सब्जियों के प्रमुख रोग व कीट नियंत्रण

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भूपेन्द्र ठाकरे (विषय वस्तु विशेषज्ञ – पादप रोग विज्ञान), डॉ. व्ही. के. पराड़कर ( प्रमुख वैज्ञानिक, सहसंचालक अनुसंधान), डॉ. सी.एल. गौर (विषय वस्तु विशेषज्ञ – कृषि विस्तार), आंचलिक कृषि अनुसंधान केन्द्र, छिन्दवाड़ा, जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्व विद्यालय, जबलपुर
18 जनवरी 2021, भोपाल, सब्जियों के प्रमुख रोग व कीट नियंत्रण

गोभीवर्गीय
सर्दी के मौसम में उगाई जाने वाली सब्जियों में गोभीवर्गीय सब्जियों का प्रमुख स्थान है। भारत वर्ष में विश्व की सर्वाधिक गोर्भीवर्गीय सब्जियों का उत्पादन किया जाता है। इनमें प्रमुख रूप् से फूल गोभी, पत्ता गोभी, व गांठ गोभी है। गोभी में मुख्यतया प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फास्फोरस और एस्कोरबिक एसिड पाये जाते है। गोभी का उपयोग सब्जियों, सलाद अचार, सूप आदि के रूप में किया जात है। गोभी के उत्पादन व गुणवता में कमी के मुख्य कारणों में इसमें लगने वाले विभिन्न कीट प्रमुखता से है।

कीट नियंत्रण:-
चितकबरा- पौधों की छोटी अवस्था में कीट में शिशु व प्रौढ़ दोनों ही मुलायम पत्तियों तथा तनों से रस चूसते है। पत्तियां पीली होने लगती है तथा पौधों की बढ़वार रूक जाती है।
नियंत्रण- फसल में 5 प्रतिशत मैलाथियान डस्ट या 10 प्रतिशत कार्बोरिल डस्ट की 25 किलोग्राम की दर से पौधों के ऊपर भुरकाव करें या डाइमेथोएट 30 ईसी 1लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़कें।
गोभी की तितली- मैलाथियान 50 ई.सी 0.2 प्रतिशत का 10-15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।
माहू या चेंपा – इस कीट के शिशु व प्रौढ़ दोनों ही फसल को हानि पहुंचाते है। ये कीट पौधों की जड़ों को छोड़कर शेष सभी भागों का रस चूसते है। तथा पौधों पर स्थाई रूप से समूह में चिपके रहते हंै। इनके प्रकोप से पौधों की बढ़वार रूक जाती है । पौधे पीले पड़कर सूखने लगते है।
नियंत्रण- मैलाथियान 5 प्रतिशत डस्ट अथवा कार्बोरिल 10 प्रतिशत डस्ट 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से भुरकाव करें। मैलाथियान 50 ई.सी. 0.2 प्रतिशत के घोल का छिड़काव करें।

हीरक तितली – इस कीट की सूंडी शीर्ष पत्तियों को खाकर नुकसान पहुंचाती है। छोटे फूलों पर भी यह आक्रमण कर इन्हें खाती है।
नियंत्रण- 0.2 प्रतिशत मैलाथियान 50 ई.सी. प्रति लीटर पानी में 10-15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।

तंबाकू की सूंडी- इस कीट की सूंडी पत्त्यिां खाकर उनमें गोल छेद बना देती है। यह गोभी के फूल को भी अंदर की ओर खाकर नुकसान पहुंचाती है।
नियंत्रण- मेलाथियान 0.2 प्रतिशत का छिड़काव 10-15 दिन के अंतर पर करें।
गोभी का कटुआ- यह कीट नर्सरी में अथवा पौध रोपाई के तुरंत बाद पौधों को काटकर नुकसान पहुंचाता है।
नियंत्रण- मिथाईल पैराथियान 2 प्रतिशत डस्ट 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर का भुरकाव पौध रोपाई के 3-4 दिन बाद करें।

प्रमुख रोग

आद्र्रपतन- यह रोग मुख्य रूप से नर्सरी अर्थात गोभी की पौध तैयार करते समय लगता है। इसका प्रकोप दो अवस्थाओं में होता है। प्रथम पौध मृदा की सतह के बाहर आने से पहले ही मर जाती है तथा दूसरा पौध के उग आने के बाद इसका तना मृदा से छूते हुए स्थान पर विगलित हो जाता है जिससे पौध गिर कर मर जाते है।

नियंत्रण– नर्सरी की क्यारियां कुछ ऊंचाई पर उठी हुई व उचित जल निकास वाली हो। केप्टान या थायरम 0.3 प्रतिशत से मृदा उपचार करें । गर्मियों में नर्सरी की क्यारियों की प्लास्टिक द्वारा ढककर भी उपचारित किया जा सकता है, जिसे मृदा सौरीकरण कहते है। बीजों को एप्रोन 35 डब्ल्यू एस.2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर बुवाई करें।
काला धब्बा रोग – यह एक कवक जनित रोग है । रोग के लक्षण प्रारंभ में छोटे काले धब्बे पत्तियों पर व तने पर दिखाई देते हैं। जो बाद में फलों को भी ग्रसित कर देते है।

