पीला सोना सरसों की भरपूर उपज लें

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पीला सोना सरसों की भरपूर उपज लें – सरसों (राया) रबी में उगाई जाने वाली राजस्थान व मध्यप्रदेश की प्रमुख तिलहनी फसल है। राजस्थान में सरसों की औसत पैदावार बहुत कम है। सरसों में उन्नत शस्य क्रियाएं व उन्नत किस्मों को न अपनाने एवं उचित समय पर उचित तरीके से पौध संरक्षण कार्य न अपनाने के कारण सरसों की पर्याप्त पैदावार नहीं मिल पाती है। अत: फसल उत्पादन पर किया गया खर्च व्यर्थ में ही चला जाता है। सरसों की फसल में खरपतवार, रोग व नाशक-कीट का बहुत प्रकोप होता है। जिसके कारण यदि समय पर इनका नियंत्रण न किया जाय तो 20 से 70 प्रतिशत तक पैदावार घट सकती है। इन नाशीजीवों के अतिरिक्त सरसों में पाले से भी भारी नुकसान होता है। कई बार तो पाले से 90 प्रतिशत तक नुकसान हो जाता है। अत: सरसों की अच्छी पैदावार लेने के लिए उन्नत शस्य क्रियाएं तथा उन्नत किस्मों को अपनाने के अतिरिक्त फसल में पौध संरक्षण कार्य भी अपनाने चाहिये।

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खेत की तैयारी: सरसों हेतु दोमट व हल्की दोमट मिट्टी अधिक उपयुक्त होती है। अच्छे जल निकास वाली मिट्टी जो लवणीय एवं क्षारीय न हो ठीक रहती है। इसको हल्की ऊसर भूमि में भी बुवाई कर सकते हैं। सरसों की खेती बारानी एवं सिंचित दोनों ही प्रकार से की जाती हे। बारानी खेती के लिये खेत को खरीफ में खाली छोडऩा चाहिये। पहली जुताई वर्षा ऋतु में मिट्टी पलटने वाले हल से करें। इसके बाद 3-4 जुताई हैरो या देशी हल से करें। सिंचित खेती के लिये भूमि की तैयारी बुवाई के 3-4 सप्ताह पूर्व प्रारम्भ करें। जहां सम्भव हो बारानी खेतों में बरसात होते ही ज्वारव चंवला मिलाकर चारे की फसल बोयें । दो महीने की फसल लेकर रबी हेतु खेत तैयार करें एवं समय पर सरसों बोयें। चारे हेतु 50 किलोग्राम नत्रजन एवं 30 किलोग्राम फास्फोरस दें।

उन्नत किस्में: पूसा सरसों, पूसा सरसों-26, पूसा सरसों-27, आर.जी.एन.-145, एन.आर.सी.एच.बी.-101, टी 59, आर एच 30, बायो 902, जी.एम. 2, उर्वशी, जे.एम.1, सी.एस. 52, आशीर्वाद।

उर्वरक प्रयोग: सिंचित फसल के लिये 60 किलोग्राम नत्रजन, 30-40 किलोग्राम फास्फोरस एवं 250 किलोग्राम जिप्सम या 40 किलोग्राम गंधक चूर्ण प्रति हेक्टेयर दें। हल्की भूमि में 80 किलोग्राम नत्रजन प्रति हैक्टेयर देना लाभदायक पाया गयाहै।

  • नत्रजन की आधी मात्रा व फास्फोरस की पूरी मात्रा बुवाई के समय ऊर कर दें तथा शेष नत्रजन पहली सिंचाई के साथ दें। असिंचित क्षेत्रों में ऊपर बताये गये उर्वरकों की आधी मात्रा ही बुवाई के समय काम में लीजिये।
  • राया की फसल में जैव उर्वरकों, एजोक्टोबेक्टर/ऐजोस्पिरिलम तथा फास्फोट घोलक जीवाणु (पी.एस.बी.) प्रत्येक 500 ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बीज को उपचारित कर बुवाई करने से उपज में वृद्धि होती है तथा 25 प्रतिशत नत्रजन तथा फास्फोरस तत्वों की बचत की जा सकती है।
  • द्य पौधों की संख्या अधिक हो तो बुवाई के 20 से 25 दिन बाद निराई के साथ छंटाई कर पौधे निकाल दें तथा पौधे से पौधे की दूरी 10 से 12 सेन्टी मीटर कर देवें।

