आलू की खेती

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11 अक्टूबर 2021, आलू की खेती –

मानव आहार में प्रयोग की जाने वाली विभिन्न प्रकार की सब्जियों में आलू का प्रमुख स्थान है। इसमें कार्बोहाइड्रेट की प्रचुर मात्रा के साथ-साथ खनिज लवण, विटामिन तथा अमीनों अम्ल की मात्रा भी पायी जाती है, जो शरीर की वृद्धि एवं स्वास्थ्य के लिये आवश्यक है।

जलवायु

आलू के लिये शीतोष्ण जलवायु तथा कंद बनने के समय 18 से 20 डिग्री सेन्टीग्रेड तापक्रम होना चाहिये। यह फसल पाले से प्रभावित होती है।

भूमि

आलू की फसल सामान्य तौर पर सभी प्रकार की भूमि में उगाई जा सकती है तथा हल्की बलुई दोमट मिट्टी वाला उपजाऊ खेत जहां जल निकास की सुविधा हो इसके लिये विशेष उपयुक्त रहता है। खेत को समतल होना भी आलू की फसल के लिये आवश्यक होता है। आलू को 6 से 8 पी.एच. वाली भूमि में भी सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है, परन्तु लवणीय व क्षारीय भूमि इस फसल के लिये पूर्णतया अनुपयुक्त रहती है।

खेत की तैयारी एवं भूमि उपचार

आलू की खेती के लिये खेत की जुताई बहुत अच्छी तरह होनी चाहिये। एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा फिर दो-तीन बार हैरो या देशी हल से जुताई कर मिट्टी को भरभुरी कर लें। प्रत्येक जुताई के बाद पाटा लगायें जिससे ढेले न रहें।
भूमि उपचार के लिये अंतिम जुताई के समय क्विनालफॉस 1.5 प्रतिशत चूर्ण 25 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से भूमि में भलीभांति देें जिससे भूमिगत कीटों से फसल की सुरक्षा होती हो सके।

खाद एवं उर्वरक

फसल की बुवाई के एक माह पूर्व 25 से 35 टन प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद खेत में भलीभांति मिला दे। जहां तक संभव हो सके मृदा परीक्षण के आधार पर ही उर्वरकों का प्रयोग करें। सामान्य तौर पर 120 से 150 किलो नत्रजन, 80 से 100 किलोग्राम फास्फोरस एवं 80 से 100 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर के हिसाब से दें। नत्रजन की आधी मात्रा, फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई से पूर्व ऊर कर दें। नत्रजन की शेष आधी मात्रा बुवाई के 30 से 35 दिन बाद मिट्टी चढ़ाने से साथ दें।

कंदों की मात्रा व उपचार

बुवाई के लिये रोग प्रमाणित स्वस्थ कंद ही उपयोग में लें। सिकुड़े हुए या सूखे कन्दों का इस्तेमाल नहीं करें। कंद कम से कम 2.5 सेन्टीमीटर व्यास के आकार का या 25 से 35 ग्राम के साबूत कंद हो। विभिन्न परिस्थितियों में एक हेक्टेयर भूमि में बुवाई के लिये 25 से 30 क्विंटल आलू के कंदों की आवश्यकता होती है।
बुवाई से पूर्व कंदों को स्ट्रेप्टोसाइक्लिन 10 ग्राम को 10 लीटर पानी अथवा 10 ग्राम कार्बेंडाजिम 50 डब्ल्यू.पी. को 10 लीटर पानी में घोलकर कंदों को घोल से उपचारित करके बुवाई करें।

बुवाई

आलू की मुख्य फसल की अक्टूबर के अंतिम सप्ताह तक बुवाई कर दें। बुवाई के समय मौसम हल्का ठण्डा हो। कंदों की मात्रा व बुवाई की दूरी सामान्यत: कंदों की किस्म, आकार व भूमि की उर्वरता पर निर्भर करती है। बुवाई से पूर्व कन्दों को 2 ग्राम थाइरम+1 ग्राम कार्बेंडाजिम 50 डब्ल्यू.पी. प्रति लीटर पानी के घोल में 20 से 30 मिनट तक भिगोंये तथा छाया में सुखाकर बुवाई करें।

सिंचाई

बुवाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करें। आमतौर पर आलू की फसल के लिये 7 से 10 दिन के अंतराल पर 10 से 15 सिंचाईयों की आवश्यकता होती है। जैसे-जैसे फसल पकती जाये सिंचाई की अन्तर बढ़ाते जायें। पकने से 15 दिन पूर्व सिंचाई बंद कर दें।

निराई गुड़ाई

कंद की बुवाई के 30 से 35 दिन बाद जब पौधे 8 से 10 से.मी. के हो जावे तो खरपतवार निकाल कर मिट्टी चढ़ा दें। इसके एक माह बाद दुबारा मिट्टी चढ़ा दें।

कंदों की खुदाई

potato-kand

आलू की फसल में जब पत्तियों एवं तना सूखने लगे तो उस समय पौधे के तने को पत्तियों सहित काट लेते हैं तथा इसकी कुछ दिन बाद खुदाई करते है। इससे कन्दों में मजबूती आ जाती है और अधिक समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। अधिक समय तक मिट्टी में छोड़ा गया आलू गर्मी के कारण सड़ जाता है इसलिए समय रहते खुदाई करके आलू निकाल लें।

उपज

आलू की फसल से औसतन 200-300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर आलू प्राप्त किया जा सकता है।

उन्नत किस्में

अल्प अवधि वाली : कुफरी ख्याति, कुफरी लीमा।
मध्यम अवधि वाली : कुफरी नीलकंठ, कुफली मोहन, कुफरी हिमालिनी, कुफरी गंगा, कुफरी करण, कुफरी संगम

कन्दों की तैयारी

भण्डारित आलू को 4 से 5 दिन पूर्व शीतगृह से निकाल कर सामान्य ठंडे स्थान पर रखें। बुवाई से पूर्व इसे 24 से 48 घण्टे तक हवादार, छाया युक्त स्थान में फैलाकर रखें। शीतगृह से लाये गये आलूओं को धूप में न रखें और न ही तुरन्तु बुवाई के लिये प्रयोग में लावें, अन्यथा बाहरी तापक्रम की अधिकता की वजह से आलू के सडऩे का खतरा बना रहता है। जिन कन्दों पर अंकुरित प्रस्फुट न दिखाई दे उन्हें हटा दें।

आलू बोने की विधियां
  • खेत में 60 सेन्टीमीटर की दूरी पर कतार बनाकर 20 सेन्टीमीटर की दूरी पर 5-7 सेन्टीमीटर की गहराई पर आलू के कन्द बोये। दो कतारों के बीच में हल चलाकर आलू को दबा दें। इस प्रकार बोने से डोलियां बनाने का श्रम व खर्चा बचेगा।
  • पहले खेत में 15 सेन्टीमीटर ऊँची डोलियां बना लेें और उसके एक तरफ या बीच में आलू के कंद को 5 से 7 सेन्टीमीटर गहरी बुवाई करें।

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