नियंत्रण- मेकोजेब, डाईफोलटान 80 नामक फफूंदी नाशक के 2 से 4 छिड़काव 1.5-2 ग्राम पानी के हिसाब से 15 दिन के अंतराल पर करें।
मृदुरोमिल- यह रोग पौधे की सभी अवस्थाओं में आता है व काफी नुकसान करता है। रोग के प्रमुख लक्षण पत्तियों को निचली सतह पर हल्के बैंगनी से भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते है। जिन पर बाद में कवक वृद्धि दिखाई देती है।
नियंत्रण- मेटालेक्जिल 8 प्रतिशत $ मेंकोजेब 64 प्रतिशत डब्ल्यू.पी. आधा ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से अथवा मेंकोजेब 1.5 से 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर 10-15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।

राइजोक्टोनिया रोग – यह रोग कारक पौधें की विभिन्न अवस्थाओं में भिन्न-भिन्न रोगों को जन्म देता है जिनमें आद्र्रपतन, वायर स्टेम, भूरा सडऩ, शीर्ष सडऩ आदि है।
नियंत्रण- यह एक मृदा जनित फफंूदी है अत: गर्मियों में खेत की गहरी जुताई करें। कम्पोस्ट खाद का उपयोग करें। सिंचाई हमेशा हल्की करें। ब्रेसीकोल 20-30 किलोग्राम की दर से मृदा को उपचारित करें।

तना सडऩ – रेाग की प्रांरभिक अवस्था में दिन के समय पौधे की पत्तियां लटक जाती है परंतु रात्रि में यह पुन: स्वस्थ दिखाई देती है। तने के निचले भाग पर मृदा तल के समीप जल सिक्त धब्बे दिखाई देते है। धीरे धीरे रोग ग्रसित भाग पर सफेद कवक दिखाई देने लगती है व तना सडऩे लग जाता है। इसे सफेद सडऩ भी कहते है।
नियंत्रण- कार्बेण्डाजिम 2 ग्राम बीज की दर से बीजोपचार करें। मेंकोजब व कार्बेंडाजिम को मिलाकर 15-20 दिन के अंतराल पर जब फूल बनाना प्रांरभ हो 3-4 छिड़काव करें।
पीलापन- इस रोग में पत्तियां पीली पडऩे लग जाती है व नीचे की पत्तियां जमीन र लटक जाती है। पौधे के उत्तक भी पीले अथवा गहरे भूरे हो जाते है। पौधा धीरे- धीरे मरने लगता है।

नियंत्रण- यह एक मृदा जनित फफूंदी है इसके नियंत्रण हेतु गर्मियों में खेत की गहरी जुताई करें व रेाग प्रतिरोधी किस्मों की बुवाई करें।
क्लब रूट- यह एक मृदा जनित रोग है। इसमें पौधा का पीला पडऩा, मुरझाना व जड़ों का फूलकर मोटा होना प्रमुख लक्षण है। यह रोग अम्लीय मृदा में अधिक होता है।
नियंत्रण- नर्सरी के क्षेत्र को बुवाई से दो सप्ताह पहले पेन्टाक्लोरोनाइट्रोबैंजीन या क्लोरोप्रिक्रिन या फार्मेलीन से उपचारित करें। खेत में फसल चक्र अपनायें।

काला सडऩ- यह एक जीवाणु रेाग है। इसके प्रमुख लक्षण पत्तियों के किनारों पर अग्रेंजी अक्षर वी आकार के हल्के हरे महीन धब्बे दिखाई देते है। रोग की उग्र अवस्था में पत्तियों की शिरायें काली हो जाती है। फूल का डंठल अंदर से काला पड़ जाता है।
नियंत्रण- यह रोगकारक जीवाणु बीज में रहता है अत: गर्म पानी से बीज को 30 मिनिट तक उपचारित करें। बीजों को बुवाई से पूर्व स्ट्रेप्टोसाईक्लिन 250 मिलीग्राम प्रति लीटर पानी के घोल में 2 घंटे तक भिगोकर सुखावें व बुवाई करें। रेाग ग्रसित पौधों को निकालकर नष्ट कर दें। स्ट्रेप्टोसाइक्लिन 250 मि.ग्रा. प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें।

मुलायम/नरम सडऩ– जीवाणु जनित यह रोग पौधें की विभिन्न अवस्थाओं में दिखाई देता है। यह रोग भण्डारण, मंडी में ले जाते समय अथवा खेत में अत्याधिक नुकसान करता है। यह रोग मुख्य रूप से काला सडऩ रेाग के बाद अधिक होता है।
नियंत्रण- ऐसे फूल जिन पर काला सडऩ रोग पूर्व में आ चुका हो उन्हें तोड़कर नष्ट कर देवें। स्ट्रेप्टोसाइक्लिन 100-200 पीपीएम व कॉपर आक्सीक्लोराइड (0.3प्रतिशत) को मिलाकर 15 दिन के अंतराल पर छिड़कें।
भूरी, गलन व लाल सडऩ – यह रोग बोरान तत्व की कमी के कारण होता है। गोभी के फूलों पर गोल आकार के भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते है जो बाद में फूल को सड़ा देते है।

