मिर्च की प्रमुख बीमारियाँ एवं उनका समेकित प्रबंधन
लेखक- डॉ नारायण पंडित गुरव सहेयक प्रोफेसर, श्री वैष्णव कृषि संस्थान, श्री वैष्णव विद्यापीठ विश्वविद्यालय, इंदौर
13 अप्रैल 2026, नई दिल्ली: मिर्च की प्रमुख बीमारियाँ एवं उनका समेकित प्रबंधन – मिर्च विश्व की प्रमुख मसाला एवं सब्जी फसलों में से एक है। भारत मिर्च का सबसे बड़ा उत्पादक, उपभोक्ता तथा निर्यातक देश है, जो विश्व के कुल उत्पादन में लगभग 40 प्रतिशत का योगदान देता है। मिर्च सोलानेसी कुल की महत्वपूर्ण फसल है, जिसे विश्वभर में व्यापक रूप से उगाया जाता है। इसका उपयोग विभिन्न व्यंजनों में तीखापन, रंग तथा स्वाद बढ़ाने के लिए किया जाता है, जिससे इसकी आर्थिक महत्ता अत्यधिक बढ़ जाती है।
हालाँकि मिर्च की खेती अत्यधिक लाभदायक है, फिर भी विभिन्न रोगों के कारण इसकी उपज एवं गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। मिर्च की फसल में मुख्यतः कवक (फफूंद), जीवाणु, विषाणु तथा नेमाटोड जनित रोग पाए जाते हैं, जिनसे उपज में भारी कमी आ सकती है। इन रोगों के प्रभावी नियंत्रण हेतु समेकित रोग प्रबंधन (Integrated Disease Management – IDM) अपनाना अत्यंत आवश्यक है।
नीचे मिर्च की प्रमुख बीमारियों तथा उनके प्रबंधन उपायों का विवरण दिया गया है।
1. पौध गलन (Damping off)
पौध गलन मिर्च की नर्सरी में पाया जाने वाला एक गंभीर मृदा जनित रोग है, जो पौधों को प्रारंभिक अवस्था में ही नष्ट कर देता है। यह रोग मुख्यतः मृदा जनित फफूंद जैसे पाइथियम (Pythium), फाइटोफ्थोरा (Phytophthora) तथा राइजोक्टोनिया सोलानी (Rhizoctonia ) के कारण होता है। यह रोग बीज तथा मिट्टी के माध्यम से फैलता है और अंकुरित पौधों को तेजी से प्रभावित करता है।
पहचान (लक्षण)
• बीज अंकुरित नहीं होते या अंकुरण के बाद सड़ जाते हैं।
• छोटे पौधे मिट्टी की सतह के पास से पतले होकर गिर जाते हैं।
• पौधों का तना मुलायम होकर गल जाता है।

रोग प्रबंधन
(i) बीज उपचार
- बुवाई से 24 घंटे पहले बीजों को ट्राइकोडर्मा (Trichoderma) @ 4 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज से उपचारित करें।
या - प्स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस (Pseudomonas fluorescens) @ 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज से उपचार करें।
या
- रासायनिक उपचार हेतु थिरम (Thiram) या कैप्टान (Captan) @ 4 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज का प्रयोग करें।
(ii) जैविक उपचार
- प्स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस @ 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर को 50 किलोग्राम गोबर की खाद (FYM) में मिलाकर मिट्टी में प्रयोग करें।
(iii) रासायनिक नियंत्रण (नर्सरी ड्रेंचिंग)
• मेटालेक्सिल + मैनकोजेब (Metalaxyl 8% + Mancozeb 64% WP)
- 2–3 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाएं।
