रबी फसलों में कीट -रोग प्रबंधन

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समन्वित खरपतवार नियंत्रण

खरपतवारों द्वारा विभिन्न फसलों में 20-60 प्रतिशत तक नुकसान होता है, साथ ही यह खेत में हानिकारक कीटों व रोगों का आश्रय स्थली का भी कार्य करते है।

रबी मौसम के खरपतवार 

एक दलीय (संकरी पत्ते वाले):

दूव, मोथा, प्याजी, जंगल जई, गेहूं का मामा।

द्विदलीय:

दूधी, लोनिया, चौलाई, मकई, खटुआ, सत्यानाशी, रसभरी, गााजरघास।

खरपतवार नियंत्रण की विधियाँ:

खरपतवारों का नियंत्रण फसलीय क्षेत्र में इस प्रकार किया जाये कि वे एक सीमा के अंदर रहे, ताकि फसलों को कम से कम हानि पहुंचायें

शस्य क्रियाओं द्वारा:

फसल की कटाई के पश्चात् गर्मी में गहरी जुताई करें ताकि तेज गर्मी व धूप से खरपतवारों की अंकुरण क्षमता नष्ट हो जाये।

यांत्रिक उपाय:

कतारों में बोयी गई फसलों में व्हील हो या हेन्ड हो आदि चलाकर खरपतवार नियंत्रण करें।

रसायनिक विधि:

शाकनाशी रसायनों की अनुसंशित मात्रा को लगभग 500 मीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर के मान से फ्लेट फेन नोजल लगाकर निर्धारित समय पर समान रूप से छिड़काव करें।

चने में उकठा या उगरा (विल्ट) रोग प्रबंधन

उकठा (विल्ट) रोग का प्रमुख लक्षण पौधों का सूखकर मरना है जो उकठा के साथ-साथ अन्य रोगों में भी प्रकट होता है अत: बचाव के लिये आवश्यक कदम उठायें।

पद सडऩ (कॉलर रॉट)

यह रोग स्कलेरोशियम रॉल्फसी फफूंद से होता है। रोग के कारण पौधों का हल्का पीला पडऩा और पौधे के स्तम्भ-मूल संधि (कॉलर भाग) में सिकुडऩ व सडऩ आरंभ होकर पौधे मरते हैं तथा प्रभावित भाग पर सफेद फफूंद दिखती है।

उकठा या उगरा (विल्ट) 

यह रोग फ्यूजेरियम आक्सीस्पोरम सिसेराई नामक फफूंद से होता है रोग के लक्षण नवम्बर में फूलों के आने पर स्पष्ट रूप में अधिक प्रकट होता है तीन से पांच सप्ताह के पौधे कमजोर होकर जमीन पर गिर जाते है लेकिन उनका रंग हरा रहता है किन्तु जड़ों को चीरने पर सह अंदर से काली निकलती है। छ: सप्ताह पुराने पौधे के नीचे की पत्तियां पीली हो जाती है बाद में सभी पत्तियॉं पीली होकर पौधा सूख जाता है बोआई व फूल आने के समय अधिक तापमान, भूमि में नमी एवं खाद की कमी तथा भूमि का खराब व अम्लीय होना जल विकास का उचित प्रबंध न होने से रोग अधिक लगता है।

शुष्क जड़ सडऩ (ड्राय रूट रॉट)

चने में यह बीमारी फूल आने व फलियॉं बनते समय आती है जो कि राइजोक्टोनिया वटाटिकोला नामक फफूंद से होता है।

रोगी पौधे सूखकर भूसी के रंग में हो जाते है तथा जड़े सूखकर कड़ी हो जाती है व आसानी सेे टूट जाती है पीली पत्तियॉं सूखकर मुड़ जाती है।