नियंत्रण- रोपाई से पूर्व खेत में 10-15 किलोग्राम बोरेक्स प्रति हेक्टेयर के हिसाब से प्रयोग करें अथवा फसल पर 0.2 से 0.3 प्रतिशत बोरेक्स के घोल का छिड़काव करें।

मटर
मटर एक महत्वपूर्ण सब्जी की फसल है। इसे रबी में उगाया जाता है व इसका प्रयोग ताजा डिब्बाबंद व सूखी मटर के रूप में किया जाता है। फसल पैदावार में अधिकता व स्थिरता हेतु कृषि की विभिन्न उन्नत प्रक्रियाओं को अपनाना आवश्यक है। इसी कड़ी में कीटों व रोगों का उचित प्रबंधन पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया तो उत्पादन में बढ़ोत्तरी बहुत कठिन है। नाशक जीवों और रोगों से फसल की उपज में काफी कमी आ जाती है। अत: किसान भाइयों की मटर को प्रभावित करने वाले विभिन्न कीटों व रोगों व उनके नियंत्रण की जानकारी होना आवश्यक है।

प्रमुख कीट
तना मक्खी – इसका आक्रमण अगेती फसल में होता है। बीज अंकुरण की आरंभिक अवस्था में यह कीट गंभीर रूप धारण करता है जिसके परिणामस्वरूप खेत में पौधों की संख्या में कमी आ जाती है। सुंडिया जमीन की सतह के नजदीक बाहय तने में प्रवेश करती है व बाद में प्यूपा में परिवर्तित होने के पूर्व तने में पारदर्शी निकास द्वार की व्यवस्था कर लेती है, जिसके द्वारा विकसित तना मक्खी धक्का देकर तने के बाहर निकल आती है। इस कीट से ग्रसित पौधों का ठीक से विकास नहीं होता व कभी कभी तने में दरार भी पड़ जाती है। पत्तियों पर चमकीले सफेद रंग की धारी का पाया जाना इस कीट के आक्रमण के शुरू होने का संकेत देता है । कीट की लटें तने में सुरंग बनाती है। पत्तियां पीली पड़कर पौधा मुरझाने लगता है। नियंत्रण के लिए बुवाई पूर्व मृदा में फोरेट 10 जी 15 किलों प्रति हेक्टेयर की दर से मिलावें।

पर्ण खनक- इस कीट का प्रकोप मटर के पौधों की निचली व मध्य पत्तियों में दिसबंर के अंत से प्रांरभ होता है तथा फरवरी के अंतिम सप्ताह से मार्च के प्रथम सप्ताह में चरम सीमा पर पहुंच जाता है। पत्तियों के दोनों सतहों पर सुरंग दिखाई देती है। यह कीट पत्तियों में सुरंग बनाती है जिससे पत्तियां भोजन नही बना पाती है व पौधों की वृद्धि रूक जाती है। अत्याधिक कीट ग्रसित पत्तियां सूख जाती है तथा फूल व फलियॉं कम बनती है। नियंत्रण हेतु मिथाइल डिमेटोन 1 मिली/लीटर पानी की दर से छिड़काव करें।

फली छेदक– फरवरी माह में पौधों में जल फूल आने के समय इस कीट का प्रकोप आरंभ होकर अप्रैल माह तक चलता है। अण्डे से निकाली हुई सुण्डी अपने चारों ओर जाला बुनती है तथा फिर छेद कर फलों में घुसकर दानों को खाती रहती है। इससे काफी नुकसान होता है। ग्रसित फलियां बदरंग हो जाती है तथा उनमें पानी भर जाता है। ऐसी फलियों से दुर्गधं आने लगती है। नियंत्रण के लिए मैथालियान 1 मिली प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें।

चैंपा/मोयला- यह मटर के कोमल तनो, पत्तियों की निचली सतह, फूलों, कलियों, अग्रभाग तथा फलियों का रस चूसकर पौधें के विभिन्न कोमलांगों की क्षति पहुंचाते है। कीटों से प्रकोपित पौधे छोटे रह जाते है, तथा इनकी पत्तियां पीली पड़ जाती है, ग्रसित फलियां छोटी हो जाती है। नियंत्रण के लिए डायमेथोएट 30 ई.सी.1मिली, प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें।

प्रमुख रोग:-

छाछ्या- इस रोग में सफेद चूर्ण पत्तियों व पौधे के अन्य भागों पर दिखाई देता है। नियंत्रण के लिए 1 मिली. डायनोकेप 48ई.सी. या ट्राइडेमार्फ 80 ई.सी. प्रति लीटर पानी की दर से 10 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें। रोगरोधी किस्में जैसे रचना, पंत मटर 5, शिखा, सपना, मालवीय मटर उगाएं।

बीज व जड़ गलन- बीज बुआई के बाद सड़ जाते है या उगने के बाद मर जाते है। नियंत्रण के लिए बीजोपचार अवश्य करें इसके लिए बीजों को 2 ग्राम कार्बेण्डाजिम प्रति किलों बीज दर से उपचारित करें।

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