टिड्डी : किसानों का सबसे प्राचीन शत्रु

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टिड्डी : किसानों का सबसे प्राचीन शत्रु – टिड्डी दल किसानों के सबसे प्राचीन शत्रु हैं। वे मध्यम से बड़े आकार के टिड्डे होते हैं। जब वे अकेल होते हैं और साधारण टिड्डों की तरह व्यवहार करते हैं तो उन्हें एकाकी अवस्था में जाना जाता है। भीड़-भाड़ की सामूहिक स्थितियों में वे साथ-साथ समूह बनाकर रहते हैं और चिरस्थायी तथा सम्बद्ध वयस्क टिड्डियों का झुंड बनाते हैं। यह तब होता हैं जब वह यूथचारी रुप में रहते हुये समूहशीलता या सामूहिक जीवन की अवस्था में पाये जाते हैं। इसके बाद वाली अवस्था में वे फसलों और अन्य पेड़-पौधों-वनस्पतियों को भारी नुकसान पहुँचाते हैं।

निवास: टिड्डियों का निवास उन स्थानों पर पाया जाता है जहाँ जलवायु असंतुलित होता है। और निवास के स्थान सीमित होते हैं इन स्थानों पर रहने से अनुकूल ऋतु इनकी सीमित संख्या को संलग्न क्षेत्रों में फैलाने में सहायक होती है। प्रवासी टिड्डी के निवास स्थल चार प्रकार के होते हैं:

  • कैस्पियन सागर, ऐरेल सागर तथा बालकश झील में गिरने वाली नदियों के बालू से घिरे डेल्टा।
  • मरूभूमि से लगे घास के मैदान, जहाँ वर्षा में बहुत अधिक विषमता रहती है, जिसके कारण टिड्डियों के निवास स्थान में परिवर्तन होते रहते हैं।
  • मध्य रुस के शुष्क तथा गरम मिट्टी वाले द्वीप जो टिड्डी लिए नम तथा अत्यधिक ठंडे रहते हैं। इस क्षेत्र में तभी बहुत संख्या में टिड्डियों एकत्र होती है, जब अधिक गर्मी पड़ती है तो ये वहाँ से स्थान परिवर्तित कर देती हैं।
  • फिलीपीन के अनुपयुक्त, आद्र्र तथा उष्ण कटिबंधीय जंगलों को समय-समय पर जलाने से बने घास के मैदान में।

वयस्क यूथचारी टिड्डियों गरम दिनों में झुंडों में उड़ा करती हैं। उडऩे के कारण पेशियाँ सक्रिय होती हैं, जिससे उनके शरीर का ताप बढ़ जाता है। वर्षा तथा जाड़े के दिनों में इनकी उड़ान बंद रहती है। मरुभूमि टिड्डियों के झुंड, ग्रीष्म मानसून के समय, अफ्रीका से भारत आते हैं और पतझड़ के समय ईरान और अरब देशों की ओर चले जाते हैं। इसके बाद ये सोवियत एशिया, सिरिया, मिस्र और इजराइल में फैल जाते हैं, इनमें से कुछ भारत और अफ्रीका लौट आते हैं, जहाँ इससे मानसूनी वर्षा के समय प्रजनन होता है।

प्रवासी टिड्डियों की प्रमुख जातियाँ: उत्तरी अमरीका की रॉकी पर्वत की टिड्डी, मरुभूमि टिड्डी (स्किस टोसरका ग्रिग्ररिया) दक्षिण अफ्रीका की भूरी टिड्डी (लोकस्टान पारगलिना) तथा लाल टिड्डी (नौमेडेक्रिस सेंप्टेमफैसिऐटा) साउथ अमेरिका, इटली तथा मोरोक्कों की टिड्डी। इनमें से अधिकांश अफ्रीका, ईस्ट इंडीज, उष्ण कटिबंधीय आस्टेऊलिया, यूरेसियाई टाइगा जंगल के दक्षिण घास के मैदान तथा न्यूजीलैण्ड में पायी जाती है।

जीवन चक्र: टिड्डी के जीवन चक्र में तीन अवस्थायें होती है:

अण्डे: मादा अपने पिछले हिस्से से बालू या मिट्टी में 8-15 सेमी गहरे गड्ढे बनाती है। इन्हीं गड्ढे में 50 से लेकर 110 तक समूह में इन्हें गड्ढे में मादा अण्डे देती है। अण्डे देने के बाद मादा मुँह से झांगदार द्रव निकाल गड्ढे मेें डालती है जो कि अण्डों के ऊपर कठोर पर्त बनाता है। प्रत्येक अण्डा चावल के समान पीले रंग का 7-8 मिमी लम्बा होता है ये अण्डे डेढ़ से 4 सप्ताह के बीच उनमें से शिशु-टिड्डी (लार्वा) निकलता है, जिनका शरीर एक पतली झिल्ली से ढका रहता है। ये ऊपर की झिल्ली गिराकर साथ-साथ शिशुओं में परिवर्तित कर देते हैं।

