संपादकीय (Editorial)

कृषि निर्यात में तेजी लाने, करने होंगे उपाय

(विशेष प्रतिनिधि)

नई दिल्ली। निर्यातकों ने सरकार से कहा है कि कृषि उत्पादों की कमी वाले देशों के साथ वस्तु-विनिमय व्यापार प्रारंभ किया जाएए जिससे भारत से होने वाले कृषि और संबंधित वस्तुओं के निर्यात में तेजी लाई जा सके। अनेक देशों से प्रतिबंधों का सामना कर रहा भारत का कृषि उत्पाद निर्यात पिछले 4 वर्षों में 19 प्रतिशत गिर गया।

वर्ष 2013-14 में यह 39.6 अरब डॉलर था जो 2016-17 में घटकर 32 अरब डॉलर रह गया है। समान अवधि में कृषि और संबंधित वस्तुओं के आयात में 66 प्रतिशत की तेजी आई है और यह 2013-14 के 14.6 अरब डॉलर से बढ़कर 2016-17 में 24.2 अरब डॉलर हो गया। इस कारण भारत का व्यापार अधिशेष 2013-14 में 25 अरब डॉलर के मुकाबले 2016-17 में घटकर 7.8 अरब डॉलर रह गया।

विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि यूरोपीय संघ (ईयू) के देश, अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया और चीन अपने विभिन्न उत्पाद जैसे कार, इलेक्ट्रॅनिक सामान और दूसरी वस्तुएं भारत में डंप कर रहे हैं। साथ ही ये देश भारत में बनने वाली वस्तुओं को आयात करने का आश्वासन भी नहीं देते। उदाहरण के लिए यूरोपीय संघ ने भारत के बासमती चावल पर यह कहते हुए रोक लगा दी कि इसमें एक ऐसे कीटनाशक की मात्रा पाई गई है जो ईयू की सूची में शामिल नहीं है। वहीं, ईयू बड़ी संख्या में कार, चॉकलेट, ऑलिव तेल आदि भारत को निर्यात करता है।

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वस्तु विनिमय व्यापार से आएगी तेजी
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यूपीएल लिमिटेड के कार्यकारी अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक रज्जू श्रॉफ कहते हैं, ‘इसलिए हमें कृषि घाटे वाले देशों के साथ वस्तु-विनिमय वार्ताएं करनी चाहिए। अगर भारत कैलिफोर्निया से बादाम का आयात करता है तो अमेरिका को हमसे निश्चित ही कृषि, डेयरी और दूसरे उत्पादों का आयात करना चाहिए।’ भारत में कीटनाशकों और एग्रोकेमिकल्स निर्माताओं का प्रतिनिधित्व करने वाले शीर्ष संगठन क्रॉप केयर फेडरेशन ऑफ इंडिया (सीसीएफआई) ने वित्त मंत्रालय को एक बजट-पूर्व ज्ञापन सौंपा है, जिसमें कहा गया है कि देश के कृषि निर्यात को बढ़ावा देने के लिए शीघ्र ध्यान देने की आवश्यकता है।

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बेहतर ब्रांडिंग हो
भारत के कृषि निर्यात को बढ़ावा देने के लिए एक तात्कालिक कदम यह हो सकता है कि इलेक्ट्रॉनिक, मशीनरी, एयरक्राफ्ट, तेल आदि के मामले में केवल उन देशों के लिए ‘तरजीही आयात’ को अपनाया जाएए जो भारत के कृषि उत्पादों की आसान पहुंच सुनिश्चित करते हैं। सीसीएफआई का कहना है कि दूसरे देशों की तरह भारतीय कृषि उत्पादों की भी बेहतर मार्केटिंग और ब्रांडिंग की जाए।

बाजार केन्द्रित मार्केटिंग की जरूरत
श्री श्रॉफ कहते हैं कि वर्तमान में भारतीय कृषि उत्पादन केंद्रित है लेकिन इसे बदलकर बाजार केंद्रित करने की आवश्यकता है। वह कहते हैं कि बुआई सत्र शुरू होने से पहले ही किसानों को एक संकेत दिया जाना चाहिए कि इस बार कौन सी फसल बोई जाए। उनके अनुसार, ‘जब उत्पादन बढ़ जाता है तो किसानों को कम दाम मिलते हैं। वर्तमान फसल की क्षमता के बारे में एक बेहतर संकेत के माध्यम से किसान और सरकार, दोनों को लाभ होगा। किसान अपने लिए बेहतर फसल का चुनाव कर सकेंगे और सरकार को कृषि उत्पादों का आयात कम करने में सहायता मिलेगी। इस वर्ष भारत द्वारा दालों का कम आयात करने की आशंका के बीच ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड ने अपने किसानों को दालों की बुआई कम करने के लिए कहा है। भारत में भी किसानों को बुआई से पहले इसी तरह के संकेत दिए जाने की आवश्यकता है।

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