- लगभग 3–4 लीटर घोल प्रति वर्ग मीटर नर्सरी क्षेत्र में ड्रेंचिंग करें।
या
• कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (Copper oxychloride 50 WP)
* 2–3 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाएं।
* लगभग 3–4 लीटर घोल प्रति वर्ग मीटर नर्सरी क्षेत्र में ड्रेंचिंग करें।
प्रयोग का समय (Nursery Management Schedule)
• पहली ड्रेंचिंग (दवा पानी में घोलकर जड़ के पास डालना) – बीज अंकुरण के तुरंत बाद
• दूसरी ड्रेंचिंग – 7–10 दिन बाद (यदि रोग का प्रकोप दिखाई दे)
(iv) नर्सरी प्रबंधन
• नर्सरी में पानी का जमाव न होने दें।
• अधिक घनी बुवाई से बचें।
• नर्सरी धूप वाले स्थान पर तैयार करें।
• संतुलित सिंचाई करें, अत्यधिक नमी रोग को बढ़ाती है।
• उपचारित एवं प्रमाणित बीज का उपयोग करें।
2. एन्थ्रेक्नोज (धब्बा रोग) एवं फल सड़न
एन्थ्रेक्नोज मिर्च का एक प्रमुख फफूंदजनित रोग है, जो पौधों की वृद्धि, फूल बनने की प्रक्रिया तथा फलों की गुणवत्ता को प्रभावित करता है। यह रोग मुख्यतः कोमल टहनियों, फूलों तथा फलों पर आक्रमण करता है, जिससे उपज एवं बाजार मूल्य दोनों में कमी आती है।
पहचान (लक्षण)
• कोमल टहनियों का ऊपरी भाग सूख जाता है, जिसे डाई-बैक कहा जाता है।
• संक्रमण प्रायः फूल आने की अवस्था में शुरू होता है।
• संक्रमित फूल सूखकर गिर जाते हैं।
• फूलों के डंठल सिकुड़कर सूख जाते हैं।
• फलों पर धँसे हुए काले धब्बे बनते हैं, जिससे फल सड़ने लगते हैं।

रोग प्रबंधन
(i) बीज का चयन
• स्वस्थ एवं रोगमुक्त बीज का उपयोग करें।
(ii) बीज उपचार
• थिरम (Thiram) या कैप्टान Captan (बीज उपचार के लिए उपयोगी फफूंदनाशी दवा) @ 4 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज से उपचार करें।
(iii) रासायनिक नियंत्रण (छिड़काव)
निम्न में से किसी एक फफूंदनाशक का छिड़काव करें –
• कार्बेन्डाजिम 12% + मैंकोजेब 63% डब्ल्यूपी (Carbendazim 12% + Mancozeb 63% WP)
यह एक मिश्रित फफूंदनाशक है। इसे 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
या
• एज़ोक्सीस्ट्रोबिन 18.2% + डाइफेनोकोनाज़ोल 11.4% एससी (Azoxystrobin 18.2% + Difenoconazole 11.4% SC) इसे 1 मिली प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।
छिड़काव का समय
• पहला छिड़काव – फूल आने से पहले
• दूसरा छिड़काव – फल बनने की अवस्था में
• तीसरा छिड़काव – 15 दिन बाद
3. मिर्च का मुरझान (उकठा) रोग ( Fusarium Wilt)
मिर्च का उकठा एक गंभीर मृदा जनित रोग है, जो फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरम नामक फफूंद के कारण होता है। यह रोग पौधों की जड़ों एवं संवहनी ऊतकों को प्रभावित करता है, जिससे पौधे धीरे-धीरे मुरझाकर सूख जाते हैं।
पहचान (लक्षण)
• पौधों का मुरझाना इस रोग का प्रमुख लक्षण है।
• पत्तियाँ ऊपर की ओर मुड़कर अंदर की तरफ लुढ़क जाती हैं।
