गन्ना किसानों के लिए खुशखबरी: रेड रॉट रोधी 7 किस्मों को मिली मंजूरी, किसानों को मिलेगा दोगुना फायदा
20 फरवरी 2026, नई दिल्ली: गन्ना किसानों के लिए खुशखबरी: रेड रॉट रोधी 7 किस्मों को मिली मंजूरी, किसानों को मिलेगा दोगुना फायदा – इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च (ICAR) और लखनऊ स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ शुगर केन रिसर्च की संयुक्त पहल से गन्ना किसानों के लिए बड़ी राहत आई है। 9 फरवरी 2026 को जारी सरकारी आदेश के तहत गन्ने की 7 नई और उन्नत किस्मों को मंजूरी दी गई है। इन किस्मों पर सेंट्रल वैरायटी रिलीज कमेटी (CVRC) की आधिकारिक मुहर लग चुकी है, जिससे अब इन्हें बड़े पैमाने पर खेती के लिए सुरक्षित और भरोसेमंद माना जा रहा है।
लाल सड़न से मिलेगी राहत
उत्तर प्रदेश में गन्ने की पुरानी किस्में पिछले कुछ वर्षों से ‘लाल सड़न’ (रेड रॉट) जैसी गंभीर बीमारी की चपेट में आ रही थीं। इस रोग को गन्ने का कैंसर भी कहा जाता है, क्योंकि यह पूरी फसल को भीतर से खराब कर देता है।
नई विकसित किस्मों को कई वर्षों तक विभिन्न जलवायु परिस्थितियों में परखा गया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि ये किस्में लाल सड़न के प्रति अधिक सहनशील हैं, जिससे किसानों को दवाइयों और कीटनाशकों पर होने वाला अतिरिक्त खर्च काफी कम होगा।
अगेती और मध्यम किस्में, दोनों विकल्प उपलब्ध
वैज्ञानिकों ने किसानों की जरूरत को ध्यान में रखते हुए इन किस्मों को दो श्रेणियों में बांटा है—
अगेती किस्में:
CoS 17231 (बिस्मिल) और CoP 16437 (राजेंद्र गन्ना-1) जैसी किस्में जल्दी पकने वाली हैं। इनसे चीनी मिलों को समय पर आपूर्ति संभव होगी और किसानों को खेत जल्दी खाली मिल जाएगा, जिससे वे गेहूं या दूसरी फसल की बुवाई समय पर कर सकेंगे।
मध्यम एवं देर से पकने वाली किस्में:
Co 17018 (करण-17), CoS 16233 (रोशन) और CoPb 18213 जैसी किस्में अधिक वजन और मोटाई के लिए जानी जाती हैं। ये खेत में अधिक समय तक खड़े रहकर मजबूत होती हैं और अंत में भारी उपज देती हैं।
ज्यादा चीनी रिकवरी और भारी उत्पादन
नई किस्मों की खासियत सिर्फ रोग प्रतिरोधक क्षमता नहीं है, बल्कि इनमें चीनी की रिकवरी भी बेहतर बताई गई है। कुछ किस्मों में उच्च शर्करा प्रतिशत दर्ज किया गया है, जिससे चीनी मिलों को फायदा होगा और किसानों के भुगतान की प्रक्रिया भी तेज हो सकती है।
अगर किसान इन किस्मों की बुवाई आधुनिक ट्रेंच विधि से करें और संतुलित सिंचाई व उर्वरक प्रबंधन अपनाएं, तो प्रति एकड़ 500 से 600 क्विंटल तक उत्पादन संभव है।
क्षेत्र के अनुसार बीज चयन जरूरी
उत्तर प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों की मिट्टी और जलवायु अलग है। पश्चिमी और मध्य यूपी के लिए कुछ किस्में अधिक उपयुक्त मानी गई हैं, जबकि पूर्वी यूपी के लिए अलग सिफारिश की गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि किसान अपने क्षेत्र के कृषि वैज्ञानिकों से सलाह लेकर ही बीज का चयन करें, ताकि अधिकतम उत्पादन मिल सके।
लागत घटेगी, मुनाफा बढ़ेगा
नई किस्मों के आने से किसानों की दोहरी समस्या का समाधान संभव है। पहला बीमारी से सुरक्षा और दूसरा ज्यादा उत्पादन और बेहतर चीनी रिकवरी मिलेगी। साथ ही, कम दवा खर्च और अधिक उपज के कारण किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। राज्य स्तर पर इन बीजों को जल्द ही सरकारी केंद्रों के माध्यम से उपलब्ध कराने की प्रक्रिया शुरू की जा रही है।
गन्ना किसानों के लिए यह पहल नई उम्मीद लेकर आई है। सही जानकारी और वैज्ञानिक सलाह के साथ अगर इन किस्मों को अपनाया जाए, तो आने वाले सीजन में उत्पादन और आमदनी दोनों में सुधार देखने को मिल सकता है।
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