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फसल की खेती (Crop Cultivation)

ऐसे करें मसूर की खेती

ऐसे करें मसूर की खेती – भूमि एवं तैयारी : दोमट से भारी भूमि मसूर के लिए उपयुक्त होती है। खरीफ फसल की कटाई के बाद 2-3 हल्की जुताई कर नमी संचय के लिए पाटा लगाना चाहिए। मसूर के लिए अधिक भुर-भुरी व बारीक मिट्टी की आवश्यकता होती है। यह ध्यान रहे कि खेत में बिना सड़ा कम्पोस्ट खाद, कचरा न रहे। धान के बाद खाली छोड़े गये खेतों मेें भी मसूर सफलतापूर्वक ली जा सकती है। धान के क्षेत्रों में इसकी खेती उतेरा पद्धति से की जा सकती ंहै।

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जातियाँ : जवाहर मसूर 1, पंत मसूर 639, मलिका (के 75), शिवलिंग (एल 4076), जवाहर मसूर 3, नूरी (आईसीपीएल 83)।

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बीज की मात्रा : खेत में वांछित पौध संख्या प्राप्त करने के लिए बड़े दाने वाली जाति का 50 किलोग्राम व छोटे दाने वाली जाति का 40 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टर बोना चाहिए।

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बीजोपचार : बीज को थायरम+ कार्बेंडाजिम के 2:1 अनुपात के 3 ग्राम मिश्रण प्रति किलो ग्राम बीज की दर से उपचारित करें। तत्पश्चात् 5 ग्राम पी.एस.बी. कल्चर प्रति किलोग्राम बीज की दर से प्रयोग करें। बीजोपचार के बाद बीज को छाया में सुखा कर बोएं।

बोनी का समय व तरीका : उपयुक्त समय 15 अक्टूबर से 15 नवम्बर तक है। बोनी देशी हल, दुफन, तिफन या उन्नत बोनी यंत्र द्वारा कतारों में ही करें। कतारों से कतारों की दूरी 25-30 से.मी. (10-12 इंच) रखें और बीज 5-7 से.मी. की गहराई पर बोयें। पिछेती बोनी के लिए यह दूरी घटाकर 15-20 से.मी. कर देना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक : भूमि में नमी के अनुसार 10-40 किग्रा यूरिया तथा 250 किग्रा सिंगल सुपर फास्फेट प्रति हे. की जरूरत होती है जिसे 80 किग्रा डीएपी प्रति हेक्टर बोते समय देकर प्राप्त किया जा सकता है। गंधक की कमी वाले क्षेत्रों में 20 किग्रा गंधक प्रति हेक्टर 100 किग्रा जिप्सम के रूप में देना चाहिए।

जस्ते की कमी की स्थिति में फसल पर जिंक सल्फेट 5 ग्राम+चूना 3 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल कर छिड़कने से उपज में वृद्धि होती है।
अगर मिट्टी में नमी कम है तो खाद की मात्रा कम कर देना चाहिए। उर्वरकों की पूरी मात्रा बोनी के समय इस प्रकार दें जिससे वह बीज के कुछ नीचे गिरे। इसके लिए ट्रैक्टर से चलने वाले बोनी यंत्र उपलब्ध हैं। देशी बोनी यंत्र में भी आगे- पीछे दो पोर लगा कर ऐसी व्यवस्था की जा सकती है।
उतेरा खेती के लिए 43 किलो यूरिया धान की फसल काटने के बाद खेत में बिखेरना चाहिए। इसके अलावा फास्फेट 15 किग्रा की दर से फूल आने एवं फलियां बनते समय फसल पर छिड़कें।

सिंचाई: मसूर को अधिक पानी की जरूरत नहीं होती है। एक सिंचाई फूल आने के पूर्व बोनी के 40-50 दिन बाद देने से उपज में लाभ होता है। मावठा हो तो सिंचाई न करें।

निंदाई-गुड़ाई : बोने के 40-45 दिनों तक फसल खरपतवारों से मुक्त रहना जरूरी होता है।

पौध संरक्षण

गेरूआ – जनवरी-फरवरी में मावठा गिरने एवं नमी होने पर मसूर पर गेरूआ लग सकता है। रोग दिखते ही फसल पर मेन्कोजेब 0.25 प्रतिशत घोल (2.5 ग्राम दवा 1 लीटर पानी में) का छिड़काव करें। जरूरत पडऩे पर एक पखवाड़े बाद दोबारा छिड़काव करें।

माहो – माहो की रोकथाम के लिये डायमिथियेट 30 ई.सी. 500 मि.ली. प्रति हेक्टेयर की दर से 15 दिनों के अंतर से दो छिड़काव करें।