धान की बाली बनने के समय ब्लास्ट और जीवाणु झुलसा रोग का खतरा, जानें सही दवा और मात्रा
29 सितंबर 2026, नई दिल्ली: धान की बाली बनने के समय ब्लास्ट और जीवाणु झुलसा रोग का खतरा, जानें सही दवा और मात्रा – देश के अधिकांश धान उत्पादक राज्यों में इन दिनों फसल बाली बनने और दाना भरने की अवस्था में है, और यही वह समय है जब ब्लास्ट व जीवाणु झुलसा (बैक्टीरियल ब्लाइट) जैसी बीमारियां सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाती हैं। कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक, इस समय हल्की सी भी लापरवाही पूरी फसल को बर्बाद कर सकती है, इसलिए किसानों को खेत की नियमित निगरानी करने की सलाह दी जा रही है।
कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के मुताबिक ब्लास्ट रोग में पत्तियों और बाली की गर्दन पर धूसर रंग के धब्बे बन जाते हैं, जो बाद में पूरी बाली को सुखा देते हैं। वहीं जीवाणु झुलसा रोग में पत्तियों पर कत्थई रंग की धारियां बनती हैं, जो धीरे-धीरे पूरी पत्ती को झुलसा देती हैं। दोनों ही रोग नमी और लगातार बादल छाए रहने की स्थिति में तेजी से फैलते हैं।
ब्लास्ट रोग के लिए सही दवा और मात्रा
ब्लास्ट रोग की रोकथाम के लिए साइक्लाजोल 75 प्रतिशत डब्ल्यूपी दवा की 120 से 150 ग्राम मात्रा को 150 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करने की सलाह दी गई है। यह छिड़काव बाली निकलने से ठीक पहले और बाली निकलने के करीब दस दिन बाद, दो बार करना ज्यादा असरदार माना जाता है।
जीवाणु झुलसा रोग के लिए कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50 प्रतिशत डब्ल्यूपी दवा की 500 ग्राम मात्रा के साथ स्ट्रेप्टोसाइक्लिन की 15 से 20 ग्राम मात्रा मिलाकर 200 लीटर पानी में घोलना चाहिए। इस घोल का छिड़काव प्रति एकड़ खेत में करने से रोग के फैलाव पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है। विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि छिड़काव सुबह या शाम के समय करना चाहिए, जब तेज धूप न हो।
निगरानी और जल प्रबंधन भी जरूरी
विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ दवा के छिड़काव पर निर्भर रहना काफी नहीं है। खेत में जरूरत से ज्यादा पानी जमा न होने दें और नाइट्रोजन उर्वरक की मात्रा संतुलित रखें, क्योंकि अत्यधिक यूरिया के इस्तेमाल से पौधे कमजोर होकर रोगों के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो जाते हैं। खेत की नियमित निगरानी करके शुरुआती लक्षण दिखते ही उपचार शुरू करना सबसे कारगर उपाय है।
देश के कई हिस्सों में इस समय लगातार बादल छाए रहने और बीच-बीच में हल्की बारिश होने से खेतों में नमी का स्तर ऊंचा बना हुआ है, जो इन बीमारियों के फैलने के लिए अनुकूल माहौल बनाता है। इसी वजह से इंटरनेट पर भी इस समय धान की बाली में लगने वाले रोगों और उनके उपचार से जुड़ी जानकारी की खोज तेजी से बढ़ी है, क्योंकि हजारों किसान एक साथ इसी समस्या से जूझ रहे हैं।
कृषि वैज्ञानिकों ने आगाह किया है कि किसी भी दवा का इस्तेमाल हमेशा अनुशंसित मात्रा में ही करें, क्योंकि जरूरत से ज्यादा मात्रा फसल को नुकसान पहुंचा सकती है और लगातार एक ही दवा के इस्तेमाल से कीट-रोग में प्रतिरोधक क्षमता भी विकसित हो सकती है। छिड़काव करते समय हाथों में दस्ताने और मुंह पर मास्क पहनना भी जरूरी है, ताकि दवा के सीधे संपर्क से सेहत को कोई नुकसान न हो। दवा खरीदते समय हमेशा अधिकृत कृषि केंद्र से ही खरीदारी करने की सलाह दी जाती है, ताकि नकली या मिलावटी उत्पाद से बचा जा सके।
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