फसल की खेती (Crop Cultivation)

जैव पौष्टिकीकृत खाद्य फसलों से निदान

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लेखक- डॉ. संदीप शर्मा

02 जुलाई 2024, खरगोन: जैव पौष्टिकीकृत खाद्य फसलों से निदान –

कुपोषण कबायो फोर्टिफिकेशन क्या है

बायो फोर्टिफिकेशन शब्द दो शब्दों यथा ‘बायो’ (ग्रीक शब्द) और लैटिन शब्द ‘फोर्टिफेयर’ से मिलकर बना है। बायो का अर्थ है जीवन या जैव जबकि फोर्टिफेयर का अर्थ है सुदृढ़ता प्रदान करना। खाद्य फसलों में उपलब्ध पोषक तत्वों की मात्रा में वृद्धि करना इसका प्रमुख उद्देश्य है। जैव पौष्टिकीकरण एक टिकाऊ, अपेक्षाकृत सस्ता तथा लम्बे समय तक चलने वाली विधि है जिसका लाभ सुदूर स्थित ग्रामीण जनसंख्या तक सरलता से पहुँचाया जा सकता है। अंग्रेज विचारक एवं अर्थशास्त्री एडम स्मिथ (1723-1790) के अनुसार किसी भी राष्ट्र की सम्पदा उसके निवासियों के स्वास्थ्य, पोषण, कार्यकुशलता तथा उनके ज्ञान पर निर्भर करती है। सन् 2021 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार भारत की 4 प्रतिशत जीडीपी तथा 8 प्रतिशत तक कार्यक्षमता बच्चों में कुपोषण के कारण कम हो जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अनुमान के अनुसार जैव पौष्टिकीकरण से सम्पूर्ण विश्व के लगभग दो करोड़ कुपोषित लोगों को लाभान्वित किया जा सकता है। जैव पौष्टिकीकरण सूक्ष्म पोषक तत्व की उपलब्धता सुनिश्चित करने की दीर्घावधि कार्य नीति है तथा सूक्ष्म पोषक तत्व आधारित कुपोषण के निदान का एक प्रभावी साधन है। लक्षित लोगों द्वारा जैव पौष्टिकीकृत अनाज/सब्जियों का नियमित सेवन उनके स्वास्थ सुधार में सक्षम है। पारम्परिक पादप प्रजनन विधियों द्वारा जैव पौष्टिकीकृत किस्मों का विकास सम्भव है। इन किस्मों के विकसित हो जाने पर उच्च पोषण प्राप्त करने के लिए किसी भी प्रकार के अतिरिक्त व्यय की आवश्यकता नहीं होगी। जैव पौष्टिकीकरण फोर्टिफिकेशन (आयोडीनयुक्त नमक की तरह बाहर से पोषक तत्वों को मिलाना) या अनुपूरण या सप्लीमेंटेशन (विटामिन की कमी को पूरा करने के लिए आहार में विटामिन कैप्सूल आदि लेना) से भिन्न है। जैव पौष्टिकीकरण में जैविक साधनों के माध्यम से फसल द्वारा स्वयं अधिक पोषक अनाज/सब्जी का उत्पादन किया जाता है। गरीब जनसंख्या में सूक्ष्म पोषक तत्व जनित रोगों के निदान में यह एक खाद्य आधारित दृष्टिकोण है। जैव पौष्टिकीकरण की तीन विधियाँ प्रचलित हैं – (1) शस्यीय जैव पौष्टिकीकरण, (2) परम्परागत पादप प्रजनन विधियाँ, और (3) जैव अभियांत्रिकी या जीएम फसलों का विकास। शस्यीय जैव पौष्टिकीकरण में फसल पर सूक्ष्म पोषक तत्व युक्त उर्वरकों का पर्णीय छिड़काव किया जाता है जिससे लक्षित खाद्य फलों/बीजों में पोषक तत्वों की उपलब्धता में वृद्धि की जाती है। यह एक सरल और प्रभावी विधि है परंतु टिकाऊ नहीं है और इसका प्रभाव लम्बे समय तक नहीं हो पाता है। टमाटर की फसल में सोडियम सेलिनाइट के छिड़काव से टमाटर के फलों में सेलिनियम सूक्ष्म पोषक तत्व की सांद्रता में वृद्धि तो मिली लेकिन फसल की अगली पीढ़ी में उक्त सांद्रता प्राप्त नहीं हुई।
परम्परागत पादप प्रजनन विधि में अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में सूक्ष्म पोषक तत्वों से युक्त किस्म को संकरण में उपयोग कर अधिक सांद्रतायुक्त किस्म तैयार की जाती है। विशेषत: सब्जियों में इस विधि का खूब प्रयोग हुआ है। परम्परागत् पादप प्रजनन विधि से तैयार किस्में जीएम फसलों/किस्मों का तुलना में अधिक स्वीकार्य हैं। इस विधि से तरबूज की अर्काज्योति तथा दुर्गापुर लाल नामक किस्में विकसित की गई हैं जिनमें केरोटीन तत्व की अधिक मात्रा उपलब्ध है।