फसल
शाकनाशी
मात्रा कि.ग्रा. सक्रिय तत्व/हे.
प्रयोग
खरपतवार नियंत्रण
गेंहू 2,4-डी 1 से 1.5 किलो /हे. बुवाई के 30-35 चौड़ी पत्ती एवं मोथा कुल
  मेटासल्फ्यूरॉन मिथाइल 6 ग्राम दिन बाद  
  सल्फोसल्फ्यूरॉन 25 ग्राम बुवाई के 25-30 दिन संकरी पत्ती वाले
  आइसोप्रोट्यूरान 750 ग्राम बाद  
चना/मटर/मसूर पेंडीमिथालीन 1 लीटर बुवाई के बाद अंकुरण पूर्व संकरी पत्ती
  फ्लूक्लोरोलिन 2 लीटर बुवाई के ठीक पूर्व मिट्टी में संकरी एवं चौड़ी पत्ती वाले
      मिला दें  
  एलाक्लोर 1 किलोग्राम बुवाई के बाद अंकुरण घास कुल एवं चौड़ी
      से पूर्व पत्ती वाले

उकठा रोगों हेतु समेकित रोग प्रबंधन

  • ग्रीष्म में गहरी जुताई करें जिससे रोगकारकों के बीजाणु ऊपर आकर नष्ट हो जायें।
  • चना की बोआई 15 अक्टूबर से पूर्व न करें। फसलचक्र अपनायें जिसमें 3-4 साल तक चना न हो।
  • चना समतल खेत में लगाये जिसमें जल निकास का उचित प्रबंध हो। बोआई के समय भूमि में नमी की कमी नहीं होनी चाहिये साथ ही चने की फरवरी  मार्च में सिंचाई न करें।
  • मृदा में फास्फोरस की कमी होने पर उकठा रोग अधिक लगता हैं। मृृदा परीक्षण के उपरांत उर्वरकों की संस्तुत मात्रा का प्रयोग करें ।
  • उकठा प्रभावित क्षेत्र में चना व अलसी की अंतरवर्तीय फसल ( 2:2) पद्धति अपनायें।
  • थायरम तथा कार्बेन्डाजिम ( 2:1) के मिश्रण की 3 ग्राम मात्रा से प्रति किलोग्राम बीज को उपचारित करें अथवा पहले वीटावैक्स की 2 ग्राम मात्रा व फिर ट्राइकोडर्मा  विरीडी की चार ग्राम मात्रा से प्रति किलोग्राम बीज को उपचारित करें।
  • रोग प्रतिरोधक जातियों जैसे-जे. जी. 315, जे. जी. 130, जे.जी. 11, जे.जी. 16, जे.जी. 74 आदि को अपनायें।

चने में कीट प्रबंधन

दीमक :

दीमक सर्वव्यापी कीट है। ये जमीन में सुरंगे बनाते हैं और पौधों की जड़ों को खाते हंै। प्रकोप अधिक होने पर  ये तने को भी खा सकते हैै। नियंत्रण हेतु बीज का क्लोरोपाईरीफॉस 20 ईसी की 5 मि.ली. मात्रा  से प्रति कि.ग्रा. बीज का उपचार करें अथवा 2 लीटर क्लोरपाईरीफॉस 20 ईसी को 25 कि.ग्रा. रेत में  मिलाकर प्रति हैक्टर बिजाई के समय खेत में डालें।

फली छेदक कीट:

यह बहुभक्षी कीट है जो चने के अतिरिक्त अरहर, टमाटर आदि में भी नुकसान पहुंचाती है। छोटी इल्लियाँ पीली भूरे रंग की होती है जो पत्तियों के पर्णहरिम को खाती है व बड़ी इल्ली फूलों को खाती है तथा फली में छेदकर खाती है। फसल अवधि में 12-15 दिन या अधिक समय तक बदली रहने पर कीट प्रकोप अधिक होता है। इस कीट के द्वारा अनुकूल मौसम होने पर 60-70 प्रतिशत तक फसल की फलियों को नुकसान पहुॅचाया जाता है। बचाव/नियंत्रण हेतु चने की बुवाई 15 अक्टूबर से 15 नवम्बर के मध्य करें।

