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17  मई 2021, भोपाल । हरी खाद हरियाली लाये – हरी खाद का उपयोग कृषि उत्पादन बढ़ाने के उद्देश्य से पुराने समय से चला आ रहा है उस समय चूंकि आबादी सीमित थी जोत लम्बी-चौड़ी थी इस कारण बुआई उपरांत जितना भी अन्न मिलता था उसे ईश्वर की कृपा मानकर स्वीकारा जाता था, धीरे-धीरे समय बदला, आबादी बढ़ी खेती के बंटवारे में परिवार बढऩे के कारण हुए और अतिरिक्त अन्न की आवश्यकता चुनौती बनकर सभी संबंधितों के सामने आ गयी। जहां खेती की फसल सघनता 100 प्रतिशत थी। बढ़कर 200 और आंशिक क्षेत्रों में तीन सौ प्रतिशत तक हो गई। खेती के लिये सबसे बहुमूल्य आदान जल को समेटकर बांध कर रखने की जरूरत सामने आई क्योंकि जो भी फसलों की नई-नई किस्में आई उनकी जल तथा पोषक तत्वों की मांग आम फसल की तुलना में दो से तीन गुना तक हो गई भूमि पर एक के बजाय तीन-तीन फसलों के लिये पोषक तत्वों की मांग पूरी करने का बोझ लद गया। रसायनिक उर्वरकों से दो-तीन दशक तक काम चला परंतु जब यह पाया गया कि अंधाधुंध जल तथा उर्वरकों के उपयोग का असर भूमि के स्वास्थ्य पर बुरा पडऩे लगा। क्षारीयता/अम्लीयता का प्रभाव नजर आने लगा तब कृषि ने फिर नई करवट बदली और पुरानी तर्ज पर उपयोग होने वाले पोषक तत्वों की मांग पूर्ति के पुराने साधनों ने फिर से जोर पकड़ा और आज वह प्रयास एक अभियान की तरह सब जगह फैल रहा है जिसे जैविक खेती के नाम से जाना- पहचाना जाने लगा। खेत की दशा- दिशा में सुधार लाने के विभिन्न प्रयासों में गोबर तथा कूड़े-करकट से बने खाद का उपयोग सबसे आगे आया परंतु मशीनीकरण के कारण खेती के सबसे बड़े सहायक पशुओं के विस्तार में कुप्रभाव पड़ा और गोबर की पूर्ति इतने विशाल क्षेत्रों के लिये सम्भव नहीं हो सकी। अन्य प्रयासों में हरी खाद सबसे महत्वपूर्ण एवं सुलभ मानी गई क्योंकि हरी खाद के उपयोग से भूमि की उर्वराशक्ति भूमि में लिप्त सूक्ष्म जीवों की क्रियाशीलता बढ़ाने में बहुत सहायक सिद्ध हुई। कहा जाता है मिट्टी एक सजीव तंत्र है जिसमें सैकड़ों प्रकार के जीवाणु बसते हैं।

सतत् रसायनिक उर्वरकों के उपयोग से उन पर विपरीत असर पड़ता है। हरी खाद द्वारा भूमि में दलहनी फसलों की कोमल पत्तियां, डंठलों को मिला दिया जाता है जिसका प्रभाव मिट्टी की भौतिक तथा उपलब्ध जीवाणु की सक्रियता की गति में कम फर्क आता है। हरी खाद के लिये उपयोगी फसलों में सन, ढेंचा, लोबिया, मूंग, उड़द, ग्वार, सैंजी, बरसीम इत्यादि प्रमुख है। इसके उपयोग से एक नहीं अनेक लाभ पाये गये हंै जैसे पोषक तत्वों की उपलब्धता के अलावा मिट्टी भुरभुरी हो जाती है, भुरभुरी मिट्टी का मतलब है वर्षा जल को समेटने की क्षमता में वृद्धि तथा हवा के संचार का लाभ भूमिगत जीवाणु को मिलता है। भूमि में छिपे रोग/कीटों के अवशेष भी हरी खाद जब खेत में मिलाई जाती है उस वक्त उनका खात्मा हो जाता है क्योंकि सडऩे के दौरान जो तापमान बढ़ता है उसको सहन करना कीट- रोगों के अवशेषों के बस की बात नहीं है। हरी खाद में ढेंचा के उपयोग से/हे. 26.2 किलो नत्रजन, 7.3 किलो स्फुर, 11.7 किलो पोटाश, 1.9 किलो गंधक तथा 1.4 किलो चूना इत्यादि फसलों के लिये उपयोगी पोषक तत्व का जमाव भूमि में हो जाता है जिसका लाभ आगामी फसल में सिफारिश की गई उर्वरक मात्रा को घटाकर इस मद में हो रहे खर्च में कमी लाकर अधिक लाभ अर्जित किया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि हरी फसल को 30-35 दिनों के भीतर ही भूमि में हल चलाकर समेट देना चाहिये ताकि कोमल पत्तियां, पौध का विघटन जल्द से जल्द हो सके। महंगाई के इस युग में जहां खेती को लाभ का धंधा बनाने की तूती बनाई जा रही है वहीं हरी खाद को एक सशक्त माध्यम बनाया जा सकता है।

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