गेहूं – इसी प्रकार अनाज फसलों में भी जैव पौष्टिकीकृत किस्में विकसित की जा चुकी हैं। कठिया गेहूँ की तेजस (एचआई 8759) किस्म में प्रोटीन, आयरन तथा जिंक की मात्रा क्रमश: 12 प्रतिशत, 41.1 पीपीएम तथा 42.8 पीपीएम है जबकि अन्य प्रचलित किस्मों में प्रोटीन (8-10 प्रतिशत), आयरन (28-32 पीपीएम) तथा जिंक (30-32 पीपीएम) उपलब्ध है। गेहूँ की एक अन्य किस्म डीडीडब्ल्यू 47 में 12.7 प्रतिशत प्रोटीन तथा 40.1 पीपीएम आयरन उपलब्ध है। कठिया गेहूँ की किस्म एचआई 8823 में 12.1 प्रतिशत प्रोटीन तथा 40.1 पीपीएम जिंक उपलब्ध है।
मक्का – मक्का की संकर किस्म पूसा एचक्यूपीएम 5 में विटामिन ए (6.77 पीपीएम), लायसिन (प्रोटीन में 4.25 प्रतिशत), और ट्रिप्टोफेन (प्रोटीन में 0.94 प्रतिशत) पोषक तत्व उपलब्ध हैं। ज्ञातव्य है कि लायसिन और ट्रिप्टोफेन प्रोटीन निर्माण तथा मेटाबॉलिस्म नियंत्रकों के नियमन में सहायक होते हैं। मक्का की अन्य प्रचलित संकर किस्मों में सामान्यत: विटामिन ए, लायसिन तथा ट्रिप्टोफेन की उपलब्धता क्रमश: 1-2 प्रतिशत, 1.5 – 2 प्रतिशत तथा 0.3 – 0.4 प्रतिशत तक ही होती है।
बाजरा – बाजरे की धनशक्ति (आईसीटीपी 8203) किस्म को प्रथम जैव पौष्टिकीकृत किस्म माना जाता है। उच्च आयरन युक्त (81 पीपीएम) इस किस्म का विकास अखिल भारतीय बाजरा अनुसंधान परियोजना के अंतर्गत कृषि विश्वविद्यालय, राहुरी (महाराष्ट्र) द्वारा किया गया। यह किस्म 2014 में सम्पूर्ण भारत के वर्षा आधारित क्षेत्रों के लिए खरीफ मौसम में उत्पादित करने के लिए जारी की गई। बाजरे में आयरन की उच्च मात्रा से रक्ताल्पता रोग से ग्रसित लोगों, गर्भवती एवं् स्तनपान कराने वाली महिलाओं के आहार में इसका समावेश स्वास्थ्यवद्र्धक होता है। एक अध्ययन के अनुसार भारत में 200 ग्राम धनशक्ति बाजरे का नियमित सेवन एक वयस्क पुरूष एवं बच्चों के लिए पर्याप्त होता है। बाजरे की संकर किस्म आरएचबी 233 भी मध्यप्रदेश के लिए उपयुक्त है।
मध्यप्रदेश के रागी उत्पादकों के लिए सन् 2020 में आचार्य एन जी रंगा कृषि विश्वविद्यालय के गुन्टूर केन्द्र द्वारा विकसित वीआर 929 (वेगावती) उपयुक्त है। इस किस्म में 131.8 पीपीएम आयरन उपलब्ध है जोकि सामान्य किस्मों (25 पीपीएम) से काफी अधिक है। आयरन तत्व की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए प्रदेश के मसूर उत्पादक मसूर की पूसा अगेती किस्म का उत्पादन रबी में कर सकते हैं। सन् 2017 में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा विकसित इस किस्म में 65 पीपीएम आयरन उपलब्ध है जोकि अन्य प्रचलित किस्मों में उपलब्ध आयरन (45-50 पीपीएम) से अधिक है।
जैव अभियांत्रिकी विधि से जीएम फसलें तैयार की जाती हैं। यह आधुनिक एवं अपेक्षाकृत कम अवधि में ही अपेक्षित परिणाम देने में सक्षम विधि है। हमारे देश में अभी जीएम खाद्य फसलों के विकास तथा उपयोग पर पाबंदी है। विश्व के अन्य देशों में इस विधि से सब्जियों और फलों की जैव पौष्टिकीकृत किस्में विकसित हो रही हैं और प्रचलन में हैं।