  • प्रकाश प्रपंचों को खेत के पास लगायें जिसमें कीटों की संख्या का पता लगाकर, फसल पर होने वाले कीटों के आक्रमण का पूर्वानुमान कर नियंत्रण किया जा सके।
  • फेरोमेन ट्रेप लगाकर नर कीटों को आकर्षित कर नष्ट करें जिससे कोटों की अगली पीढ़ी पर रोक लग सके तथा कीटों के आक्रमण का पूर्वानुमान लगाया जा सके।
  • खेत में पक्षियों के बैठने हेतु ‘टी’ (“T”) आकार की लकड़ी लगायें इन पर पक्षी बैठकर इल्लियों को खाकर फसल के सुरक्षा प्रदान करते हैं, ध्यान रहे कि दाना भरते समय इन ‘टी’ आकार की लकड़ी को निकाल दें।
  • 30-35 दिन की फसल पर नीम आधारित कीटनाषक या निम्बोली चूर्ण या नीम का तेल का 5 प्रतिषत का घोल बनाकर छिड़काव करें। तत्पश्चात जैविक कीटनाषी एन पी. व्ही. 250 एल.ई. या वैसीलस थूरिजियेन्सिस 1000 ग्राम का छिड़काव किया जा सकता हे।
  • प्रति मीटर इल्ली क्विनालफॉस/प्रोफेनोफॉस/मिथोमिल की 500 मिली. मात्रा प्रति एकड़ के मान से छिड़काव करें। इल्ली का अत्यधिक प्रकोप होने पर मिश्रित कीटनाशी प्रोफेनोफॉस 40 ई.सी. साइपरमेथ्रिन 4 ई.सी. की 400 मिली0 मात्रा प्रति एकड़ के मान से 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

सरसों, मटर, मसूर, आलू, धनिया में रोग-कीट नियंत्रण

रबी मौसम में सरसों, मटर, मसूर, आलू, धनियॉ की फसल प्रमुखता से ली जाती है इन फसलों में लगने वाले रोग व कीटों का समय पर नियंत्रण कर होने वाली हानि से बचाव कर उत्पादन में वृद्धि की जा सकती है।

अरहर की फली मक्खी:

इस कीट का मैगट फली के अंदर के दानों को खाकर नष्ट करती है कभी-कभी समस्त फलियां कीटग्रस्त हो जाती है। कीट नियंत्रण हेतु डायमिथिएट या मिथाइल डिमेटान की 400 मि.ली. मात्रा 200 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ के मान से छिड़काव करें।

मसूर/सरसों का माहू:

इस कीट के निम्फ पौधो के कोमल भागों का रस चूसते है जिससे पौधे कमजोर हो जाते हैं, पुष्पन अवस्था पर इसका प्रकोप अधिक होता है। नियंत्रण हेतु खेत की प्रथम/किनारे की लाइन में माहो का निरीक्षण कर प्रकोपित पौधों की टहनियों का तोड़कर नष्ट करें। अत्यधिक प्रकोप की दशा में मिथाइल डिमेटान 300 मिली. अथवा इमिडाक्लोप्रिड की 60 मिली. को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ के मान से छिड़काव करें।

आलू में झुलसन रोग:

आलू, टमाटर में पश्रियॉ किनारे से सूखकर काली पड़ जाती है अधिक प्रकोप की दशा में पूरा पौधा सूख जाता है। नियंत्रण हेतु मेंकोजेब की 500 ग्राम मात्रा 200 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ के मान से छिड़काव करें।

मटर व धनिया का पाउडरी मिल्डयू रोग:

इस रोग में पश्रियों व सम्पूर्ण पौधो पर सफेद पाउडर सा छा जाता है जो वास्तव में रोग कारक फफूंद के बीजाणु होते है रोग का प्रकोप होने से पौधे की पश्रियॉ सूख जाती है नियंत्रण हेतु सल्फेक्स/1 कार्बेन्डाजिम ग्राम अथवा घुलनशील सल्फर की 2 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

 

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