शिशु-टिड्डी: अण्डे से निकलने के बार पंखहीन सफेद शिशु-टिड्डी-दल वनस्पतियों, पेड़-पौधों की तलाश में जमीन को सतह पर चलने लगते हैं, इसके तुरन्त बाद वे काले रंग के हो जाते हैं और बाद में उनके शरीर की आकृति पीले रंग की विकसित होने लगती है। वयस्क होने के पहले शिशु-टिड्डी-दलों का पाँच बार त्वक-पतन होता है।

वयस्क: काली आकृति के साथ उम्रदार टिड्डी चमकीले पीले रंग की हो जाती है। यूथचारी या समूहशील टिड्डी 30 दिन में वयस्क हो जाती है। वयस्क टिड्डी-दल परिपक्वता की स्थिति में तभी पहुँच पाते हैं जब उन्हें प्रजनन के एिल अनुकूल स्थितियाँ मिलती हैं। सामान्यत: अण्डे देने की प्रक्रिया मैथुन के बाद दो दिन के भीतर आरम्भ होती है।

नियंत्रण:

  • टिड्डियों का झुण्ड दिन के दौरान उड़ता रहता है और शाम होने पर पेड़ों पर झाडिय़ों में, फसलों इत्यादि में बसेरा करता है और रात गुजारता है। अत: टिड्डियों के दलों की तलाश के सिलसिले में विशेष तौर से इन स्थानों की जांच की जानी चाहिए। फिर वे सुबह होने पर सूर्य उदय के बाद अपने बसेरे के स्थान से उठकर उडऩा शुरु कर देते हैं।
  • अपरिपक्व वयस्क टिड्डी दल गुलाबी रंग के होते हैं और धीरे-धीरे वे धुंधले सलेटी या भूरेपन लिए लाल रंग के हो जाते हैं। परिपक्वता की स्थिति में पहुँचने पर वे पीले हो जाते हैं। शिशु-टिड्डी झुण्डों के रुप में चलती है।
  • आने वाले टिड्डी दल दो रंग के गुलाबी और पीले होते हैं। पीले रंग की टिड्डी ही अंडे देने में सक्षम होती है, इसके लिए पीले रंग के टिड्डी दल के पड़ाव डालने पर पूरा ध्यान रखने की आवश्यकता है, क्योंकि पड़ाव डालने के बाद टिड्डियाँ किसी भी समय अण्डे देने शुरु कर देती हैं। अण्डे देते समय दल का पड़ाव उसी स्थान पर 3-4 दिन तक रहता है अत: दल उड़ता नहीं है। इस स्थिति का पूरा लाभ उठाना चाहिए। गुलाबी रंग की टिड्डियों के दल का पड़ाव अधिक समय नहीं होता इसलिए इसके नियंत्रण हेतु तत्परता बहुत जरुरी है।
  • टिड्डियों का आतंक आरम्भ हो जाने के बाद इसे नियंत्रित करना कठिन हो जाता हे, इस पर नियंत्रण पानेे के लिए हवाई जहाज से कीटनाशकों का छिड़काव, विषैला चारा जैसे-बेन्जीन हेक्साक्लोराइड के विलयन में भीगों हुई गेहूँ की भूसी का फैलाव आदि उपयोगी होता हे।
  • प्रजनन कम होने दे, इसके लिए जहाँ अण्डे दिये जाते हैं वहाँ पर खुदाई करके अण्डों को नष्ट कर दें।
  • नीम अधारित फारम्यूलेशन (0.15 प्रतिशत ईसी)/45 मिली डीडीवीपी 76 ईसी/10 मिली/15 ली. पानी में मिलाकर खड़ी फसल में छिड़कव करें। इससे वयस्क नष्ट हो जायेगें।
  • 1 हेक्टेयर फसल में क्विनालफास 1.5 प्रतिशत डीपी या क्लोरपाइरीफास 1.5 प्रतिशत डीपी/25 किग्रा का बुरकाव खड़ी फसल में करें। स्प्रे के 15 दिन के बाद ही फसल को तोड़ें। इससे वयस्क नष्ट हो जायेंगें।
  • ‘कार्बोरिल चूर्ण’ का छिड़काव 25-30 किग्रा प्रति हे. खड़ी फसल में लाभप्रद होता है।
  • समेकित कीट प्रबंधन को प्रणाली अपनायें।
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