• पत्तियाँ पीली होकर सूख जाती हैं।
• खेत में कुछ स्थानों पर अधिक पौधे एक साथ सूख जाते हैं।
• तने एवं जड़ों के अंदर संवहनी भाग भूरा हो जाता है।

रोग प्रबंधन
(i) प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग
• रोग प्रतिरोधी किस्मों का चयन करें।
(ii) बीज उपचार
• ट्राइकोडर्मा विरिडे @ 4 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज, यह एक जैविक फफूंदनाशी (Biofungicide) है, जो मिट्टी में मौजूद हानिकारक फफूंद (जैसे फ्यूजेरियम, राइजोक्टोनिया, पिथियम) को नियंत्रित करने में मदद करता है।
या
•कार्बेन्डाजिम (एक प्रभावी फफूंदनाशी दवा) @ 2 ग्राम प्रति किलोग्राम से बीज उपचार करें।
(iii) जैविक उपचार
• ट्राइकोडर्मा विरिडे 2 किलोग्राम को 50 किलोग्राम गोबर की खाद में मिलाकर 15 दिन तक ढककर रखें, बाद में खेत में प्रयोग करें।
(iv) रासायनिक नियंत्रण (ड्रेंचिंग)
निम्न में से किसी एक का प्रयोग करें –
- कार्बेन्डाजिम (Carbendazim) 50 WP – 1 ग्राम प्रति लीटर पानी
• टेबुकोनाज़ोल (Tebuconazole) + ट्राइफ्लॉक्सीस्ट्रोबिन (Trifloxystrobin) – 0.5 ग्राम प्रति लीटर पानी
• थायोफेनेट मिथाइल (Thiophanate methyl) 70 WP – 1 ग्राम प्रति लीटर पानी
- प्रति पौधा 100–200 मिली घोल जड़ के पास डालें।
अतिरिक्त सावधानियाँ
• रोगग्रस्त पौधों को निकालकर नष्ट करें।
• खेत में जल जमाव न होने दें।
• फसल चक्र अपनाएँ।
4. मिर्च का पत्ती मुड़न रोग ( लीफ कर्ल रोग)
लीफ कर्ल रोग Chilli leaf curl virus (ChiLCV) के कारण होता है। यह रोग मुख्यतः सफेद मक्खी (Bemisia tabaci) द्वारा फैलता है। गर्म एवं शुष्क मौसम में सफेद मक्खी की संख्या बढ़ने से रोग का प्रकोप अधिक होता है।
पहचान (लक्षण)
• पत्तियाँ मुड़कर सिकुड़ जाती हैं तथा विकृत हो जाती हैं।
• पौधों की वृद्धि रुक जाती है।
• पौधे छोटे रह जाते हैं।
• फूल की कलियाँ गिर जाती हैं।

रोग प्रबंधन
(i) सांस्कृतिक उपाय
• रोगग्रस्त पौधों को उखाड़कर नष्ट करें।
• एक ही खेत में लगातार मिर्च की खेती न करें।
• रोगमुक्त बीज का उपयोग करें।
• पीले चिपचिपे ट्रैप लगाएँ।
(ii) जैविक नियंत्रण
• नीम तेल 2–3 मिली प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।
• ब्यूवेरिया बैसियाना (Beauveria bassiana) को 5–10 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।
(iii) रासायनिक नियंत्रण
सफेद मक्खी नियंत्रण हेतु निम्न में से किसी एक का छिड़काव करें –
• थायमेथोक्साम (Thiamethoxam) 25 WG @ 0.25 ग्राम प्रति लीटर पानी
(लगभग 50–60 ग्राम प्रति एकड़)
• इमिडाक्लोप्रिड (Imidacloprid) 17.8 SL @ 0.3 मिली प्रति लीटर पानी
(लगभग 60–70 मिली प्रति एकड़)
• डाइमेथोएट (Dimethoate) 30 EC @ 1 मिली प्रति लीटर पानी
(लगभग 200 मिली प्रति एकड़)
जड़ गांठ सूत्रकृमि (निमेटोड)
