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फसल की खेती (Crop Cultivation)

मूंग उत्पादन तकनीक

लेखक- अभिषेक कुमार, डॉ. दयानंद, डॉ. रशीद खान, डॉ. प्रदीप कुमार, कृषि विज्ञान केंद्र, आबूसर, झूंझुनू
08 जुलाई 2024, भोपाल:
मूंग उत्पादन तकनीक –

बीज दर व बीज उपचार – खरीफ में कतार विधि से बुआई हेतु मूंग 20 कि.ग्रा./हे. पर्याप्त होता है। बसंत अथवा ग्रीष्मकालीन बुआई हेतु 25-30 कि.ग्रा/हे. बीज की आवश्यकता पड़ती है। बुवाई से पूर्व बीज को कार्बेन्डाजिम+ केप्टान (1+2) 3 ग्राम दवा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें।
बुवाई का तरीका
वर्षा के मौसम में इन फसलों से अच्छा उत्पादन प्राप्त करने हेतु हल के पीछे पंक्तियों अथवा कतारों में बुवाई करना उपयुक्त रहता है। खरीफ फसल के लिए कतार से कतार की दूरी 30-55 से.मी. तथा बसंत (ग्रीष्म) के लिए 20-22.5 से.मी. रखी जाती है पौधे से पौधे की दूरी 10-15 से.मी. रखते हुए 5 से.मी. की गहराई पर बोयें।

उपयुक्त जलवायु – मूंग के लिए नम एवं गर्म जलवायु कि आवश्यकता होती है। इसकी खेती वर्षा ऋतु में की जा सकती है। इसकी वृद्धि एवं विकास के लिए 25-32 डिग्री सेल्सियस तापमान अनुकूल पाया गया है। मूंग के लिए 75-90 से.मी. वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्र उपयुक्त पाए गए है। पकने के समय साफ मौसम तथा 60 प्रतिशत आर्द्रता हो। पकाव के समय अधिक वर्षा हानिप्रद होती है।

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उपर्युक्त भूमि – मूंग की खेती के हेतु दोमट से बलुआ दोमट भूमियां जिनका पी.एच. 7.0 से 7.5 हो, इसके लिए उत्तम है। खेत में जल निकास उत्तम हो।

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भूमि की तैयारी – खरीफ की फसल हेतु एक गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें एवं वर्षा प्रारम्भ होते ही 2-3 बार देशी हल या कल्टीवेटर से जुताई कर खरपतवार रहित करने के उपरांत खेत में पाटा चलाकर समतल करें। दीमक से बचाव के लिए क्लोरो-पायरीफॉस 1.5 प्रतिशत चूर्ण 20-25 कि. ग्रा./हेक्टेयर ले मान से खेत की तैयारी के समय मिट्टी में मिलायें। ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती के लिए रबी फसलों के कटने के तुरंत बाद खेत की तुरंत जुताई कर 5-5 दिन छोड़कर पलेवा करें। पलेवा के बाद 2-3 जुताईयां देशी हल या कल्टीवेटर से कर पाटा लगाकर खेत को समतल एवं भुरभुरा बनायें। इससे उसमें नमी संरक्षित हो जाती है व बीजों से अच्छा अंकुरण मिलता है।

खाद एवं उर्वरक – मूंग की खेती में अच्छे उत्पादन के लिए बुवाई से पूर्व खेत तैयार करते समय अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद 15-20 टन/एकड़ की दर से मिट्टी में मिला दें। रासायनिक खाद एवं उर्वरक की मात्रा किलोग्राम/हे. हो, नाइट्रोजन 20, फास्फोरस 20, पोटाश 20, गंधक 20, जिंक 20, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस व पोटाश उर्वरकों की पूरी मात्रा बुवाई के समय 5-10 से.मी. गहरी कूड़ में आधार खाद के रूप में दें।

खरपतवार नियंत्रण – मूंग की फसल में नींदा नियंत्रण सही समय पर नहीं करने से फसल की उपज में 50-60 प्रतिशत तक की कमी हो सकती है। खरीफ मौसम में फसलों में सकरी पत्ती वाले खरपतवार जैसे: सांवा, दूब घास एवं चौड़ी पत्ती वाले पत्थर चटा, कनकवा, महकुआ, सफेद मुर्ग, हजारदाना एवं लहसुआ तथा मोथा आदि वर्ग के खरपतवार बहुतायत निकलते हैं। फसल व खरपतवार की प्रतिस्पर्धा की क्रान्तिक अवस्था मूंग में प्रथम 30 से 35 दिनों तक रहती है। इसलिए प्रथम निंदाई-गुड़ाई 15-20 दिनों पर तथा द्वितीय 35-50 दिन पर करें। खरपतवारनाशक पेंडीमिथालीन 700 ग्राम/हेक्टेयर बुवाई के 0-3 दिन तक, क्युजालोफाप 50-50 ग्राम बुवाई के 15-20 दिन बाद छिड़काव कर सकते है।

सिंचाई एवं जल निकास – प्राय: वर्षा ऋतु में मूंग की फसल को सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है फिर भी इस मौसम में एक वर्षा के बाद दूसरी वर्षा होने के बीच लंबा अंतराल होने पर अथवा नमी की कमी होने पर फलियां बनते समय एक हल्की सिंचाई आवश्यक होती है। बसंत एवं ग्रीष्म ऋतु में 10-15 दिन के अंतराल पर सिंचाई की आवश्यकता होती है। फसल पकने के 15 दिन पूर्व सिंचाई बंद कर दें। वर्षा के मौसम में अधिक वर्षा होने पर अथवा खेत में पानी का भराव होने पर फालतू पानी को खेत से निकालते रहें जिससे मृदा में वायु संचार बना रहता है।


कटाई – मूंग की फलियों जब काली पडऩे लगे तथा सूख जाये तो फसल की कटाई कर लें। अधिक सूखने पर फलियों चिटकने का डर रहता है। फलियों से बीज को थ्रेसर द्वारा या डंडे द्वारा अलग कर लिए जाता है।

भण्डारण – कटाई और गहाई करने के बाद दानों को अच्छी तरह धूप में सुखाने के उपरान्त ही जब उसमें नमी की मात्रा 8 से 10 प्रतिशत रहे तभी वह भण्डारण के योग्य रहती है। भण्डारण के सूत के बोरे का उपयोग करे और नमी रहित स्थान पर रखें।

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