशत बढ़कर 1.19 मिलियन टन रहा, जबकि ऊंची कीमतों के कारण दो महीने का औसत 12 प्रतिशत घट गया।

वित्त वर्ष 2025-26 के ऑयल ईयर में खाद्य तेल आयात 16.5 मिलियन टन रहने का अनुमान है, जबकि घरेलू उत्पादन 9.6 मिलियन टन रहने की संभावना है।

आयात संरचना पर उन्होंने कहा कि सूरजमुखी तेल की मांग मजबूत बनी रह सकती है। वहीं Argentina में आपूर्ति बाधाओं के कारण सोयाबीन तेल की शिपमेंट में देरी संभव है। दूसरी ओर अनुकूल मूल्य अंतर के कारण पाम तेल की खेप मजबूत बनी हुई है।

उन्होंने कहा कि फिलहाल लागत के लिहाज से पाम तेल को बढ़त हासिल है, इसलिए आयात टोकरी में इसका हिस्सा अधिक रह सकता है। हालांकि अप्रैल 2026 के बाद भारत के बाजार में पाम तेल और सोयाबीन तेल के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है, जिसमें China से आने वाला सोयाबीन तेल भी अहम भूमिका निभा सकता है।

भारत अपनी कुल खाद्य तेल खपत का लगभग 60 प्रतिशत आयात करता है, जिससे वह दुनिया के सबसे बड़े खाद्य तेल आयातकों में शामिल है। भावना शाह ने कहा कि घरेलू उत्पादन से अधिक खपत होने के बावजूद भारत वैश्विक मांग का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रवाह को प्रभावित करता है।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय पाम ऑयल मिशन, राष्ट्रीय तिलहन मिशन, एमएसपी वृद्धि और आत्मनिर्भरता अभियान जैसे प्रयासों के बावजूद मध्यम अवधि में बाजार में तंगी बनी रह सकती है।

सरकार पाम ऑयल और तिलहन मिशनों के माध्यम से उत्पादन बढ़ाने और विविधता लाने की दिशा में काम कर रही है। इन पहलों के तहत कुल 2.5 अरब डॉलर के निवेश का लक्ष्य रखा गया है।

उन्होंने कहा कि आगे आयात के रुझान और कीमतों की दिशा काफी हद तक नीतिगत फैसलों पर निर्भर करेगी। साथ ही भारत सरकार ने वैश्विक व्यवधानों के बीच नीतियों में समयानुकूल बदलाव, आपूर्ति सुनिश्चित करने, महंगाई नियंत्रित रखने और बाजार स्थिरता बनाए रखने के लिए निर्णायक कदम उठाए हैं।

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