मिर्च की फसल में जड़ गांठ सूत्रकृमि (Meloidogyne incognita) एक महत्वपूर्ण कीट है, जिससे लगभग 11–35% तक उत्पादन हानि हो सकती है। यह कीट मिट्टी में रहता है और पौधों की जड़ों में गांठें बनाता है।
फैलाव कैसे होता है
यह सूत्रकृमि निम्न माध्यमों से फैलता है:
- संक्रमित नर्सरी के पौध (seedlings)
- रोपण सामग्री
- सिंचाई का पानी
- खेती के उपकरण
- संक्रमित मिट्टी
लक्षण (Symptoms)
1️⃣ जमीन के ऊपर दिखाई देने वाले लक्षण (Above ground symptoms)
- पौधे की वृद्धि रुक जाती है (ठिगने रह जाते हैं)
- खेत में टुकड़ों (patches) में रोग दिखाई देता है
- पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं
- पत्तियाँ छोटी रह जाती हैं
- पौधों में कमजोर वृद्धि
- दिन के समय पौधे मुरझाए हुए दिखाई देते हैं
2️⃣ जमीन के नीचे जड़ों में दिखाई देने वाले लक्षण (Below ground symptoms)
- जड़ों में छोटी-छोटी गांठें (galls) बनती हैं
- ये छोटी गांठें मिलकर बड़ी गांठों का रूप ले लेती हैं
- जड़ प्रणाली कमजोर और अव्यवस्थित हो जाती है
- पौधे की जड़ों का विकास रुक जाता है
- कई बार इन गांठों पर दूसरे रोगजनक (फफूंद/बैक्टीरिया) हमला कर देते हैं, जिससे जड़ सड़ने (root rot) लगती है

प्रबंधन
1️. खेती से जुड़े उपाय
- हर साल एक ही खेत में मिर्च न लगाएं, बीच में गेहूं, मक्का या धान जैसी फसल लें
- गर्मी के मौसम में गहरी जुताई करें, इससे कीट धूप से मर जाते हैं
- खेत में पानी जमा न होने दें
- हमेशा स्वस्थ पौध ही लगाएं
2. जैविक (बायोलॉजिकल) उपाय
- ट्राइकोडर्मा विरिडे : 2–2.5 किलो प्रति एकड़ गोबर की खाद में मिलाकर खेत में डालें
या
- पैसिलोमाइसिस लिलेसिनस (Paecilomyces lilacinus) 2 किलो प्रति एकड़ उपयोग करें
या
- पौध रोपाई से पहले जड़ों को ट्राइकोडर्मा 5 ग्राम प्रति लीटर पानी में 20–30 मिनट डुबोएं
3. जैविक खाद का उपयोग
- नीम खली 200–400 किलो प्रति एकड़ खेत में मिलाएं
- नीम खली डालने से सूत्रकृमि की संख्या कम होती है और पौधे मजबूत बनते हैं
4. रासायनिक नियंत्रण (अधिक प्रकोप होने पर)
- कार्बोफ्यूरान (Carbofuran) 3G @ 8–10 किलो प्रति एकड़ रोपाई के समय मिट्टी में डालें
या
- फोरेट (Phorate) 10G @ 8–10 किलो प्रति एकड़ उपयोग कर सकते हैं
ध्यान रखने योग्य बातें
- रोगमुक्त पौध ही लगाएं
- खेत में जलभराव न होने दें
- जैविक खाद का उपयोग बढ़ाएं
- फसल चक्र अपनाएं
निष्कर्ष
मिर्च की फसल में विभिन्न प्रकार के रोग उपज एवं गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। अतः किसानों को समेकित रोग प्रबंधन (IDM) अपनाना चाहिए, जिसमें स्वस्थ बीज, बीज उपचार, जैविक एवं रासायनिक नियंत्रण तथा उचित कृषि क्रियाएँ शामिल हों। समय पर रोग की पहचान एवं नियंत्रण उपाय अपनाने से मिर्च की फसल को सुरक्षित रखा जा सकता है तथा अधिक उत्पादन एवं बेहतर गुणवत्ता प्राप्त की जा सकती है।
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