निराई-गुड़ाई: सरसों में कई प्रकार के खरपतवार उग जाते हैं। खरपतवार फसल के साथ पोषक तत्व, पानी, प्रकाश व स्थान के लिये स्पर्धा करते हैं। इतना ही नहीं खरपतवार भूमि में कई प्रकार के हानिकारक तत्व भी छोड़ते हैं तथा खरपतवार अप्रत्यक्ष रूप से फसल में रोग व नाशक-कीट भी फैलाते हैं। इन सभी कारणों से पौधे कमजोर हो जाते हैं। जिससे पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। सरसों के बथुआ, खर बथुआ, पील सैजी, सफेद सैजी, जंगली पालक, कृष्ण नील, प्याजी आदि प्रमुख खरपतवार हैं। इनके अलावा सरसों में आग्या (ओरोबन्की) नामक पराश्रयी खरपतवार का भी प्रकोप होता है। ओरोबन्की बकुम्भा, गठंवा अथवा भूई फोड़ के नाम से भी जाना जाता है। स्थानीय भाषा में किसान इसे ‘लोंकी मूलाÓ के नाम से भी पुकारते हैं। यह सरसों, बैंगन व तंबाकू के खेतों में जड़ों से अपनी खुराक चूस कर उन्हें नुकसान पहुंचाता है। सर्दियों की ऋतु में यह फलता व फूलता है। यह पराश्रयी पौधा भूरे रंग का होता है तथा इसके फूल नीले रंग के होते हैं। इसकी ऊँचाई एक फीट तक पाई जाती है। केवल बीजों द्वारा ही इसका नया पौधा जन्म पाता है। सरसों में खरपतवार नियंत्रण करने के लिये फ्लूक्लोरेलिन एक लीटर प्रति हेक्टेयर 750 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव कर भूमि में मिलायें। जहां पलेवा कर के बुवाई की जानी हो वहां यह दवा बुवाई से पूर्व भूमि में मिला देना चाहिये, जबकि सूखी बुवाई की स्थिति में पहले फसल की बुवाई करें इसके बाद इस दवा का छिड़काव कर सिंचाई करें। राया की फसल में खरपतवार नियंत्रण हेतु आक्सीडाइजरिल 90 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर को 750 लीटर पानी में घोल कर बुवाई के 1-2 दिन बाद भी छिड़क सकते हैं। खरपतवार नाशी दवा का प्रयोग न करने पर बुवाई के 20-25 दिन बाद निराई-गुड़ाई कर खरपतवार निकाल देना चाहिये। प्याजी व जंगली पालक समस्या ग्रस्त खेतों में राया-गेहूं या राया-गेंहू-राया फसल चक्र अपनायें। जिन खेतों में औरोबन्की का प्रकोप हो गया हो तो औरोबन्की के पौधों को बीज बनने से पहले ही उखाड़ कर नष्ट करें एवं उन खेतों में फसल चक्र अपनायें तथा 3-4 वर्ष तक सरसों आदि फसलें जिस की जड़ों पर औरोबन्की पनपता हो न बोयें।

सिंचाई: राया को तीन सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। पहली सिंचाई शाखा फूटते समय 21 से 30 दिन पर, दूसरी फूल आना शुरू होने पर 40-45 दिन एवं तीसरी सिंचाई फली बनते समय 70-80 दिन पर करें। यदि मिट्टी बलुई है और पानी पर्याप्त मात्रा में हो तो चौथी सिंचाई दाना पकते समय 95 दिन की अवस्था पर दें। फव्वारा विधि द्वारा तीन सिंचाई बुवाई के 30, 45 व 75 दिन की अवस्था पर चार घण्टे फव्वारा चलाकर दें।

पाला (दावा) से बचाव: अधिक सर्दी के कारण वातावरण का तापमान हिमांक(पानी जमने) बिन्दु तक पहुंच जाता है। जिससे पौधों की कोशिका के अन्दर का पानी कोशिका से बाहर आ जाता है। जिससे कोशिका में पानी की कमी हो जाती है इसके साथ-साथ पौधे का जीवद्रव्य भी बहुत अधिक सर्दी के कारण विभक्त हो जाता है। इन दोनों कारणों से पौधा झुलस जाता है। कुछ वैज्ञानिकों का मत है कि सर्दी के कारण पौधों के भीतरी रिक्त स्थान में पानी जम जाता है जिससे आयतन बढऩे के कारण पौधें की कोशिका झिल्ली फट जाती है और पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाती हैं तथा पौधा झुलस जाता है। पाले से बचाने के लिये पाला पडऩे की सम्भावना हो तो खेत में हल्की सिंचाई कर दें। इसके अतिरिक्त रात के 12-2 बजे के आसपास खेत के किनारों पर घास-फूस जलाकर धुआं कर देने से भी पाले से बचाव होता है। गंधक के 0.1 प्रतिशत सान्द्रता वाले तेजाब का घोल छिड़कने से भी पाले से बचा जा सकता है। इसके लिए एक लीटर गंधक के तेजाब को 1000 लीटर पानी में मिलाकर फसल में 50 प्रतिशत फूल आने पर छिड़काव करें।

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