फसल की खेती (Crop Cultivation)

खेत में जिंक की कमी की पहचान कैसे करें? ये संकेत दिखें तो तुरंत करें उपचार

22 जून 2026, नई दिल्ली: खेत में जिंक की कमी की पहचान कैसे करें? ये संकेत दिखें तो तुरंत करें उपचार – भारतीय कृषि में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की चर्चा तो अक्सर होती है, लेकिन सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को लेकर किसानों के बीच जागरूकता अभी भी सीमित है। यही कारण है कि कई बार खेत में फसल की वृद्धि रुक जाती है, पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं और उत्पादन घट जाता है, जबकि किसान इसे रोग या कीट का हमला समझते रहते हैं। वास्तव में ऐसी कई समस्याओं के पीछे जिंक की कमी जिम्मेदार होती है।

देश के अनेक राज्यों में लगातार रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित उपयोग, जैविक खादों की घटती मात्रा और उच्च उत्पादकता वाली किस्मों के बढ़ते उपयोग के कारण जिंक की कमी तेजी से बढ़ रही है। धान, गेहूं, मक्का, सोयाबीन और कपास जैसी प्रमुख फसलों में यह समस्या व्यापक रूप से देखी जा रही है।

जिंक पौधों में एंजाइम गतिविधियों, प्रकाश संश्लेषण, वृद्धि हार्मोन निर्माण और प्रोटीन संश्लेषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसकी कमी होने पर नई पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं जबकि नसें हरी दिखाई देती हैं। कई फसलों में पत्तियों पर सफेद या पीले धब्बे बन जाते हैं। धान में इसे “खैरा रोग” जैसी स्थिति से भी जोड़ा जाता है।

जिंक की कमी केवल पौधों की वृद्धि को प्रभावित नहीं करती बल्कि उत्पादन क्षमता को भी कम कर देती है। पौधों की ऊंचाई घट जाती है, जड़ विकास कमजोर हो जाता है और दानों या फलियों की संख्या कम हो सकती है। यही कारण है कि जिंक की कमी को प्रारंभिक अवस्था में पहचानना आवश्यक है।

विशेषज्ञों के अनुसार जिंक सल्फेट का मिट्टी में उपयोग सबसे प्रभावी उपाय माना जाता है। इसके अलावा केलेटेड जिंक उत्पादों का उपयोग पर्णीय छिड़काव और फर्टिगेशन के माध्यम से भी किया जा सकता है। हालांकि सबसे बेहतर तरीका मृदा परीक्षण कराना है ताकि वास्तविक आवश्यकता के अनुसार जिंक की मात्रा निर्धारित की जा सके।

कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले वर्षों में सूक्ष्म पोषक तत्वों का प्रबंधन उतना ही महत्वपूर्ण होगा जितना आज एनपीके प्रबंधन माना जाता है। जो किसान समय पर जिंक की कमी की पहचान कर उसका समाधान करते हैं, वे बेहतर उत्पादन और गुणवत्ता दोनों प्राप्त कर सकते हैं।

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