फसल की खेती (Crop Cultivation)

आलू के रोग एवं नियंत्रण

  • अरविन्द कुमार
  • डॉ. पंकज कुमार
    कीट विज्ञान विभाग, आचार्य नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्व विद्यालय कुमारगंज, अयोध्या

25 जनवरी 2022,  आलू के रोग एवं नियंत्रण –

पिछेती झुलसा

पहचान व हानि – आलू का पिछेता झुलसा रोग बेहद विनाशकारी है। आयरलैंड का भयंकर अकाल जो साल 1945 में पड़ा था, इसी रोग के द्वारा आलू की पूरी फसल तबाह हो जाने का ही नतीजा था। यह रोग उत्तर प्रदेश के मैदानी तथा पहाड़ी दोनों इलाकों में आलू की पत्तियों, शाखाओं व कंदों पर हमला करता है। जब वातावरण में नमी या बादल व कोहरा होने के कारण रोशनी कम हो जाती है और कई दिनों तक बरसात होती है, तब इस का प्रकोप पौधे की पत्तियों से शुरू होता है। पत्तियों की निचली सतहों पर सफेद रंग के गोले बन जाते हैं, जो बाद में भूरे व काले हो जाते हैं। पत्तियों के बीमार होने से आलू के कंदों का आकार छोटा हो जाता है और उत्पादन में कमी आ जाती है।

नियंत्रण
  • आलू की पत्तियों पर कवक का प्रकोप रोकने के लिए बोड्रेक्स मिश्रण या फ्लोटन का छिडक़ाव करें।
  • मेटालेक्सिल नामक फफूंदी नाशक की 10 ग्राम मात्रा को 10 लीटर पानी में घोल कर बीजों को आधे घंटे डुबा कर उपचारित करने के बाद छाया में सुखा बोआई करें।
  • आलू की फसल में कवकनाशी जैसे मैंकोजेब (75 फीसदी) का 0.2 फीसदी या क्लोरोथलोनील 0.2 फीसदी या मेटालेक्सिल 0.25 फीसदी या प्रपोनेब 70 फीसदी या डाइथेन जेड 78, या डाइथेन एम 45 0.2 फीसदी या ब्लाईटॉक्स 0.25 फीसदी क्या डिफोलटान और केप्टान 0.2 फीसदी के 4 से 5 का 10 से 15 दिनों के अंतराल पर छिडक़ाव प्रति हेक्टेयर करें।
अगेती झुलसा

पहचान व हानि– यह रोग आल्टनेरिया सोलेनाई नामक कवक द्वारा होता है। यह आलू का एक सामान्य रोग है, जो आलू फसल को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाता है। इस रोग के लक्षण पिछेती झुलसा से पहले यानी फसल बोने के 3-4 हफ्ते बाद पौधों की निचली पत्तियों पर छोटे-छोटे, दूर-दूर बिखरे हुए कोणीय आकार के चकत्तों या धब्बों के रूप में दिखाई देते हैं, जो बाद में कवक की गहरी हरीनली वृद्धि से ढक जाते हैं। ये धब्बे तेजी से बढ़ते हैं और ऊपरी पत्तियों पर भी बन जाते हैं। शुरू में बिन्दु के आकार के ये धब्बे तेजी से बढ़ते हैं और शीघ्र ही तिकोने, गोल या अंडाकार हो जाते हैं। आकार में बढऩे के साथ साथ इन धब्बों का रंग भी बदल जाता है और बाद में ये भूरे व काले रंग के हो जाते हैं। रोग का असर आलू के कंदों पर भी पड़ता है, कंद आकार में छोटे रह जाते हैं।

नियंत्रण
  • आलू के कंदों को मेन्कोजेब 0.2 प्रतिशत से उपचारित कर बोयें।
  • आलू की खुदाई के बाद खेत में छूटे रोगी पौधों के कचरे को इक_ा कर के जला दें।
  • फसल में बीमारी का प्रकोप दिखाई देने पर यूरिया 1 फीसदी व मैंकोजेब 0.2 फीसदी का छिडक़ाव प्रति हेक्टेयर की दर से करें।
ब्लैक स्कर्फ

पहचान व हानि- आलू के पौधों में ब्लैक स्कर्फ रोग का प्रभाव राइजोक्टोनिया सोलेनाई नामक फफूंद की वजह देखने को मिलता है। पौधों पर यह रोग किसी भी अवस्था में दिखाई दे सकता है, जो मौसम में अधिक तापमान और आर्द्रता के होने पर बढ़ता है। इस रोग के लगने पर पौधों पर काले उठे हुए धब्बे दिखाई देने लगते हैं। जो रोग बढऩे पर कंदों पर भी हो जाते हैं। जिसे कंद खाने योग्य नहीं रहते।

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नियंत्रण
  • इस रोग की रोकथाम के लिए खेत की गहरी जुताई करें।
  • प्रमाणित और रोगरोधी किस्म के कंदों का चयन करें।
  • कंदों की रोपाई से पहले उन्हें कार्बेन्डाजिम की उचित मात्रा से उपचारित करें।
आलू का स्कैब

पहचान व हानि- स्कैब रोग में फसल के पहले कोई लक्षण नहीं दिखाई देते हैं लेकिन रोग के प्रारंभिक चरण में हल्के भूरे से लेकर गहरे घाव तक खुरदरी परत दिखती है। यह रोग राइजोक्टोनिया सोलेनाई नामक फफूँद द्वारा होता है। बाद में, गंभीर रूप से संक्रमण होने के बाद आलू पर खुरदरी काली और गहरे रंग की परत पड़ जाती है। यह रोग आलू के कन्दों पर लगता है और देश के सभी मैदानी क्षेत्रों में पाया जाता है। इससे आलू की गुणवत्ता और बाजार मूल्य कम हो जाता है।

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नियंत्रण
  • रोगग्रस्त कन्द का उपयोग।
  • पोटाश उर्वरक की कमी।
  • स्वस्थ कन्द बीज का प्रयोग।
  • रोग मुक्त आलू का चयन करें।
  • हर साल खेत में एक ही समस्या होती है तो हरी खाद का इस्तेमाल करें इससे अगले सीजन में रोग की तीव्रता कम होगी।
  • क्षारीय मिट्टी में नाइट्रेट खाद नहीं दें।
  • रोपण के समय 20 किलो बोरिक एसिड दें।
  • खेत में पोटाश वाली खाद का संतुलित मात्रा में प्रयोग। खेत में हरी खाद अथवा पर्याप्त मात्रा में कम्पोस्ट डालकर ट्राइकोडर्मा (5 किग्रा/हे) का प्रयोग करें।

 

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