मोठ की खेती

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भूमि एवं तैयारी
मोठ की खेती हल्की भूमियों में अच्छी होती है, मोठ के लिए बलुई दोमट एवं बलुई भूमि उत्तम होती है, भूमि में जल निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिए, मोठ की खेती के लिए दो बार हेरों से जुताई कर पाटा लगा देना चाहिए तथा एक जुताई कल्टीवेटर से करना उचित रहता है।

पश्चिमी राजस्थान में उगाई जाने वाली दलहनी फसलों में मोठ प्रमुख फसल है। इसमें सूखा सहन करने की क्षमता अन्य दलहनी फसलों की अपेक्षा अधिक होती है, इसकी जड़ें अधिक गहराई तक जा कर भूमि से नमी प्राप्त कर लेती है, राजस्थान के पश्चिमी क्षेत्र में मोठ की पैदावार राज्य की कुल पैदावार का 99 प्रतिशत होती है, मोठ की औसत उपज 338 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के लगभग है, उन्नत तकनीकों द्वारा खेती करने पर 25 से 60 प्रतिशत तक अधिक पैदावार प्राप्त की जा सकती है।

बीज एवं बुवाई
उन्नत किस्म का उपचारित बीज बुवाई के लिए उपयोग में लेना चाहिए। मोठ की बुआई 15 जुलाई तक कर देनी चाहिए लेकिन शीघ्र पकने वाली किस्मों की बुवाई 30 जुलाई तक की जा सकती है। मोठ की बुवाई पंक्तियों से पंक्तियों की दूरी 45 सेंटीमीटर रखते हुए करनी चाहिए।


उन्नत किस्में
आरएमओ -40, आरएमओ – 225, काजरी मोठ – 2, काजरी मोठ – 3, आरएमओ – 257
फसल चक्र
अधिक उपज प्राप्त करने एवं भूमि की उर्वरा शक्ति बनाए रखने के लिए उचित फसल चक्र अपनाना चाहिए। वर्षा आधारित क्षेत्रों में मोठ -बाजरा फसल चक्र उचित रहता है।
खाद एवं उर्वरक
मोठ दलहनी फसल होने के कारण इसे नाइट्रोजन की कम मात्रा की आवश्यकता होती है। एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए 20 किलोग्राम नाइट्रोजन व 40 किलोग्राम फास्फोरस की आवश्यकता होती है। मोठ के लिए समन्वित पोषक प्रबंधन उचित रहता है। इसके लिए खेत की तैयारी के समय 2.5 टन गोबर या कंपोस्ट की मात्रा भूमि में अच्छी प्रकार से मिला देनी चाहिए। इसके उपरांत बुवाई के समय 44 किलो डीएपी एवं 5 किलोग्राम यूरिया भूमि में मिला देना चाहिएद्य बुवाई से पहले 600 ग्राम राइजोबियम कल्चर को 1 लीटर पानी व 250 ग्राम गुड़ के घोल में मिलाकर बीज को उपचारित कर छाया में सूखाकर बोना चाहिए।
खरपतवार नियंत्रण
मोठ की फसल को खरपतवार बहुत हानि पहुंचाते हैं। खरपतवार नियंत्रण के लिए बाजार में उपलब्ध पेंडीमिथालीन (स्टॉम्प) की 3.30 लीटर मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से समान रूप से छिड़काव कर देना चाहिए। फसल जब 25-30 दिन की हो जाए तो एक गुड़ाई कस्सी से कर देनी चाहिए। यदि मजदूर उपलब्ध न हो तो इसी समय इमेजीथाईपर (परसूट) की बाजार में उपलब्ध 750 मिली मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव कर देना चाहिए।
बीज उत्पादन
किसान अपने घर पर भी अच्छी किस्म के बीज का उत्पादन कर सकते हैं। खेत के चयन के समय कुछ सावधानियां रखनी चाहिए। पिछले साल इस खेत में मोठ नहीं उगाया गया हो। भूमि में जल निकास की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए। प्रमाणित बीज के लिए खेत के चारों ओर 10 से 20 मीटर तक मोठ का कोई खेत नहीं होना चाहिए।
खेत की तैयारी बीज एवं उसकी बुवाई, पोषक प्रबंधन, खरपतवार नियंत्रण, रोग एवं कीट नियंत्रण का विशेष ध्यान रखना चाहिए। बीज के लिए लाटा काटते समय खेत के चारों तरफ 5 से 10 मीटर छोड़कर फसल की कटाई करनी चाहिए। लाटे को खलीहान में अलग सूखाना चाहिए एवं दाने को फलियों से निकालकर अच्छी प्रकार सूखाना चाहिए जिससे 6-9 प्रतिशत से अधिक नमी न रहे। इसके बाद बीज को ग्रेडिंग कर उपचारित कर लेना चाहिए तथा लोहे की टंकी में भरकर भंडारी कर देना चाहिए। इस बीज को किसान अगले वर्ष बुआई के लिए उपयोग कर सकते हैं।
कटाई एवं गहाई
जब मोठ की फलियां पक कर भूरी हो जाए तथा पौधा पीला पड़ जाए तो फसल की कटाई कर लेनी चाहिए। लाटे को अच्छी प्रकार सूखने के पश्चात थ्रेसर द्वारा दाने को अलग कर लिया जाता है।
उपज
मोठ की उन्नत तकनीकों द्वारा खेती करने पर 6 से 8 क्विंटल दाने की उपज प्रति हैक्टेयर प्राप्त की जा सकती है।

  • केसरमल चौधरी द्य शांति देवी बम्बोरिया
  • जितेंद्र सिंह बम्बोरिया
  • सुमित्रा देवी बम्बोरिया द्य सुशीला ऐचरा
  • डॉ. शंकर लाल गोलाडा
  • जगदीश प्रसाद तेतरवाल
    email : sandeeph64@gmail.com
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