बायो फोर्टिफिकेशन आवश्यक क्यों है

मानवजाति के लिए सबसे गम्भीर वैश्विक चुनौतियों में कुपोषण का प्रमुख स्थान है। कुपोषण या सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी लगभग आधी दुनिया को प्रभावित करती है। वैश्विक भूख सूचकांक वर्ष 2023 के अंतर्गत 125 देशों की सूची में भारतवर्ष का 111वाँ स्थान है। भुखमरी की इस स्थिति को ‘गम्भीरÓ माना जाता है। हमारे देश की कुल जनसंख्या (140 करोड़) में 16.6 प्रतिशत अर्थात् लगभग 23.24 करोड़ लोग अल्पपोषित हैं जिनमें महिलाओं और बच्चों की संख्या अधिक है। विगत वर्षों में भारत में भुखमरी और कुपोषण की समस्या के निवारण हेतु शासकीय स्तर पर सार्थक प्रयास किए गए हैं। इस कारण हमारे देश में भूख सूचकांक में सन् 2000 से 2023 की अवधि में निरंतर कमी आई है। उक्त सूचकांक सन् 2000 में 38.4 प्रतिशत था जोकि सन् 2008 में 35.5 प्रतिशत, 2015 में 29.2 तथा 2023 में घटकर 28.7 प्रतिशत तक हो गया।
बच्चों तथा महिलाओं के समग्र रोगों के लिए कुपोषण 15 प्रतिशत तक जिम्मेदार है। यह कुपोषण सूक्ष्म पोषक तत्वों जैसे आयरन, जिंक तथा विटामिन ए की कमी के करण है। जैव पौष्टिकीकरण के अंतर्गत सूक्ष्म पोषक तत्वों के उच्च स्तर से युक्त फसल किस्मों का विकास किया जाता है। आयोडीन नमक फोर्टिफाइड है क्योंकि इसमें आयोडीन तत्व ऊपर से मिलाया जाता है जबकि बायोफोर्टिफाइड फसलों में प्राकृतिक रूप से इन तत्वों की अधिक मात्रा युक्त किस्मों का सामान्य किस्मों के मध्य संकरण कर जैव पौष्टिकीकृत किस्मों का विकास किया जाता है।

जैव पौष्टिकीकरण में शासकीय प्रयास

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद जोकि देश में कृषि अनुसंधान और प्रसार की सर्वोच्च संस्था है, ने जैव पौष्टिकीकृत किस्मों के विकास कार्य में गति लाने एवं अनाज, दलहन, तिलहन, सब्जियों तथा फलदार फसलों के पोषक मूल्य में वृद्धि करने के उद्देश्य से सन् 2014 में एक अनुसंधान मंच की स्थापना की है। इस मंच के निरंतर प्रयासों से अब तक 87 से भी अधिक खाद्य फसलों की पौष्टिकीकृत किस्मों का विकास हो चुका है जिनमें धान, गेहूँ, मक्का, बाजरा, रागी, मसूर, मूँगफली, अलसी, सरसों, सोयाबीन, फूलगोभी, आलू, शकरकंद, अनार आदि सम्मिलित हैं। इस अनुसंधान के निर्देशन तथा नियंत्रण में इन किस्मों का बीजोत्पादन कार्यक्रम भी लिया जा रहा है। जैव पौष्टिकीकृत किस्मों में मूल्य सम्वर्धन तथा स्टार्टअप्स हेतु विभिन्न कृषि विज्ञान केन्द्रों के माध्यम से प्रसार कार्य जारी हैं। फसलवार देखें तो सर्वाधिक 28 जैव पौष्टिकीकृत किस्में गेहूँ की, 14 किस्में मक्का की, 9 किस्में बाजरे की और 8 किस्में धान की विकसित हो चुकी हैं। इन किस्मों का विकास कार्य सन् 2013 से प्रारम्भ हुआ तथा सन् 2020 में सर्वाधिक 31 किस्मों को विकसित कर लोकार्पित किया गया जबकि 2013 से 2015 की अवधि में केवल दो किस्में ही उपलब्ध थीं।

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